26/11 : पश्चिम से ही हमेशा हमला हुआ है भारत पर

पश्चिम से ही हमेशा हमला हुआ है भारत परअगर आप इतिहास उठा कर देखें तो पायेंगे कि भारत भूमि पर केवल एक बार को छोड़ कर ((जब चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण किया था)  हमेशा  पश्चिमी सीमा से हमला होता रहा है। केवल 1962 में ही उत्तर की ओर से चीन द्वारा हमला किया गया था। सिकन्दर, मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, तामूर लंग, बाबर, अकबर, नादिरशाह, अहमदशाह अब्दाली, याह्या खां, अजमल आमिर कसाब आदि हमलावर सब भारत पर पश्चिमी दिशा से ही आये थे। जब भी भारत की  पश्चिमी सीमा कमजोर हुई तो भारत पर हमला हुआ है। आजादी के बाद से भी पश्चिमी सीमा पर तीन बार पाकिस्तान की ओर से हमला किया गया है। इसलिये इतिहास से सबक लेते हुये देश को पश्चिम की ओर विशेष ध्यान  रखना चाहिये। विश्व के आतंकवाद की केन्द्र भी भारत के पश्चिम में ही स्थित है और इधर ही दुनिया का सबसे ताकतवर देश अपनी सेना लेकर बैठा हुआ है। दरअसल पश्चिम की ओर भारत में सपाट मैदान हैं जहां सेना तीव्र गति से चल पाती हैं, इसके अलावा ये इलाका उपजाऊ भी है इस कारण यहां समृद्धि है और इसीलिये विदेशी आक्रमणकारी हमेशा लूटने के लिये लालायित रहते रहे हैं। अब इसमें जेहाद और धार्मिक तथा राजनीतिक विद्वेष  भी मिल गया है। मेरे विचार में भारत को अपने आप को सुरक्षित करने के लिये पश्चिमी सीमा को सुदृण होना बहुत आवश्यक है।

SarkariNaukriBlog com गुरुवार, 26 नवंबर 2009
अंग्रेजी और हिंदी के अखबार और पत्रिकायों में बहुत विरोधाभास हैं

अंग्रेजी और हिंदी के अखबार और पत्रिकायों  बहुत विरोधाभास हैं एनडीटीवी के पत्रकार एवं हिंदी के अच्छे चिठ्ठाकार श्री रवीश कुमार जी ने अपने चिठ्ठे कस्बा  में यह प्रश्न उठाया था कि हिंदी-अंग्रेजी के अख़बारों का किसान अलग क्यों होता है?  दरअसल ये बहुत ही बुनियादी सवाल है और ये वास्तव में हिंदी और अंग्रेजी भाषा के द्वारा सोचने और समझने का भी अन्तर है और साथ ही संस्कृतियों का भी अंतर हैं। मैं हिंदी और अंग्रेजी की तमाम पत्रिकायें (खास कर महिलाओं की) एवं समाचार पत्र पढ़ती हूं और कई विषयों पर देखा है कि अंग्रेजी के अखबार और पत्रिकायों की सोच बिलकुल अलग है।
  • अंगेजी की पत्रिकाये हमेश इस तरह के लेख छापती हैं – हाउ टू प्लीज योर मैन, नो हिज सेक्सी प्लेसेज, फिफ्टी वेज टू सेटिस्फाई हिम इत्यादि। इनमें योर मैन की बात की जाती है यानी ये बताया जाता है कि किसी से भी आप संबंध बना सकती हो। यहां कभी भी हसबैण्ड शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। पूरा ध्यान पति-पत्नी पर न होकर मैन-वूमेन पर होता है।
  • अंगेजी के सारे अखबार मिलकर भी अकेले दैनिक जागरण से कम बिकते हैं (ताजा सर्वेक्षण 2009 के अनुसार) लेकिन फिर भी हिंदी समाचार पत्रों को भाषाई या वर्नाकुलर लिखते हैं और अपने आप को नेशनल (राष्ट्रीय) समाचार पत्र कहते हैं।
  • पश्चिम की हर बुराई जैसे कि प्रास्टीट्यूशन, लिव-इन-रिलेशनशिप, लेस्बियन और गे सेक्स इत्यदि के समर्थन में लेखों की अंग्रेजी पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में बहुतायत रहती है और उसके पक्ष में माहौल बनाते रहते हैं।
  • शराब के किसी बन्दीकरण के विरोध में भी अंग्रेजी पत्रकारिता सबसे आगे है।
  • अब अंग्रेजी ही इनका जीवन-यापन का साधन है इसलिये ये अंग्रेजी को बढ़ावा देने के लिये हमेशा हल्ला करते रहते हैं। अंग्रेजी इनके अनुसार अंतर्राष्ट्राय भाषा है जिसके बिना भारत का विकास नहीं हो सकता।
  • हिंदी के पत्र-पत्रिका वाले पता नहीं किस हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं कि वो खुद ही हिंदी वालों को अंग्रेजी वालों के समतर समझते हैं। हिंदी के अखबारों और पत्रिकायों में वैज्ञानिक व अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर बहुत ही कम छपता है। उनके अनुसार हिंदी के पाठकों का स्तर कम है।
  • स्वतंत्र किस्म के लेख हिंदी पत्रिकायों और समाचार पत्रों मे कम ही आते है, अधिकांश समाचार ऐजेंसी से लिया हुआ होता है।
  • हिंदी के समाचार पत्र स्थानीय समाचारों को बहुत ही अच्छा कवर करते हैं।

SarkariNaukriBlog com बुधवार, 25 नवंबर 2009
नकली नोट का पता आखिर कैसे लग सकता है?

अगर आप बैंक जायें तो आप देखेंगे कि जगह जगह इस बात के पोस्टर लगे रहते हैं कि आप अपने नोट के नकलीपन को कैसे पहचान सकते हैं। इसके अलावा सरकार समय समय पर विज्ञापन इस संदर्भ में देती रहती है। इसी तरह का एक विज्ञापन मैंने नीचे दिया है। दरअसल भारत में नकली नोट की समस्या बहुत बड़ी हो चुकी है और अब तो बैंको के एटीएम से भी नकली नोट निकल रहे  हैं। अब हालत ये है कि कहीं भी जायो, कुछ खर्च करो, पहले सामने वाला आपके नोट का परीक्षण करता है। नकली नोट दो तरह से बन रहे हैं। एक तो भारत में कुछ लोग स्कैन करके प्रिंटर और कंप्यूटर की मदद से नकली नोट छापने वाले, ये लोग कम ही मात्रा में छाप पाते हैं और इस तरह के नकली नोट को ही आप पकड़ सकते हैं। दुसरे नोट वो हैं जो पाकिस्तान में वहां की सरकार आईएसआई के द्वारा वहां की राजकीय प्रेस से छपवा कर भेज रही है। इस तरह का नोट नकली होने पर भी असली हैं क्योकि ये पाकिस्तान की अधिकृत प्रेस मे छप रहे हैं जहां पर इनको वो सारी तकनीक उपलब्ध जिससे भारतीय रिजर्व बैंक नोट छापता है। यानी रिजर्व बैंक कुछ भी युक्ति अपनाये, ये लोग असका तोड़ निकाल लेगे। आप इसी से अंदाज लगा सकते हैं कि ये नोट असली जैसे ही होते हैं और भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर रहे हैं। अस समस्या का इलाज तो सरकार पाकिस्तान पर दबाव डालकर ही निकाल सकती है अन्यथा हम लोग ऐसे ही नकली नोट लिये बैठे रहेंगे। ऐसे नकली नोट जो कि असली जैसे ही हैं का पता अखिर कोई व्यक्ति कैसे लगा सकता है?
Know Bank Note नकली नोट

SarkariNaukriBlog com मंगलवार, 24 नवंबर 2009
हिंदीबात चिठ्ठा अब अमित के ब्लॉग सूची में भी

प्रसिद्ध अंगेरेजी ब्लॉगर अमित अग्रवाल नें सबसे मशहूर भारतीय ब्लोगों की सूची के हिंदी भाग में अब इस चिठ्ठे को भी शामिल कर लिया है। इसी समय मेरे इस हिंदीबात चिठ्ठे के 400 से के ऊपर फीड ग्राहक भी हो गये हैं।

HindiBaat-in-IndiaBlogs

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हैडली और राणा के नाम से देश को डराया जा रहा है

पिछले एक महीने से जब से अमेरिका की गप्तचर संस्था एफबीआई (FBI) ने डेविड हैडली और तहावुर्रहमान हुसैन राणा को गिरफ्तार किया है, देश के अखबारों में रोजाना उन से संबंधित समाचार छप रहे हैं। जो समाचार छाप रहे है वो मेरे विचार में देश पर कोई अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ रहे हैं। इन सभी समाचारों से बिनी बम फोड़े ही देश को डराया जा रहा है। सोचने वाली बात ये है कि खुफिया जानकारी आखिर पत्रकारों को कौन और क्यों दे रहा है जिसे वो बिना दांचे छाप रहे हैं। कभी छपता है कि हेडली देश में कई जगह घूमा, कभी छपता है कि वो कई फिल्मी लोगों के संपर्क में था। कभी छपता है कि वो 26/11 से ठीक पहले भारत में था, अन्य स्थानों पर होने वाले हमलों से पहले वहां था। आज उसके द्वारा अपने एक दोस्त को भेजी गई ईमेल के जरिये आतंकवादियों के साहसिक की बात छापी गई हैं। यानी अब आतंकवाद के बारे में भी तारीफ की बातें छापी जा रही हैं। ये वही देश है जहां आतंकवाद से लडने के लिये जीरो टोलरेंस की बाते कीं जाती हैं, वहां पर इन लोगो की खबरें कैसे छप रही हैं? मेरे विचार में ये सब अपने आप ही नहीं हो रहा है बल्कि एसा लगता है कि देश को डराया जा रहा है कि देखों तुम लोग कुछ नहीं कर सकते। देश की पुलिस को कार्यवाही करनी चाहिये न कि जनता को डराने की खबरें छपवानी चाहिये।

SarkariNaukriBlog com सोमवार, 23 नवंबर 2009
किसके पीछे किसका हाथ है?

रोजाना समाचार पत्रों में अनेक समाचार छपते रहते हैं और अनेक प्रकार की प्रतिक्रियायें मिलती रहती हैं जिनमें बताया जाता है कि फलां-फलां के पीछे फलां का हाथ है। एक बानगी में यहां देना चाहती हूं। भारत कहता है कि आतंकवाद में पाकिस्तान का हाथ है। पाकिस्तान में लगातार हो रहे बम विस्फोटों मे पाकिस्तान के नागरिकों और सरकार के अनुसार अमेरिका, इस्राइल और अमेरिका मिल कर पाकिस्तान को और इस्लाम को बर्बाद करना चाहते हैं। पाकिस्तान के अनुसार तालीबान के पीछे भारत का हाथ है। तालीबान पाकिस्तान के परमाणु बमों को हथियाना चाहता है, जिसको बनवाने के पीछे चीन का हाथ था। चीन सोचता है कि तिब्बत की गड़बड़ियों के पीछे दलाई लामा का हाथ है और दलाई लामा के पीछे भारत का हाथ है और इसी लिये दलाई लामा ने अरुणाचल प्रदेश का दौरा भी किया था। भारत का सोचना है कि अरुणाचल प्रदेश को चीन  हथियाना चाहता है। इस्राईल के अनुसार उसके यहां की समस्याओं के लिये पश्चिमी एशिया के देश जिम्म्दार हैं। हमास और अल फतह के अनुसार हिंसा के लिये इस्राइल जिम्मेदार है। इस्राइल के अनुसार इरान उसके उपर हमला कर सकता है। अमेरिका के अनुसार ईरान के पास परमाणु बम हैं। भारत में कुछ लोग मानते थे (हैं) कि हेमंत करकरे कि मृत्यु के पीछे हिंदूवादी संघटनों का हाथ है।

भारत में मंहगाई के लिये लोग कांग्रेस सरकार को दोषी मानते हैं।  प्रकाश करात के अनुसार मंहगाई के लिये अमेरिका, पश्चिमी देश और पूंजीवादी व्यवस्था जिम्मेदार है। मुलायम सिंह के अनुसार चुनावों में उनकी हार कल्याण सिंह और राहुल गांधी के कारण है। राज ठाकरे के अनुसार मराठियों की दुर्दशा के लिये हिंदी जिम्मेदार है। सेक्यूलरों के अनुसार भारत में मुस्लिमों की समस्त समस्याओं के पीछ नरेंद्र मोदी का हाथ है। 70 के दशक में भारत में हर घटना के पीछे सीआईए का हाथ होता था। आजकल भारत में हर घटना के पीछे आईएसआई का हाथ होता है।

इस प्रकार हम लोग रोजाना षणयंत्र कारी नई नई थ्योरी पाते रहते हैं जिनसे ये हमारा पूरा मनोरंजन होता है और ये भी पता चलता है  किसके पीछे किसका हाथ है। आप भी अंदाजा लगाईये कि किसके पीछे कौन है?

SarkariNaukriBlog com गुरुवार, 19 नवंबर 2009
अब क्या होगा कोड़ा का? (पुराने अनुभवों के आधार पर)

झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के द्वारा अरबों रुपये की अवैध कमाई औरMadhu-Kora भ्रष्टाचार के समाचारों के बाद हर कोई सोच रहा है कि अब कोड़ा का क्या होगा? वैसे मधु कोड़ा को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है और वो अपने आप को राजनैतिक साजिश में फंसाने की बात करने लगे हैं और अपने को फंसाने वालों को देख लेने की बात भी करने लगे हैं। इसके अलावा चाईबासा में हंकार रैली करने वाले हैं। यानी कुल मिला कर हम लोगों ने जैसा भ्रष्टाचार के पूराने मामलों में देखा है वैसा ही कुछ इस बार भी होने जा रहा है। आये देखें कि क्या हो सकता है -

  1. अभी शायाद इस बात का इंतजार हो रहा है कि कोई काबिल वकील जमानत के लिये मामला तैयार कर ले  और मधु कोड़ा हजारों समर्थकों की भीड़ जुटा ले उसके बाद ही शायद गिरफ्तार किया जायेगा।
  2. आगामी विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से जीत कर आयेगा और फिर कहा जायेगा कि जनता की अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दे दिया है।
  3. ये कि दो-चार विधायक और चुनके आ गये तो सरकार में आने वाली पार्टी सहयोग लेने के बदले में केस को लटका देगी।
  4. अगर कुछ नहीं हुआ तो भी केस तो बहुत लंबा चलेगा ही, बाद की बाद में देखी जायेगी।

यानी कि कुल मिलाकर जनता तो यही समझती है कि किसी का कुछ नहीं होगा क्योंकि इसस् पहले के घोटालों में भी किसी को कभी कोई सजा नहीं हुई है। भारत में भ्रष्टाचार भी मॆंहगाई की तरह है जिससे सब परेशान है लेकिन कुछ होता नहीं है।

SarkariNaukriBlog com मंगलवार, 17 नवंबर 2009
ये लोग लड़ने मरने के लिये ही पैदा हुये हैं

आज फिर पाकिस्तान के पेशावर में एक बम विस्फोट हुआ है जिसमें अभी तक कीfata_map जानकारी के अनुसार 8 लोग मारे गये हैं, ये हमला पाकिस्तान की खुफिया संस्था आईएसआई के क्षेत्रीय कार्यालय पर हुआ है। पिछले 2-3 महीने से कोई दिन ऐसा नहीं जा रहा, जब पाकिस्तान में रोज कुछ न कुछ ऐसी घटनायें न घट रही हो। दरअसल पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत  और पास के कबीलाई इलाकों (फाटा) के  पख्तून लोग का काम ही लड़ना मरना है। ये जाति बहादुर और लड़ाकू है। ये लोग हजारों सालों से इसी तरह से लड़ते आये हैं। इन लोगों ने सिकंदर से लड़ाई लड़ी, बाबर, अकबर, जहांगीर, शाहजहां से लड़े, अंग्रेजों से लड़े, महाराज रणजीत सिंह के जमाने में लड़े पर कुछ काबू में रहे, सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान में लड़े  और अब पाकिस्तान की सेना और सरकार से लड़ रहे हैं। दरअसल पुराने भारत के इस इलाके से भारत की शुरुआत थी और आर्यों ने बहुत ही रणनीतिक तौर पर इस दुर्गम इलाके में ऐसी जातियों को बसाया था जो कि लड़ने में माहिर थी और जिनके लिये लड़ांई जीवन जीने का एक तरीका है। पुराने जमान् में ये लोग शठ कहलाते थे और इन लोगों की इतनी बदनामी थी कि एक कहावत थी कि शठ को शठ की भाषा में जबाव  देना चाहिये।

जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था तब इन लोगों ने सिकंदर की सेना के साथ बहुत ही बहादुरी से लड़ा था और इनका इतना आतंक था कि सिकंदर की सेना जो कि एक तिहाई रह गई थी, ने भारत में आगे जाने से इंकार कर दिया था। सिकंदर के जाने के बाद चाणक्य ने इनको  छापामार लड़ाई के लिये प्रशिक्षण दिया जो कि ये लोग अभी तक प्रयोग करते हैं। छापामार लड़ाई की तैयारी से ही सेल्युकस के बाद भारत में यवन शासन खत्म हो गया।  इस पूरे इलाके की संरचना भी इस प्रकार की है कि दुश्मन वहां फंस जाता है इस कारण अक्सर लंबी लड़ाई चलती है। अंग्रेजों को इन्होंने 1897 मे औरक्जई में बुरी तरह हराया था। इसके बाद अंग्रेज इस इलाके में कभी शांति से नहीं रह सके और इल के कबीले वाले इलाकों को अंग्रेजों ने विशेष अधिकार से केवल राजनीतिक एजेन्ट रख कर आजाद ही रखा था। अंग्रेजों की ये व्यवस्था पाकिस्तान ने भी जारी रखी जिसकी वजह से ये लोग अभी भी पुराने कबीलों वाले सिस्टम से रह रहे हैं और आज भी केवल लड़ना-भिड़ना जारी रखे हुये हैं। अंग्रेजों का ये लोग सिर काट लेते थे जिससे अंग्रेजों में इनका बहुत खौफ था।  इनको नये जमाने के हिसाब से पढ़ना-लिखना और कुछ काम सिखाया नहीं गया है। इसलिये ये लोग अभी भी पुराने जमाने के कबाले वाले तरीकों से रह रहे हैं और कबीले का सरदार जिसे मलिक या बाबा कहते हैं का कहना मानकर चलता है और अपने कबीले के लिये छोटी मोटी बातों पर भी लड़ते मरते रहते हैं।

 

(आगे भी जारी रहेगा)

SarkariNaukriBlog com शुक्रवार, 13 नवंबर 2009
सही मौके को गंवाते लोग

आजकल झारखंड के भूतपूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा द्वारा 4000 करोड़ रुपये से ज्यादा के भ्रष्टाचार का मामला चर्चा में है। पता नहीं कभी आरोप सही भी सावित होंगे या नहीं, या फिर पुराने मामलों की तरह इसमें भी कुछ नहीं होगा और जनता सब जानकर भी कुछ नहीं कर पायेगी।
Never Loose a chance

लेकिन मै इस मामले को किसी और नजरिये से देखती हूं। मेरे विचार में मधु कोड़ा ने ये भ्रष्ट आचरण करके इतिहास में मिले एक सुनहरी मौके को गंवा दिया है। सोचिये कि एक खनिज खान में काम करने  वाला आदमी, एक गरीब घर का आदमी एक राज्य का मुख्यमंत्री बन गया वो भी निर्दलीय हो कर। ये कहानी कुछ मंबईया फिल्मों की तरह की है जो कि लोक गाथा बन सकती थी अगर मधु कोड़ा ने कुछ काम दिल से किये होते। गरीब आदमी से मुख्यमंत्री तक के सफर में मधु कोड़ो ने जो कुछ देखा और जाना उसके बाद वो कुछ ऐसे काम कर सकते थे जिससे झारखंड की जनता का बहुत फायद हो सकता था। लेकिन करोड़ों लोगो मे किसी एक आदमी को मिलने वाले इस मौके को मधु कोड़ा ने गंवा दिया और अपने साथ-साथ अपने राज्य के लोगो को भी निराश किया।

यों इस तरह से अच्छे भले मौकों को गंवाने के किस्से हजारों सालों से हैं, लेकिन मैं पिछले 10-12 सालों के अपने सामने गंवाये गये कुछ मौकों को यहं पर बताना चाहूंगी।
  1. रूबईया और आईसी 814 विमान अपहरण केस – ये ऐसे वाक्ये थे जब देश के लोग और  सरकार एक सख्त रुख अपना कर दुनिया को दिखा सकते थे कि भारत  गलत बातों पर समझौता नहीं करेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ और दुनिया में और खास कर आतंकियों को संदेश मिल गया कि भारत लड़ना नहीं जानता।
  2. मध कोड़ा – जैसा कि मै उपर बता ही चुकी हूं कि किस प्रकार मधु कोड़ा ने मौका गंवा दिया।
  3. लालू प्रसाद यादव -  लालू प्रसाद ने भी कुछ कुछ मधु जैसा ही काम किया। लालू ने भी अपनी जिंदगी मे वो सब खुद देखा है जिसको जानने के लिये पुराने जमाने के राजा भेष बदल कर अपने राज्यों में घूमा करते था, या फिर आजकल राहुल गांधी जानने के लिये घूम रहे हैं। लालू प्रसाद के पास बिहार और दबे, कुचले, पिछड़े गरीब लोगों के लिये काम करने का बहुत ही अच्छा मौका मिला था। जनता ने भी 15 साल तक इसी उम्मीद में लगातार उनको सत्ता में रखा लेकिन बिहार का विकास दूर वो बिहार को और पीछे कर गये। लालु चाहते तो बिहार कहां से कहां पहुंच जाता।
  4. अटल बिहारी बाजपेई और भाजपा -  आजादी के बाद से ही भाजपाई (पहले के जनसंघी) कांग्रेस को अपने निशाने पर लेते रहे कि कांग्रेस ने ये गलत किया, वो गलत किया आदि आदि लेकिन जब भारत की जनता ने तमाम राज्यों में और केन्द्र में भाजपा को मौका दिया तो शासन तंत्र उसी तरह चलता रहा जैसे कि पहले गैर भाजपाई शासन में चलता था। क्या कोई बता सकता है कि  कांग्रेस शासित और भाजपा शासित राज्यों की शासन संरचना और तंत्र में क्या अलग है?  भाजपाईयों ने जिस बात के लिये इतने साल संघर्ष किया और अपनी बारी का इंतजार किया, लेकिन मौका मिलने पर उससे कुछ भी अलग न कर के दिखाया और इतिहास द्वारा मिला सुनहरी मौका गंवा दिया।  
  5. मायावती – मायावती दलितों की एक सशक्त नेता हैं इसमें कोई दो राय नहीं। इसी बात की वजह से उत्तर प्रदेश की जनता ने खास कर दलितों ने पूरे बहुमत से जिता कर सरकार बनाने का मौका दिया है। और ये मौका ऐसा हो कि मायावती चाहे तो इतिहास में हमेशा के लिये स्थान बना सकती हैं। लेकिन मुझे लगता है  वो ये जबर्दस्त मौका गंवा रही हैं। दलितों, गरीबो, पिछड़ों के विकास के लिये जी जान से न लग कर वो बस मूर्तियां और पार्कों के निर्माण में ज्यादा रुचि दिखा रही हैं।  प्रदेश की जनता खासकर दलित वहीं हैं जहां पहले थे, आज भी सड़क, बिजली, पानी, सफाई, शिक्षा वैसी ही है जैसी कि मायावती के मुख्यमंत्री बनने से पहले थी।
  6. राजीव गांधी – राजीव गांधी को भारत की जनता ने लोकसभा में 425 सांसदो का भारी बहुमत दिया था। ऐसा बहुमत को नेहरु और इंदिरा गांधी को भी नहीं मिला था। राजीव गांधी ने नया जमाना  देखा था, उम्र उनके साथ थी, वो भारत के सिस्टम ने काफी परिवर्तन कर सकते थे लेकिन उन्होंने तो एक तरह से हारी हुई सरकार की तरह से भ्रष्ट्राचार पर ये कह कर मुहर लगा दी कि सरकार द्वारा खर्च किये गये 1 रुपये में से केवल 15 पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। राजीव गांधी ने इतिहास का सबसे बहुमत लेकर भी मौका गंवा दिया।
  7. विनोद कांबली – सचिन तेंदुलकर आज भी खेल रहे हैं और रन बना रहे है लेकिन उन्ही का बचपन का साथी और उन्ही की तरह का प्रतिभावान क्रिकेट खिलाड़ी विनोज कांबली मौके गंवा चुका है। विनोद कांबली का रिकोर्ड तेंदुलकर से भी अच्छा था और वो भी लंबे समय तक खेल कर अनेक रिकार्ड बनाते लेकिन उन्होंने गैर क्रिकेट बातों में पड़ कर मौका गंवा दिया।
इसी प्रकार के बहुत सारे अन्य लोग हैं जिन्हें मौका तो मिला लेकिन उसक फायदा न उठा सके। जहां एक ओर सनुहरी मौके गंवाने वाले लोग हैं वहीं दुनिया ऐसे लोगो से भी भरी हुई है जिन्होंने उनको मिले मौके का फायदा उठाकर दुनिया को बहुत कुछ दिया। 

SarkariNaukriBlog com गुरुवार, 12 नवंबर 2009
हमें तो भूतों से शिकायत है

जी.के.अवधिया जी ने अपने ब्लॉग धान के देश में भूतो के उपर पूरा शोध पत्र पेश किया है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर तो भूतों पर कोई विश्वास नहीं है लेकिन जितना भी भतों के बारे में जानकारी है वो सब राजकुमार कोहली, रामसे बंधुओं और रामगोपाल वर्मा और कुछ हॉलीवुड के फिल्मकारों के कारण ही है। इन्हीं लोगों ने फिल्में बनाकर हमें जागरुक किया है कि भूत होते हैं, कैसे दिखते हैं, किस प्रकार लोगो के उपर आ जाते हैं, किस प्रकार वो अपने दुश्मनों से बदला लेते है आदि आदि। इसके अलावा सत्य कथा और मनोहर कहानियां भी इस प्रकार की बातो को प्रकाशित करते रहे हैं जिसमे बताया जाता रहा कि कैसे किसी के उपर भत आ गया और कैसे बहेड़ी के मौलवी साहब ने उसको काबू में किया इत्यादि इत्यादि। मै तो तो इन्हीं फिल्मकारों और प्रकाशकों की रचनाओं को ही  प्रमाणिक मानकर चलती हूं और इन्हे ही भूतों का विशेषज्ञ समझती हूं और उसी के आधार पर मेरी कुछ धारणायें हैं और भूतों से कुछ शिकायतें भी हैं ।

  1. भूत-प्रेत हमेशा गरीबों को ही परेशान करते हैं। देखिये फिल्मों मे भी या असल जिंदगी में  (सत्य कथा और मनोहर कहानियां के आधार पर) किसी गांव के किसी आदमी या औरत के उपर भूत आ गया। क्या आपने कभी पढ़ा या सुना कि दिल्ली, मंबई के किसी टाटा, बिड़ला, अंबानी, बच्चन, कपूर, गांधी के घर में कोई भूत की प्रवेश करने की हिम्मत भी हुई हो? तो हम क्यों न माने की भूत का जोर भी बस गरीब पर ही है।
  1. भूत हमेशा अपने अपमान का बदला लेता है। अब हमने तो फिल्मों और कहानियों मे ये ही पढ़ा है। लेकिन असल जिन्दगी मैंने कभी नहीं पढ़ा कि किसी भूत ने अपनी मौत का बदला ओसामा बिन लादेन, वीरप्पन, प्रभाकरण, चंगेज खां, तालीबान इत्यादि से लिया हो। तो क्या भूत भी बड़े-बड़े आतंकवादियों और अपराधियों से डरते हैं?
  1. कुछ भूत अच्छे होते है । हो सकता है कि अच्छे होते हों लेकिन कभी भी बुरे आदमी को ऊतों से परेशान होते नहीं सुना। कितनी ही आतंकी घटनायें जैसे कि 9/11, 7/7, 26/11  इत्यादि हईं, कितने ही जुल्मी लोग इतिहास में हुये लेकिन किसी को भी भूतों ने परेशान नहीं किया। क्या अच्छे भूतो को आतंकियो, डकैतों, जुल्मियों को परेशान नहीं करना चाहिये था?
  1. भूत सुनसान, उजाड़ जगह व जंगल वगैरह में रहते हैं।  ऐसी ही जगहों पर आतंकवादी, डाकू, चोर, लुटेरे रहते हैं, लेकिन उनको कोई भूत नहीं दिखता लेकिन यदि कोई सीधा-सादा गांव वाला अगर उधर चला जाये तो उसे परेशान कर देते हैं। बहुत नाइंसाफी है ये।
इस तरह मेरे को भूतों से शिकायत है। हिंदी ब्लॉग जगत में जिन लोगों को भूतों के होने का पूरा भरोसा है और जो ये जानते हें कि वो कहां रहते हैं, उनसे निवेदन हे कि मेरी ये शिकायतें भूतो तक पहुंचा दें।

SarkariNaukriBlog com सोमवार, 9 नवंबर 2009
सवाल ये है कि आप क्या कर लेंगे?

अमेरिका की एफबीआई ने बीते दिनों पाकिस्तान मूल के अमरीकी डेविड हेडली और पाकिस्तान में जन्मे कनाडाई नागरिक टी. हुसैन राणा को आतंकी साजिश के सिलसिले में गिरफ्तार किया था। दोनों लश्कर के इशारे पर भारत और डेनमार्क में हमलों की साजिश रच रहे थे। इस सिलसिले में भारत के गृहमंत्री चिदम्बरम जी ने कहा कि इसमें पाकिस्तान का हाथ साफ है। इससे पहले पिछले साल जुलाई और इस साल अक्टूबर में काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर भी हमले किये गये थे जिन में भारत ने पाकिस्तान और उसकी आईएसआई व तालीबान का नाम लिया था और सबूत पेश किये थे। मंबई में 26/11 के भीषण हमले में भी भारत ने पाकिस्तान का नाम लिया था। मेरा सवाल भारत सरकार से ये है कि जब इन सबके पीछे आईसएसआई और पाकिस्तान है ये बात सब जानते हैं लेकिन आप ने ये सब जानने के बाद क्या किया ये कोई नहीं जानता। आप तो  पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देते हैं, कभी पाकिस्तान को आतंकवाद का शिकार बताते हैं, कभी शर्म अल शेख में उससे समझौता कर लेते हैं, कभी उसको वार्ता के लिये आमन्त्रण देते हैं। तो फिर किसी भी घटना होने पर केवल पाकिस्तान का नाम लेने से क्या होगा? कुछ कर के भी तो दिखाइये। आईएसआई और पाकिस्तान बार-बार घटनाये करते जाते हैं और आप बस उनका नाम ले लेते हैं। मैं कहती हूं कि आईएसआई का हाथ है तो आप उसका क्या कर लोगे?

SarkariNaukriBlog com शनिवार, 7 नवंबर 2009
जाना हुआ अपोलो हॉस्पिटल में

पिछले दिनों हमारे एक परिचित दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में सीने में दर्द के कारण भर्ती थे और सबसे अच्छी बात मुझे जो लगी जिसका वजह से मैं ये पोस्ट लिख रही हूं कि वहां पर हर बोर्ड पर अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में जरुर लिखा हुआ है और इसका ध्यान हर जगह रखा गया है। अधिकांश प्राइवोट संस्थानों में केवल अंग्रेजी में ही सब कुछ लिखा मिलता है लेकिन अपोलो अस्पताल शायद अपवाद है मुझे ये देख बहुत ही अच्छा लगा और इसके लिये मैं अपोलो अस्पताल की प्रशंसा करना चाहुंगी। अपोलो हॉस्पिटल उनका इलाज ह्रदय रोग विभाग में चल रहा था, तो हम लोग उनको देखने और मिलने के लिये वहां पर गये थै। अपोलो अस्पताल के बारे में हमने पहले काफी सुन रखा था जिस में से अधिकांश नकारात्मक था। ये अस्पताल काफी मंहगा है और पांच सितारा स्तर की सुविधायें हैं। बहरहाल हम जब वहां पहुंचे तो पता चला कि पार्किंग वैसे तो काफी बड़ी है लेकिन पूरी भरी हुई थी और प्रति आगमन 25 रूपये का शुल्क लगता है। खैर किसी तरह जगह मिली और गाड़ी खड़ी करके हम लोग अपोलो अस्पताल के अन्दर गये।  अस्पताल के अन्दर की लॉबी काफी अच्छी बनी हुई है और वहां पर लोगो के बैठने के लिये बहुत सारी कुर्सियां लगी हुई हैं। यहीं पर लोगो के खाने पीने के लिये काफी हॉउस व अन्य दुकाने भी हैं।

मैने देखा कि अफगनिस्तान के लोगों के लिये अपोलो में एक विशेष काउंटर खोला हुआ है और इस अस्पताल में बहुत सारे विदेशी लोग इलाज कराने आते हैं खास कर अफगानी और इराकी लोग। हम ने बहुत सारे विदेशियों को वहां देखा।  अपने परिचित से मिलने के समय मैंने देखा कि वहां पर मेडिकल से संबंधित काफी सुविधायें हैं बहुत सारे उपकरण हैं हालांकि इलाज काफी मंहगा है। लेकिन इसके बावजूद अपोलो अस्पताल में काफी भीड़ दिखी। इससे ये पता चलता है कि लोगो को अच्छा इलाज चाहिये भले ही वो मंहगा हो।  लेकिन आम आदमी क्या करे? क्या उसके लिये बिना सुविधाओं के सरकारी अस्पताल ही बने हैं?

SarkariNaukriBlog com सोमवार, 2 नवंबर 2009