फ़रवरी 2016

अपने घर में दो महीने का राशन हर समय रखना चाहिये


हरियाणा राज्य में जाटों के आरक्षण के चलते लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ी है। कई सरकारी इमारतों और संपत्तियों को जला दिया गया हैं। शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया है और गांवो तक जाने के रास्ते भी बंद हो गये। इस हिंसा मे 12 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और सैकड़ो लोग घायल हुये हैं।

Unrest दंगा


हालांकि  अब सरकार ने जाट आंदोलनकारियों की मांगे मान ली हैं और हरियाणा के जाटों को आरक्षण मिलना अब तय है।

मेरा यहां पर ये सब बताने का उद्देश्य अलग हैं। मैं यह बताना चहती हुं कि भारत के किसी भी हिस्से में कहीं भी कभी भी ऐसा परिस्थिति आ सकती है जिसमें आप को कई दिनों तक घर में बंद रहना पड़े और आपको  सामान्य जीवन बिताने के लिये काम आने वाली वस्तुओं की किल्लत झेलनी पड़े। 

इसके लिये मेरे विचार में अपने घर में कम से कम दो महीने का राशन हर समय रखना चाहिये। पता नहीं कब किस कारण से सामान मिलना बंद हो जाये।

याद कीजिये इस से पहले चेन्नई में अचानक बाढ़ के कारण लोगों के कितनी परेशानी उठानी पड़ी थी। श्रीनगर (कश्मीर) और मुंबई में भी ऐसा हो चुका है।  

कब किस कारण से एकदम से कब बाजार से क्या गायब हो जाये कुछ कह नहीं सकते।

पहले जमाने में घर बड़े होते थे और सामान रखने के जगह होती थी, साथ ही साथ भारत का राजनीतिक वातावरण अस्थिर और अराजक था, इसलिये लोग घर में काफी सारा राशन इत्यादि घर में रखते थे कि पता नहीं कब परेशानी आ जाये। 

अब लोग छोटे घर और फ्लैटों में रहते हैं जिनमें ज्यादा सामान रखने की जगह नहीं होती है। 

इसके अलावा बाजार में पैकिंग मे सब सामान भी उपलब्ध रहता है इसलिये लोग बाग अपना घर में ज्यादा सामान नहीं रखते हैं। 

लेकिन अब जिस तरह का वातावरण हरियाण में बना और चेन्नई में हुआ उसको देखते हुये समझदारी इसी में है कि लोग अपने घर में लंबे समय के हिसाब से राशन रखें। कुछ नहीं तो दाल और चावल तो ज्यादा मात्रा में रखा ही जा सकता है।

संपादन - 1 (मई 2020)

अभी पूरे भारत में कोरोना वायरस महामारी के चलते लॉकडाउन कर दिया गया है और इस की वजह से लोगों को काफी परेशानी उठानी पड़ रही है। गरीब लोगों को खाने के लाले पड़ गये हैं। 

ऐसे में मेरी पहले से ऊपर लिखी बात को बल मिलता है कि अगर सब कुछ छोड़ कर सबसे पहले अपने घर में खाने का राशन रखा हो तो तमाम विपरीत परिस्थितियां आराम से काटी जा सकती हैं।

Manisha सोमवार, 22 फ़रवरी 2016


अगर आप ने पिछले कुछ सालो में भारत के प्रमुख शहरों में बिल्डरों द्वारा बनाये जा रहे रिहायशी परियोजनायों  के लिये दिये जा रहे विज्ञापनों को अगर ध्यान से देखा हो तो आपने देखा होगा कि अधिकांश परियोजनायों में   गोल्फ कोर्स को आधार बनाया गया है। यानी कि एक  गोल्फ कोर्स विकस्त किया जाता है और उसके चारों ओर बिल्डिंग और विला बनाये जातो हैं।  बड़े बड़े रंगीन विज्ञापनों में लोगों को गोल्फ खेलते हुये दिखाया जाता है। लोग इन  गोल्फ आधारित रिहायशी परियोजनायों को पसन्द भी कर रहे हैं।  हालांकि और को खेल जैसे कि क्रिकेट और हॉकी के लिये कोई बिल्डर मैदान नहीं छोड़ता है और न हीं लोगबाग इसकी मांग ही करते हैं।  ऐसा लगता हे कि गोल्फ भारत का सबसे लोकप्रिय खेल बन गया है।

Golf Course

Manisha गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

सरकारी नौकरियों में अब ठीक से ऑनलाईन फार्म भरने शुरु हुये हैं


सरकारी नौकरियों के बारे में जानकारी देने वाले अपने ब्लॉग को चलाने के पिछले कई वर्षों के दौरान मैंने देखा कि अधिकांश सरकारी संस्थानों द्वारा नौकरी के लिये ऑनलाईन फार्म भरने की कोई सुविधा उम्मीदवारों को नहीं दी जाती है। 

कई सरकारी संस्थानों का तो अपनी वेबसाइट भी नहीं थी और कई की तो अभी तक नहीं है। ऐसे में कुछ सरकारी संस्थानों द्वारा  उम्मीदवारों को ऑनलाईन फार्म भरवा कर सुविधा देना संभव ही नहीं था। 

सबसे पहले कुछ सरकारी उपक्रमों (Public Sector Units) और सरकारी बैंकों द्वारा अपनी नौकरियों में इस तरह की सुविधा देने की कोशिश की गई थी। इस प्रक्रिया में उमीदवार को अपना फार्म को ऑनलाईन ही भरना होता था लेकिन उसके बाद उसको प्रिंट करके और मांगे गये परीक्षा शुल्क का बैंक ड्राफ्ट बनवाकर निर्धारित पते पर डाक द्वारा भेजना होता था। 

ये प्रकिया कहने को तो ऑनलाईन थी लेकिन उम्मीदवार को वो सारे काम करने पड़ते थे जो कि डाक द्वारा ऑफलाईन तरीके से फार्म भरने में करना पड़ता था साथ ही साथ किसी साइबर कैफे में जा कर ऑनलाईन फार्म भर कर उसे प्रिंट करने और अपना समय व पैसा खर्च करने का झंझट और रहता है।

कुछ सरकारी बैंको ने इसमें कुछ सुधार किया और कहा कि ऑनलाईन फार्म भरकर भेजने के साथ पैसा भेजने कि आवश्यकता नहीं है बल्कि संबंधित बैंक की किसी भी शाखा में जाकर जमा करा सकते हो और बस उसका रसीद नंबर, दिनांक और रकम को ऑनलाईन फार्म में भर दो और भेज दो। 

बैंकों ने अब कुछ समय के बाद और सुधार करते ये कहना शुरु कर दिया है कि उम्मीदवार को अपना ऑनलाईन फार्म भर कर भेजने की जरुरत नही हैं, बस उसको प्रिंट करके अपने पास रख लो और परीक्षा या साक्षात्कार के समय जमा कराना या दिखाना पड़ेगा। 

इससे उमीदवारों का कम से कम डाक से फार्म भेजने की परेशानी तो खत्म हो गई। लेकिन इसमें अभी भी ऑनलाईन तरीके से नेट बैंकिग या क्रेडिट कार्ड द्वारा पैसे लेने की को सुविधा के बारे में नहीं सोचा गया था।

इसके बाद हालांकि अब अब अलग बैंकों द्वारा अपनी चयन प्रकिया के लिये अपने अपने आवेदन मंगाने के झंझट से बचाने के लिये IBPS (The Institute of Banking Personnel Selection) द्वारा केंद्रीय चयन प्रक्रिया हो रही है। हालांकि स्टेट बैंक अभी भी अपनी अलग चयन प्रक्रिया का आवेदन मंगाता है।

आखिरकार सरकारी नौकरियों के असली वाहक संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) , कर्मचारी चयन आयोग (SSC) व कुछ राज्यों के लोक सेवा आयोगों (Public Service Commission) ने भी ऑनलाईन परीक्षा फार्म भरवाने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी है। 

इसमें उम्मीदवार परीक्षा शुल्क नेट बैंकिग, क्रेडिट कार्ड व किसी बैंक के द्वारा या निर्धारित डाकघर के द्वारा पैसा जाम करा सकते हैं और साथ ही साथ प्रिंट करके  करके फार्म भी नहीं भेजने हैं यानी की परीक्षा फार्म भरने की पूरी प्रक्रिया का ठीक से कंप्यटरीकरण शुरू कर दिया गया है। 

अब अगले चरण में शायद ऑनलाईन परीक्षा के बारे में सोचा जायेगा।

वैसे सबसे पहले तो सभी संस्थानों की अपनी वेबसाइट होनी चाहिये और साथ ही सरकारी संस्थानों को ऑनलाईन फार्म भरवाना आवश्य़क कर देना चाहिये और आने वाले समय में जब यूनिक आइडेंटिफिकेशन का काम सरकार द्वारा कर लिया जाये तब ये परीक्षा फार्म भरने का पुराना ढंग बदल दिया जाना चाहिये और उम्मीदवार से सिर्फ उसका पहचान नंबर लेना चाहिये क्योंकि सारी की सारी जानकारी  तो सरकार के डेटाबेस में होगी ही।

Manisha मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

शादी है जी आपको परेशानी तो होगी ही


Indian Marriage शादी का मौसम है। हर तरफ घुड़चड़ी और बैंडबाजों का माहौल है। लोग सड़कों पर पटाखे चला रहे हैं, और नाच रहे हैं। शहनाई का सुर खुशियों में इजाफा कर रहा है। सड़क पर जश्न ही जश्न है। 

लेकिन इस जश्न के पीछे गाड़ियों का एक लंबा काफिला ऐसे लोगों का है जो उस बारात का हिस्सा नहीं हैं। सड़क पर जश्न मना रहे लोगों के कारण जाम की जो स्थिति उपजी है, वो उसी जाम के शिकार हैं। खुशियों का माहौल उनके लिये शोर-शराबे से ज्यादा कुछ भी नहीं है। 

करें भी तो क्या करें! बस मन ही मन कुढ़न के अलावा और चारा भी तो नहीं हैं। सोच रहे हैं कि इन लोगों में जरा भी सिविक सेंस नहीं है। अपनी खुशी में दूसरों को परेशान करने का अधिकार इन्हें किसने दे दिया?

दिन बदला और शादी की बारातों का सीन भी बदल गया। आज वो लोग एक बारात का हिस्सा बन गये जो कल तक जाम में फंसे कुढ़ रहे थे। आज मौका इनकी खुशी का है तो भला कोई कमी कैसे छोड़ दें? आज वो सड़क पर नाच-गा रहे हैं, पटाखे जला रहे हैं और मस्ती में झूम रहे हैं, पटाखे जला रहे हैं और मस्ती में झूम रहे हैं। आज उन्हें बारात के पीछे खड़े गाड़ियों के काफिले की कोई चिंता नहीं है। 

आज उन्हें नागरिक दायित्व भी याद नहीं आ रहे। बस सड़क पर नाचना, जाम लगाना व आयोजन स्थल के पास की जगह को अपनी बपौती समझना आदि-आदि उनके अधिकार में शामिल हैं। कर्तव्य बोध से अनजान हैं। उन्हें पता है कि कल जब वह जाम में फंसे थे तो उनकी क्या मानसिक स्थिति थी। आज नहीं फंसे हैं। आज उनकी खुशी का दिन है तो दूसरों को दुख तो झेलना ही पड़ेगा।

रोज कुछ लोग झूमते हैं, और रोज कुछ लोग कुढ़ते हैं। आखिर सामाजिक दायित्वों को समझने की पहल कौन करेगा?

30-40 साल पहले का समय है। बारात लड़की वालों के यहां जानी है। सभी बारात की तैयारियों में व्यस्त हैं। बच्चे नये कपड़े मिलने की खुशी में आनन्दित हो रहे हैं। बड़े लोग करीने से कड़क कलफ लगी हुई प्रेस किये हुये कपड़े पहन रहे हैं। लड़के के पिताजी ने रिश्तेदारी में एवं अड़ोस पड़ोस सब जगह पहचान के लोगों को व्यक्तिगत तौर पर न्योत दिया है। सब लोग खुश हैं, बारात में जो जाना है, वहां आवभगत होगी, सत्कार होगा, इज्जत होगी। 

लेकिन ये क्या लड़के के मामाजी जरा नाराज नजर आ रहे हैं। क्या बात हो गई? अजी, बस उन्हें लग रहा है कि उन्हें ज्यादा पूछा नहीं जा रहा है। लड़के के पिता तुरंत उनको मनाने आते हैं । थोड़ी मान-मनौव्वल के बाद वो मान जाते हैं। ऐसे ही बारात में जाने से पहले कई रिश्तेदार और पास-पड़ोस के लोग थोड़े नखरे दिखाते हैं और लड़के वालों को उन्हें बारात में ले जाने के लिये मनाना पड़ता है। 

लड़की के घर बारात पहुंचने पर बारात का स्वागत होता है। लड़की के घर के बड़े रिश्तेदारों से लड़के पक्ष के रिश्तेदारों की पहचान और मिलनी कराई जाती है। बरातियों के खाने-पीने का इंतजाम घरातियों से अलग किया गया है। सब खुश हैं।

समय बदलता है, अब का मौडर्न समय आ गया है। अब किसी के पास समय नहीं है। लड़के वालों ने सभी जगह शादी के कार्ड भेज दिये हैं। कार्ड में साफ लिखा है "कृपया इस कार्ड को ही व्यक्तिगत बुलावे की मान्यता प्रदान करें" । 

अब कोई रूठ जाये या नाराज हो जाये किसी को परवाह नहीं है। मामाजी नाराज हो गये तो हो जाने दो। ये भी हमारे काम नहीं आते हैं। अड़ोस-पड़ोस वालों को तो कोई चाहता भी नहीं कि वो बारात में जायें। 

दहेज अब ज्यादा लिया जाता है लेकिन रिश्तेदारों और अड़ोस-पड़ोस वालों से छुपाकर। 

लड़की वाले भी अब बाराती और घराती सब का इंतजम एक जैसा और एक ही जगह करते है। अब लड़की वाले भी लड़के वालों की तरह सूटेड-बूटेड सजे-धजे नजर आते हैं। बारातियों के आने तक खाने-खिलाने का एक दौर पूरा हो चुका होता है। 

पता ही नहीं चलता कि कौन लड़की वाला है और कौन घर वाला। लड़के की शादी है कि लड़की की शादी है ये फर्क भी पता नहीं चलता। रुठने मनाने की तो कौन कहे, कोई पूछने वाला तो हो?

रिश्तों के इस गिरावट के दौर के लिये जिम्मेदार कौन है?

Manisha सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

समाचार माध्यमों को लगता है कि दिल्ली ही भारत है


News Mediaकल दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में पहली बार मुसलाधार बारिश हुई जिसकी वजह से दिल्ली में अधिकांश जगह पानी भर गया और इसके कारण लोग बाग सड़कों पर जाम में फंस गये और घंटो बाद अपने घरों और गंतव्यों की ओर पहुंच पाये। 

हिंदी के अधिकांश टीवी समाचार चैनलों ने इसके ऊपर कार्यक्रम दिखाने शुरू करके सरकार को जमकर लताड़ लगाई। ये सब तो ठीक है और जिम्मेदार मीडिया को ऐसा ही करना चाहिये लेकिन क्या सिर्फ दिल्ली तक ही इस तरह की जागरुकता को सीमित रहना चाहिये? 

दरअसल, भारत के अधिकांश हिस्सों का हाल बारिश के दिनों में ऐसा ही हो जाता है बल्कि इस से भी बुरा हो जाता है, पर वहां के बारे में शायद ही कभी दिखाया या बताया जाता है। क्या भारत के अधिकांश शहरों में बारिश में पानी नहीं भरता है? क्या भारत के अधिकांश शहर बारिश में नारकीय दृश्य नहीं दिखाते हैं? तो फिर उनकी खोज खबर कौन लेगा? क्या माडिया के लिये शेष भारत कहीं है ही नही या फिर दिल्ली हीं इन के लिये भारत है?

दिलचस्प बात ये है कि अधिकांश पत्रकार बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड या अन्य राज्यों के हैं जहां पर बिजली, सड़क, पानी की हालत खराब ही है। बारिश में वहां की हालत बहुत ही खराब जैसी स्थिति रहती है लेकिन ये लोग कभी इन राज्यों की चर्चा भी नहीं करते हैं। 

पर दिल्ली में अगर आधे घंटे बिजली जाने पर विशेष कार्यक्रम दिखाते हैं, लेख लिखते हैं, बारिश के दिनों में जाम लगने पर संपादकीय लिखते हैं, 26 जनवरी की परेड़ के कारण लगने वाले जाम की चर्चा करते हैं लेकिन शेष भारत की किसी समस्या के बारें बहुत ही कम बात करते हैं। 

क्या आपने अपने शहर की समस्या के बारे में मीडियी में कोई प्रोग्राम देखा?

Manisha रविवार, 7 फ़रवरी 2016

लोकतांत्रिक देश में धरने प्रदर्शनों के लिये कोई जगह नहीं


हम लोग कई बार जब दिल्ली में घूमने के लिये निकलते समय अगर कनॉट-प्लेस के पास स्थित जंतर मंतर पर पहुंच जाते हैं तब वहां पर देखते हैं कि वहां पर सड़क के दोनो ओर कई प्रकार के धरने और प्रदर्शन चल रहे होते हैं, जिन कई व्यक्ति और संगठन अपनी विभिन्न मांगो को लेकर धरने में शामिल रहते हैं। 

कई बार शाम को वहां पर लोग मोमबत्तियां जला कर भी अपना विरोध किसी बात पर व्यक्त कर रहे होते हैं। इन लोगों को की वजह से जंतर मंतर पर काफी गहमा गहमी रहती है और पुलिस की भी व्यवस्था रहती है। 


कई मीडिया कर्मी भी वहां इन धरने प्रदर्शनों को कवर करने के लिये आते रहते हैं। इस के अलावा कई बड़े लोग जैसे कि खिलाड़ी, फिल्मी कलाकार और राजनेता इन धरने प्रदर्शनों को अपना समर्थन देने आते रहते हैं। 

एक लोकतांत्रिक देश में ये सब होते ही रहना चाहिये क्योंकि इसी से पता चलता है कि लोग अपनी आस्था लोकतंत्र में बनाये रखते हैं और इस विश्वास में रहते हैं कि उनकी बात सुनी जायेगी।


Delhi Dharna Place Jantar Mantar


इसी के पास संसद मार्ग पर संसद मार्ग थाने के सामने संसद का घेराव और कई बड़े राजनैतिक प्रदर्शनों के लिये आये दिन कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं जिन कई बार बड़े-बड़े राजनेता भी पहुंचते हैं।

लेकिन इस सब में लोगो कई प्रकार की परेशानियां उठानी पड़ती हैं। संसद मार्ग और उसके आस पास बहुत सारे सरकारी, गैर सरकारी व मीडिया के कार्यालय हैं जिनमें काम करने वाले कर्मचारियों को इस तरह के आये दिन होने वाले धरने-प्रदर्शनों की वजह से रास्ता परिवर्तन व भीड़-भाड़ होने से काफी परेशानी उठानी पड़ती है। 

अक्सर इनकी वजह से जबर्दस्त जाम लग जाते हैं जिसकी वजह से लोग इन धरने प्रदर्शन वालों और नेताओं को कोसने लगते हैं। इसके अलावा जो लोग जंतर मंतर पर पर धरने के लिये आते हैं उनके लिये भी किसी भी प्रकार के कोई इंतजाम नहीं होते हैं।

इसलिये मेरा मानना है कि दिल्ली में और हो सके तो सभी राज्यों की राजधानियों में जहां कि अक्सर किसी न किसी बात को लेकर धरने प्रदर्शन होते रहते हे वहां पर लोकतंत्र के इस जीवंत रुप के लिये स्थायी रुप से बड़ी जगह निर्धारित की जानी चाहिये जैसे कि इंगलैंड में लंदन में हाइड पार्क में किया गया है। साथ ही साथ पूरे क्षेत्र में पुलिस सुरक्षा, पेयजल की व्यस्था, शौचालय की व्यवस्था, मेडिकल की सुविधा भी प्रदान की जानी चाहिये। 

धरने के बाद जाम न लगे इसके लिये भी तजाम किये जाने चाहिये। क्या ये अपने आप मे विचित्र नहीं लगता कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आजादी के 70 से ज्यादा वर्षों के  बाद भी धरने-प्रदर्शनों के लिये कोई जगह नहीं हैं?

Manisha शनिवार, 6 फ़रवरी 2016