पेट पूजा नहीं पीट पूजा

ये चित्र दिल्ली में एक फल और उनका रस निकाल कर बेचने की दुकान का है जो कि लोगों को पेट पूजा के लिये बुलाना चाहता या फिर पीट पूजा के लिये। हम लोग रविवार को इंडिया गेट घूम कर मैट्रो ट्रेन पकड़ने के लिये जब केन्द्रीय सचिवालय स्टेशन गये तब इस पर नजर गई।
Peat-Puja

SarkariNaukriBlog com बुधवार, 28 जुलाई 2010
अब क्यों नहीं देख रहे पुलिस से परे?

पिछले सालों में जब भी कहीं आतंकवाद की घटनायें घटती थीं और मुस्लिम बस्तियों से लोगों को पकड़ा जाता था या पुलिस से परे देखो या फिर पुलिस की हर बात यकीन लायक नहीं इत्यादि। तब पत्रकारों द्वारा पुलिस की गलतियों के कुछ लेख भी छपे थे। लेकिन यही पत्र-पत्रिकाये के यही पत्रकार लोग भाजपा (बाजेपी) या गुजरात से संबंधित या फिर कथित हिंदु आतंकवाद की बात आने पर पुलिस या सीबीआई की हर बात को अटल सत्य मान कर तुरंत भाजपा और आरएसएस पर हमला बोलने लगते हैं। अभी अमित शाह के मामले में भी सब सीबीआई द्वारा किये जा रहे काम पर अब कोई पत्रकार नहीं कर रहा की हमें सीबीआई से परे देखना चाहिये। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। अब क्यों सीबीआई की हर बात अटल सत्य है?
फिर किसी को माओवादी होने के संदेह में पकड़ा जाता था, या फिर कश्मार में किसी को गिरफ्तार किया गया हो, तब तमाम पत्र-पत्रिकायों और टीवी के कुछ समाचार पत्रों नें इस बात को जोर शोर से कहना शुरु किया था कि पुलिस की हर बात पर यकीन नहीं करना चाहिये। बात भी सही है, लोकतंत्र में पत्रकारों के हमेशा ही  अपनी पैनी नजर रखनी ही चाहिये और अपने तरीके से जांच करनी चाहिये। उस समय कुछ जुमले बनाये गये मसलन

SarkariNaukriBlog com मंगलवार, 27 जुलाई 2010
एसएमएस विज्ञापनों ने परेशान कर रखा है

SMS Advertisements
एक समय था जब मोबाइल फोनों पर टेली मार्केटिंग कंपनियों ने लोगों को गाहे-बगाहे अपने प्रोडक्ट बेचने के लिये फोन कर कर के दुखी कर दिया था। तब लोगों ने परेशान होकर परकार और कोर्ट तक अपनी आवाज पहुंचाई जिसक वजह से परेशान न करे (Do not Distrub)  की सुविधा शुरु की गई जिसकी वजह से बिना बात के आने वाले कॉलों से तो लोगों को कुछ हद तक छुटकारा मिल गया है। लेकिन टेली मार्केटिंग और मोबाईल कंपनियों ने अब लोगों को एसएमएस के जरिये विज्ञापन भेजने शुरु कर दिये हैं कि इनसे भी परेशानी होनें लगी है। पूरे दिन इन अनचाहे संदेशों को मिटाते रहना पड़ता है। विज्ञापन भी बस भेज दिये जाते हैं, पाने वाले की स्थिति का कोई ध्यान नही है। सबसे ज्यादा संदेश प्रोपर्टी खरीदने के आते हैं। इस बारे में भी लगता है हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का ही सहारा लेना पड़ेगा। टीआरएआई (TRAI) तो शायद मोबाईल कंपनियों के हित के लिये ही बनाई गई हैं, उपभोक्ताओं की सिर दर्दी को देखना वाला कोई नहीं है।

SarkariNaukriBlog com शुक्रवार, 23 जुलाई 2010
बरसात के बारे में मौसम वैज्ञानिक क्यों फेल हैं?

पूरे उत्तर भारत में अभी तक ढंग से मानसुन की बारिश नहीं हुई है। कहीं पर कुछ कुछ बारिश हुई है, कहीं पर एक बार जोर से बरसात हो गई और उसके बाद फिर से साफ आसमान है, कुल मिला कर मानसून अभी तक नहीं आया है। मौसम वैज्ञानिकों ने पहले कहा कि मानसून अपने निर्धारित समय पर आ जायेगा। वो नहीं आया।  फिर कही कि एक हफ्ते के बाद आयेगा। फिर कहा कि देर से भले ही आये लेकिन बादल खूब बरसेंगे। फिर एक दिन जब दिल्ली में पानी बरसा तो अपने को बचाने के लिये बोल दिया कि दिल्ली में मानसून आ गया जो कि इस घोषणा के बाद फर गायब हो गया। इसके बाद देश के उत्तर भाग में कहीं कहीं बारिश हो जाती है पर लगातार कहीं भी बारिश नहीं रही है।

या तो मौसम पूर्वानुमान की वैज्ञानिक विधि चूकती है या हमारे विज्ञानियों की गणना में कोई गलती रह जाती है या बरसात के बादल ही बार-बार खुद को आवारा साबित करते हैं- कुछ तो होता है, जिसके कारण खेती और जीवन से जुड़े मानसून की शुरूआत का निश्चित समय बताना अब भी कठिन बना हुआ है। पहले जिस बारिश को मानसून से पहले की बारिश कहा जाता था उसे ही अब मानसून कहा जाने लगा है।


पिछले कई बर्षों से ऐसा हो रहा है। हर साल अप्रैल के महीने में भारत सरकार का मौसम विभाग विज्ञान और तकनीकी मंत्री जी को कुछ आंकड़े देकर एक प्रेस कोंफ्रेंस करवाता है जिसमें मंत्री जी गर्व से घोषणा करते हैं कि देश में इस बार 93-98 प्रतिशत बारिश होगी (जानबूझ कर 100 प्रतिशत नहीं बोला जाता है) और मानसून देश में समय से आयेगा इत्यादि। समाचार पत्रों में चित्र के साथ समाचार छप जाता है। फिर जून का महीना आता है और सब मानसून का इंतजार करते है। लेकिन मानसून देर से आता है, उसमें भी बहुत मस बारिश होती है। फिर संसद के मानसून सत्र में कम बारिश को लेकर सवाल किये जाते हैं। मंत्री जी जबाव में कुछ आंकड़े पेश करते हैं और साथ ही ये भी बताते हैं कि मौसम विभाग से मानसून के अनुमान लगाने के लिये नया मॉडल बनाने को कहा गया जिसके लिये विभाग को XXXX  करोड़ रुपयों की आवश्यकता पड़ेगी जिसके लिये मंत्रीजी संसद में अनुदान मांगो के एक प्रस्ताव लेकर आ जाते हैं। फिर अगला साल आता है और फिर नये मॉडल से साथ मंत्रीजी प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और फिर वही होता है। आखिर ये सब कितने सालों तक चलता रहेगा?

SarkariNaukriBlog com बुधवार, 14 जुलाई 2010
अब नये डोमेन नाम हिंदीडायरी.कॉम पर

अब नये डोमेन नाम हिंदीडायरी.कॉम पर

अब मैंने अपने हिंदी ब्लॉग को पुराने डोमेन नाम से नये डोमेन नाम हिंदीडायरी.कॉम (http://www.hindidiary.com) पर स्थानान्तरित कर लिया है।
www.HindiDiary.com

अब नये डोमेन नाम हिंदीडायरी.कॉम पर

SarkariNaukriBlog com शुक्रवार, 9 जुलाई 2010