केवल किताब लिखने पर सजा?

भाजपा ने जसवंत सिहं को भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया है लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा क्यों किया गया है। यदि जिन्ना को लेकर किताब लिखने पर ही उJasvant-singhनको निकाला गया है तो ये निंदनीय है। आखिर लोकतंत्र में कोई अपनी बात कैसे नहीं लिख सकता और क्या कोई अपनी निजी बात नहीं रख सकता? आखिर जिन्ना के उपर किताब लिखने से भाजपा का क्या नुकसान हो रहा था? भाजपा जसवंत सिहं द्वारा लिखित किताब से अपने आप को दूर कर ही चुकी थी फिर बात अपने आप खत्म हो जाती, केवल किताब लिखने पर किसी को राजनैतिक पार्टी से निकालना तो बिलकुल गलत है।

 

जसवंत सिंह से मुझे अब हमदर्दी है हालांकि मैं तो उनकी आलोचक ही हूं। मैं तो जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा को लेकर कुछ लिखना चाहती थी कि कैसे इन लोगो ने भाजपा को कुछ देने के बजाय उसका नुकसान ही हमेशा किया है। अपने बूते पर ये लोग कोई भी चुनाव नहीं जीत सकते, किसी को जिताना तो दूर की बात है। ये लोग हमेशा पार्टी को ब्लैकमेल ही करते रहते हैं। हमेशा रूठे ही रहते हैं। जसवंत सिहं ने कंधार में जाकर अपने उपर, भाजपा के ऊपर और भारत के ऊपर ऐसा कलंक लगाया है वो कभी मिट नहीं सकता। इसी तरह यशवंत सिन्हा ने अपने वित्तमंत्री काल के दौरान लोगो को टैक्सों और ब्याज दरों मे कमी से रुलाया था। लेकिन केवल किताब लिखने पर इस तरह भाजपा से जसवंत सिंह का निष्कासन मेरे मन में उन के प्रति सहानुभूति जगा रहा है।


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3 टिप्‍पणियां

  1. लगता है भाजपा अपना सूपड़ा साफ़ करवाने की तैयारी कर रही है !

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  2. जसवंत सिंह का पार्टी से निकला जाना यह साबित करता है का जिन्ना का भूत सिर्फ जसवंत के सर चढ़ कर हे क्यों बोला, और उनको आनन -फानन में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से क्यूँ निकल दिया गया, जिन्ना को सेकुलर कहने वाले अकेले जसवंत सिंह हे तो पहले और आखिर नेता नहीं है, उनसे पहले बी ही तो आडवानी ने भी जीना को महान सेकुलर की उपाधि दी थी, उनको पार्टी से क्यूँ नहीं निकला गया, फिर जसवंत के बाद, सौरी का बयान फिर सुदरसन का बयान, उनपर बीजेपी आलाकमान चुप्पी कुओं लिए हुए है, इसी तरह, बंगारू लाक्स्मन को सिर्फ एक लाख रूपये के एवाज़ में पार्टी से निकल दिया गया, जबकि वही प्रमोद महाजन एक मामूली सी क्लर्क की नौकरी करते हुए पार्टी ज्वाइन की तथा उसने ऐसा क्या पार्टी के लिए कर दिया की वोह एक मामुले क्लर्क से हज़ार करोड़ का मालिक बन बैठा, तब पार्टी ने उसकी जमा पूंजी पे कोई संज्ञान क्यूँ नहीं लिया, सिर्फ कुछ ही लोगो को बलि का बकरा क्यूँ बनाती है, यदि उसकी निति और नियति साफ़ होती तो जो पार्टी की विचारधारा है वह सब पे एक सम्मान लागू होती , सिर्फ कुछ लोगो पर नहीं. असल में बात साफ़ है की जिस हिन्दुतवा की कल्पना बीजेपी ने की थी जिस के दम पइ मंदिर मस्जिद विवाद हुवा व हिन्दू संवेदनशीलता को वह वोटो में तब्दील करने के पश्चात वह सत्ता सुख बाजपाई के नेत्रत्वा में प्राप्त कर सकी वही कट्टरपंथी हिंदुत्वा उनकी गले की फांस बन गया, क्यूंकि अब पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता पार्टी की हिंदुत्वा की विचारधारा से इत्तेफाक नहीं रखते यही कारन है जो जिन्ना कल तक उनकी नज़र में विलेन था वह अब सेकुलर और एक सच्चा देशभक्त नज़र आने लगा है और अब उनकी नजरमे देश का विभाजन के जिम्मेदार जिन्ना नहीं बल्कि कही न कही वह नेहरु और गाँधी को ठहरा कर अपनी एक सेकुलर इमेज बनाने में तुले है.. वही पर वो लोग जो भाजपा की कट्टरपंथी विचारो से सहमत थे, उनका अब पार्टी से मोह भंग होता जा रहा है और पार्टी का जनाधार भी कम होता जा रहा है, यही कारन है पार्टी का वह तबका जो सिर्फ और सिर्फ राम के नाम पे वोट करता था उनको भी एहसास हो गया है की यह लोग सिर्फ मंदिर के नाम पे राजीनीति कर रहे है इनको मंदिर का मुदा सिर्फ चुनाव के समय हे याद आता है बाकि समय में इन्हे राम और उनकी अयोध्या का पता नहीं रहता, यही कारन है लोकसभा चुनाव में बीजेपी की भरी हार, अब जबकि बीजेपी का जानधार लगातार खिसक रहा है ऐसे में पार्टी के वरिस्थ नेताओं का जिन्ना का सेकुलर बताना उन्हें पार्टी के लिए और खतरनाक साबित होगा, इसलिए न चाहते हुए भी भाजपा फिर से पुरानी हिद्दुत्वा कट्टरपंथ के विचारधारा पे चलने ko मजबूर हो रही है, और अपने ने ही वरिस्थ नेताओ के खिलाफ फैसला लेना पड़ रहा है, ऐसे में एक बात साफ़ नज़र आ रहीकी की बीजेपी का अंत निकट बभिस्या में अस्वम्भावी है...................................

    कुलदीप कुमार
    शोध छात्र (जे ने यू )

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