जिन्दगी की शायरी

कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो जरा तबियत से उछालो यारो ।
यार जरा माहौल बना
हर पल में उठा सदियों का मजा
जो बीत गया सो बीत गया
जो बीतना है वो हंस के बिता
यार जरा माहौल बना
हर पल में पी बस एक दवा
जी खोल के जी, जी जान से जी
कुछ कम ही सही पर शान से जी

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता,
कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता,
जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है,
जुबां मिली है मगर हमजुबां नहीं मिलता,
बुझा सका है कौन भला वक्त के शोले,
ये एसी आग है चिसमें धुवां नहीं निकलता
तेरे जहां में ऐसा नहीं के प्यार नहीं ना हो
जहां उम्मीद हो वहां नहीं मिलता
निदा फाजली

तुम तहज़ीब को भी इखलास समझते हो
दोस्त होता नहीं हर शख्स, हाथ मिलाने वाला
अहमद फराज
कोइ नाम-ओ-निशां पूछे, तो ए क़ासिद बता देना
तखल्लुस 'दाग' है, और आशिकों के दिल में रहते हैं
दाग देहलवी
और इकबाले-जुर्म क्या हो 'शकील'
थरथराते ल़बों पर आह तो है
शकील बदायूंनी
अपनी हस्ती का भी इंसा को इरफान न हुआ
खाक फिर खाक थी, औकात से आगे न बढ़ी
शकील बदायूंनी
गुलाचीं ने तो कोशिश कर डाली, सूनी हो चमन की हर डाली
कांटों ने मुबारक काम किया, फूलों की हिफ़ाजत कर बैठे
शकील बदायूंनी
रंज कि जब गुफ्तगू होने लगी
आप से तुम, तुम से तू होने लगी
शकील बदायूंनी
मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंजिल, मगर
लोग साथ आते गये, कारवां बनता गया
मजरूह सुल्तानपुरी
मौत का भी इलाज हो शायद
जिन्दगी का कोई इलाज नहीं
ज़माना बढ़े शौक से सुन रहा था
हमीं सो गये, दास्तां कहते कहते
साकिब
लहरों की जिन्दगी पर कुर्बान हजार जाने,
हमको नहीं गवारा साहिल की मौत मरना

SarkariNaukriBlog com शुक्रवार, 7 जुलाई 2006
प्यार की शायरी

ये किन नज़रों से आज तुमने देखा,
के तेरा देखना देखा न जाये
अहमद फ़राज
उनको आता है प्यार पे गुस्सा,
हमें गुस्से पे प्यार आता है
अमीर मिनाई
क्या नज़ाकत है, कि आरिज उनके नीले पढ़ गये
हमने तो बोसा लिया था तसवीर का
उन्हें खत में लिखा था के "दिल मुज़तरीब है"
ज़वाब उनका आया " मुहब्बत न करते,
तुम्हें दिल लगाने को किसने कहा था?
बहल भी जायेगा दिल, बहलते बहलते"
आंखों में जो भर लोगे, तो कांटों से चुभेंगे
ये ख्वाब तो, पलकों पे सजाने के लिये हैं
जनाजा रोक कर मेरा वो कुछ अन्दाज से बोले
"गली हमने कही थी, तुम तो दुनिया छोड़ जाते हो"
सफी लखनवी
तिरछी नज़र से न मारो, आशिके दिलगीर को
कैसे तीरन्दाज हो, सीधा तो कर लो तीर को
ख्वाजा वजीर
हुस्न-ओ-जवानी हो तो हर एक को गुरूर आता है
तेरे इन बहार आदों को देख कर हमें सरूर ता है
तझे बहार कहा तो फकत इस लिये के हर मौसम
शजर से रूठ भी जाये तो लौटकर जरूर आता है
हाले-दिल यार को लिखूं क्यों कर
हाथ दिल से जुदा नहीं होता
मोमिन
आज वो काली घटाओ पे नाजान लेकिन
चांद सी रोशनी बालों में उतर आयेगी
डा. जरीना सानी
हम भी कुछ खुश नहीं वफा करके
तुमने अच्छा किया, निबाह न की
मोमिन
हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किये
हम हंस दिये, हंम चुप रहे, मंजूर था परदा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चेहरा तेरा
किसने कहा ये चांद है, किसने कहा चेहरा तेरा
इब्नेइंशा
रहा ना दिल में वो बेदर्द, और दर्द रहा
मकीन कौन हुआ है, मकां किस का था
दाग देहलवी
रात यूं दिल में, तेरी खोई हुइ याद आई
जैसे वीराने में, चुपके से बहार आ जाये
जैसे शहरों में, हौले से चले बादे-नसीम
जैसे बीमार को, बे-वजह करार आ जाये
कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब
आज तुम याद, बेहिसाब आये
तुम्हारी याद के जब जख्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं

SarkariNaukriBlog com सोमवार, 26 जून 2006