अब क्यों नहीं देख रहे पुलिस से परे?

पिछले सालों में जब भी कहीं आतंकवाद की घटनायें घटती थीं और मुस्लिम बस्तियों से लोगों को पकड़ा जाता था या पुलिस से परे देखो या फिर पुलिस की हर बात यकीन लायक नहीं इत्यादि। तब पत्रकारों द्वारा पुलिस की गलतियों के कुछ लेख भी छपे थे। लेकिन यही पत्र-पत्रिकाये के यही पत्रकार लोग भाजपा (बाजेपी) या गुजरात से संबंधित या फिर कथित हिंदु आतंकवाद की बात आने पर पुलिस या सीबीआई की हर बात को अटल सत्य मान कर तुरंत भाजपा और आरएसएस पर हमला बोलने लगते हैं। अभी अमित शाह के मामले में भी सब सीबीआई द्वारा किये जा रहे काम पर अब कोई पत्रकार नहीं कर रहा की हमें सीबीआई से परे देखना चाहिये। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। अब क्यों सीबीआई की हर बात अटल सत्य है?
फिर किसी को माओवादी होने के संदेह में पकड़ा जाता था, या फिर कश्मार में किसी को गिरफ्तार किया गया हो, तब तमाम पत्र-पत्रिकायों और टीवी के कुछ समाचार पत्रों नें इस बात को जोर शोर से कहना शुरु किया था कि पुलिस की हर बात पर यकीन नहीं करना चाहिये। बात भी सही है, लोकतंत्र में पत्रकारों के हमेशा ही  अपनी पैनी नजर रखनी ही चाहिये और अपने तरीके से जांच करनी चाहिये। उस समय कुछ जुमले बनाये गये मसलन

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3 टिप्‍पणियां

  1. ठीक कह रही हैं आप। न्यूज़ चैनलों, कांग्रेस और मानव अधिकार वालों ने सोहराबुद्दीन को हीरो बना दिया है।

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  2. sohrabuddin was gangstar. uska yahi ant hona chayiye tha

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  3. agar modi darte nahin hai to unko kisi ka daman nahin karna chhaiye dam hai apne main to aap court main jitenge aap sahin hai to dar q

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