मंहगाई से बेपरवाह मुद्रास्फीति दर

मुद्रास्फीति दर के 0.27 फीसदी रह जाने और तीस वर्षों में सबसे कम स्तर पर पहुंच जाने की खबर सभी कल के सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई थी। इससे समाचार से सह तो स्पष्ट हो गया कि मुद्रास्फीति दर के घटने और बढ़ने से आम जनता को परेशान करने वाली मंहगाई में कोई संबंध नहीं है। जब मुद्रास्फीति दर 12 प्रतिशत थी तब भी जनता मंहगाई से परेशान थी और अब जब कि 0 प्रतिशत है तब भी जनता मंहगाई से परेशान है। अर्थशास्त्र के विद्वान मुद्रास्फीति दर के इस प्रकार घटने बढ़ने की जो भी व्याख्या करें पर आम जनता के लिये इस का कोई महत्व नहीं है। आखिर कोई बताये कि जब मंहगाई दर 0.27 प्रतिशत है तब दूध, घी, सब्जियां, खाद्य पदार्थों के दाम भी जमीन पर न होकर आसमान पर क्यों हैं?  मुझे तो अर्थशास्त्र वैसे भी समझ में नहीं आता है तो शायद मैं अपनी बात ठीक से नहीं कह पा रही हूं, लेकिन मैं घर चलाती हूं तो इतना तो कह ही सकती हूं कि मुद्रास्फीति दर के घटने बढने से मंहगाई बेपरवाह है और अपनी चाल से चले जा रही है। मंहगाई से जनता रो रही है और मंहगाई दर औंधे मुंह पड़ी है। मंहगाई दर के कम होने का तात्कालिक फायदा तो अभी जनता को नहीं मिल रहा है।

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