हमारे नान-स्टेट एक्टर क्यो नहीं बोलते हैं?

जब मुंबई पर 26/11 पर पाकिस्तानी हमला किया गया था तब वहां के राष्ट्रपति जरदारी ने कहा था कि ये नान-स्टेट एक्टर द्वारा किया गया काम है और इसमें पाकिस्तानी सरकार का कोई हाथ नहीं है। हाल ही में दुबई में इस्राइल के खुफिया विभाग मोसाद (सरकारी स्टेट एक्टर) ने जबर्दस्त खुफिया कार्यवाही को अंजाम देते हुये हमास के नेता को मार दिया।  दोनों ही तरह की घटनाओं को देखें तो पता चलता है अलग अलग तरह के स्टेट और नान-स्टेट एक्टर मिला कर किसी देश की कूटनीति और रणनीति चलती रहता है। पर भारत के संदर्भ में इसकी बात की जाय तो कोई भी एक्टर इस तरह का काम करता नजर नहीं आता। हाल ही में मुजफ्फराबाद और लाहौर में लश्कर के आतंकियों खासकर हाफिज सईद और अन्य ने भारत के खिलाफ जिहाद करने और भारत पर बम विस्फोट करने के भाषण दिये थे। कहने को तो भारत में कई नान-स्टेट एक्टर जैसे कि आरएसएअ, बजरंग दल, विश्व हिंदु परिषद, जमाते इस्लामी, मुस्लिम स्वयं सेवक संघ, माओवादी नक्सली, हुरियत कांफ्रेंस और कई सरकारी स्टेट एक्टर जैसे कि रॉ, आईबी, सेना, पुलिस इत्यादि सब हैं लेकिन किसी ने भी हाफिज सईद की बात का विरोध नहीं किया, किसी ने नहीं कहा कि हम ईंट का जबाव पत्थर से देंगे, किसी ने नही कहा कि हम भी जैसे को तैसा जबाव देंगे, एक फिल्मी एक्टर ने जरूर कहा कि पाकिस्तान एक महान देश है और वहां के खिलाडियों को भारत में क्रिकेट खेलना चाहिये बाकी फिल्मी एक्टर चुप्पी लगा गये। आखिर एेसा क्यों नही हो सकता कि  यहां पर भी पाकिस्तान की तरह से नान-स्टेट एक्टर पाकिस्तान को वैसा ही जवाब दें जैसा वहां के नान-स्टेट एक्टर भारत के लिये बोलते हैं। 

Manisha शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010
ई-गवर्नेंस से किसे फायदा हो रहा है?

आज से राजस्थान की राजधानी जयपुर में 13 वां राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस (ई-शासन) का सम्मेलन हो रहा है  जिसमें देश के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री, उनके विभाग, राज्य सरकारें एवं अन्य लोग भाग ले रहे हैं। देश में ई-गवर्नेंस  को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर एवं महत्वाकांक्षी रुप में पेश किया जाता है। ऐसा बताया जाता है कि सूचना प्रौद्योगिकी  की ई-गवर्नेंस  प्रणालियों से देश को और देश की जनता को बहुत फायदा पहुंच रह है या पहुंचने वाला है। लेकिन मेरे विचार में ऐसा नहीं है। ई-गवर्नेंस   से कुछ फायदा तो हो रहा है लेकिन ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है। इस बारे में मेरे विचार कुछ इस प्रकार हैं -
  1. सिस्टम वही का वही - ई-गवर्नेंस   प्रणालियां तो बन गई हैं लेकिन उनसे प्रशासनिक अव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। मिसाल के लिये अगर जन्म-मृत्यु के प्रमाण पत्र को लेने में अगर पहले 5 दिन लगते तो कंप्युटरीकरण के बाद भी इतने ही दिन लगते हैं यानी कि काम अभी भी उसी गति से हो रहा भले ही कंप्यूटर के ऊपर भारी खर्चा हो गया है। इसी तरह से आयकर के कंप्यूटरीकरण के बावजूद लोगों को आयकर का रिफंड लेने के लिये उतने ही धक्के खाने पड़ रहे हैं जितने की पहले। या फिर आय कर का रिटर्न भरना आज भी उतना ही जटिल है जितना पहले था। यानी ई-गवर्नेंस    का फायदा आम आदमी को नहीं पहुंचा है।
  2. मंहगा - ई-गवर्नेंस    के नाम पर लोगो को मिलने वाली सुविधायें मंहगी कर दी गई हैं मसलन रेलवे के टिकट पर कंप्यूटर के नाम पर सरचार्ज लगता है। या फिर उदाहरण के तौर पर दिल्ली में कंप्यूटर और स्मार्ट कार्ड वाले वाहन रजिस्ट्रेशन और वाहन लाइसेंस  की फीस बढ़ा दी गई है यानी लोगों को फायदा तो कुछ नहीं हुआ पर आर्थिक नुकसान जरुर हो गया।
  3. हिंदी और क्षेत्रीय भाषायों को नुकसान – अधिकांश कंप्यूटरीकरण व ई-गवर्नेंस     एप्लीकेशंस अंग्रेजी भाषा में हैं आम जनता की भाषा में नहीं। जैसे तैसे देश में राजभाषा के काम को बढ़ाया जा रहा था लेकिन ई-गवर्नेंस     के बाद उस पर पानी फिर गया है। जरूरत आम आदमी की भाषा में ई-गवर्नेंस     प्रणालियों की है।
  4. बाबुओं को फायदा - ई-गवर्नेंस     के नाम पर करोड़ों रुपये की योजनाये बना कर खरीदारी की जा रही है जिसमें जाहिर सी बात है कि क्या उद्देश्य रहता है।
  5. भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं - ई-गवर्नेंस     से कहीं भी किसी भी सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लग सकी है यानी सब कुछ वैसै ही चल रहा है।
ई-गवर्नेंस  कई जगह पर सफलता पूर्वक भी चल रहा जैसे कि रेल व हवाई यात्रा में रिजर्वेशन में। अधिकांश ई-गवर्नेंस  वहां तो सफल है जहां पर पैसे का लेन देने है, वाकई इससे आसानी हो गई है। लेकिन जब तक ई-गवर्नेंस  से आम जनता को परेशान करने वाली व्यवस्था नहीं बदलती तब तक ये सिर्फ एक ढोल पीटने जैसी बात रहेगी।

Manisha बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
आखिर भारत का संयम खत्म हो ही गया

कुछ दिन पहले पाकिस्तान में अमेरिका के रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स ने यह कहा था कि कि भारत का संयम खत्म हो सकता है। इसका सभी समाचार माध्यमों ने यह अर्थ निकाला था कि भारत पाकिस्तान की तरफ से किसी भी प्रकार के आतंकी हमले के लिये जैसे को तैसा की तर्ज पर कार्यवाही करेगा। 26/11 के आतंकी हमले का बाद से भारत ये कह रहा था कि पाकिस्तान अपने यहां के आतंकियों के खिलाफ कार्यवाही करे और तभी पाकिस्तान के साथ बातचीत की जा सकेगी। लेकिन अब पता चला रहा है कि राबर्ट गेट्स का मतलब ये था कि भारत तो बातचीत करने के लिये अपना धैर्य खो सकता है, यानी भारत तो तैयार बैठा था बातचीत करने के लिये। अब भारत ने अपनी तरफ से बिना किसी कारण के, बिना किसी प्रकार की उपलब्धि पाये, बिना तैयारी के पाकिस्तान के साथ बातचीत की पेशकश की है तो ये ही माना जाना चाहिये कि बात न करने का  भारत का संयम खत्म हो गया है। पाकिस्तानी तो हमेशा शायद जानते थे कि भारत जरूर एक दिन बात करेगा इसीलिये उन्होंने भारत की बात नहीं मानी और आतंकी संगठनों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की और अब तो वो अपने मुंह मिया मिठ्ठू भी बन रहे हैं कि उनकी वजह से भारत को बातचीत के लिये राजी होना पड़ा। भारत सरकार को कम से कम अपनी जनता को बताना ही चाहिये कि आखिर इतने दिनों बात न करने के बाद अब क्या उपलब्धि मिल गई जो बातचीत शुरु की जा रही है? भारत की सरकारें ऐसे ही तेवर दिखाती हैं और फिर वापस पाकिस्तान से बात शुरु कर देती हैं जिसका जबाव वहां से एक और नये आतंकी हमले के रुप में आता है।

Manisha सोमवार, 8 फ़रवरी 2010
लोगों की भाषा क्षमता कम हो रही है

आजकल हम रोज देखते हैं कि विभन्न कार्यक्रमों में लोग जो भाषा बोलते हैं वो इतनी हलकी होती है कि समझ में नहीं आता कि भाषाओं के मामले में समृद्ध भारत को क्या होता जा रहा है?  शिक्षा के तमाम अवसरों के बावजूद पढ़-लिखे लोग भी अनपढ़ों के बराबर ही लगते हैं। टीवी के विभिन्न चर्चा वाले कार्यक्रमों को देखिये, विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं को देखिये, नेताओं द्वारा दिये जाने वाले बयानो को देखिये, फिल्मों के संवादों को देखिये, संसद में होने वाली बहसों को देखिये आपको स्वयं समझ में आ जायेगा कि किस प्रकार की भाषा का प्रयोग होने लगा है।

देश में अब गंभीर किस्म की चर्चाओं, वार्ताओं, गंभीर विषयों पर बहस कम हो गई है। अब देश में क्रिकेट, आरुषि हत्याकांड, रुचिका कांड, ठाकरे मराठी मानुस, राहुल गांधीं इत्यादि विषयों पर बहस ज्यादा होती है। अंग्रेजी वालों ने तो कुछ कुछ चर्चा की लेकिन हिंदी वालों ने तो पचौरी और ग्लेशियरों के पिघलने और मौसमी परिवर्तन पर कुछ भी चर्चा नहीं की।

एक जमाने में हिंदी फिल्मों में जोरदार किस्म के संवाद लिख जाते थ, लेकिन अब गाली-गलौज भी  फिल्मों का हिस्सा  बनते जा रहे हैं। पिछले कई दिनो  के टीवी चैनलों को देखकर स्पष्ट है कि अब देश में गंभीर सार-गर्भित चर्चाओं का जमाना गया। अब संसद में सबसे ज्यादा लालू प्रसाद और उनकी जैसी भाषा बोलने वाले लोगों को ज्यादा प्रचार मिलता है।

इसके पीछे कई कारण हैं। अब भारत में अंग्रेजी स्कुलों और पब्लिक स्कुलों का जमाना है जहां पर बच्चों से अपनी भाषा में सोचने, बोलने का बजाय जबर्दस्ती अंगरेजी भाषा लादी जाती है। उपर से इंटरनेट और मोबाइल के जमाने में छोटा लिखने को प्रोत्साहित किया जाता है।  परीक्षाओं में भी अब वस्तुनिष्ठ (ओब्जेक्टिव टाइप) प्रश्न पूछे जाते है। ऐसे में छात्रों की भाषा पर पकड़ कमजोर ही रहती है।  अब हम लोगों में अपने विचार  अच्छी भाषा में प्रकट करने की क्षमता कम होती जा रही हैं। 

Manisha रविवार, 7 फ़रवरी 2010
कांग्रेस की किस्मत इस समय अच्छी है।

ज्योतिषी की बातें बताने वाले ब्लॉगर साथी लोग या फिर अन्य ज्योतिषियों द्वारा शायद न बताया गया हो लेकिन मुझे लगता है कि अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी की किस्मत इस समय बहुत ही अच्छी चल रही है। महंगाई इस समय देश में चरम पर है आप ही देखिये कि इस समय मायावती पर मूर्तियां और पार्क बनाने का आरोप है जिसे फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने रोक रखा है और वो केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित रह गई हैं, , नितीश कुमार की जद (यू) में भी झगड़ा चल रहा है, समाजवादी पार्टी में अमर सिंह ने मोर्चा खोला हुआ है, भाजपा में गिरावट है, हिंदुवादी शिवसेना, आरएसएस और भाजपा महाराष्ट्र में झगड़ रहे हैं, वामपंथी कमजोर हो चुके हैं और वहां भी आपसी मतभेद उभर आये हैं। ऐसे कमजोर विपक्ष के समय में अगर सत्तारुढ़ पार्टी की किस्मत अच्छी नहीं कही जायेगी तो क्या कहा जायेगा? 

Manisha सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
शराब पीकर दुर्घटना करने में भी बराबरी?

हम सब महिलाओं को उनके अधिकार और बराबरी के लिये संघर्ष करते रहते हैं। भारत में औरतों को अपना लेने के लिये कड़ॉ संघर्ष करना पड़ता है। हमें पुरुषों के समान अधिकार और सम्मान मिलना ही चाहिये। लेकिन कुछ बराबरी इस तरह की है कि औरतों को न ही मिले तो ठीक है। अभी तक पुरुषों द्वारा शराब पीकर सड़क पर अपनी गाड़ी दूसरों पर चढ़ा कर उनकी जान लेने या फिर उनको घायल करने की खबरें ही आया करती थीं, वहीं मुंबई की एक महिला नें अब इसमें भी अपना नाम जोड़ लिया हैं। शराबी महिला नें अपनी कार से पुलिस और की जीप और एक बाइक को टक्कर मार दी जिससे दो लोग मर गये जिसमें एक पुलिस सब-इंसपेक्टर है। मेरा सवाल है कि क्या औरतों को इस तरह की बराबरी चाहिये?  क्या बराबरी का मतलब पुरुषों जैसा बनना या फिर उनकी ही बुराईयों को अपनाना है। औरतो में भी शराब की लत खतरनाक तरीके से बढ़ रही है। मेरा तो स्पष्ट मानना है कि हां हमें हर तरह की बराबरी चाहिये लेकिन कुछ इस तरह से कि हम पुरुषों जैसे न बनकर बल्कि उनसे हटकर दिखें।  अगर महिलायें बुरे कामों में पुरुषों जैसी बनेंगी तो उनका ही नुकसान है। बस संतोष यही है


शराब पीने में भी आदमी औरत में बराबरी
खैर ये तो बात है महिला द्वारा शराब पीने की और पीकर गाड़ी चलाने की। पर असली कारण इसका वही है जिसके बारे मे अब कोई नही बोलना चाहता। वो है शराब। शराब पी कर गाड़ियां चलाने कर दुर्घटना होने के  मामलों की देश में वृद्धि हो रही है। सड़क पर यात्रा असुरक्षित होती जा रही है। इसी तरह से हवाई यात्रा में शराब पीकर हंगामा करने या एयरहोस्टेस को छेड़ने को केस बढ़ते जा रहा हैं। अब तो पयलटों द्वारा पीकर हवाई जहाज चलाने के किस्से भी  आ रहे हैं,  लेकिन कोई कहने वाला नहीं है कि शराब पीना गलत है। बल्कि अब तो समाज में शराब का रुतबा बढ़ गया है। रह जगह शराब की महिमा है, उसकी उपलब्धि बढ़ रही है। कोई पार्टी नहीं होती जहां शराब न हो, घरों में बार बनने लगे हैं, नाइट क्लबों की संख्या बढ़ रही है।  शराब का प्रचार खूब हो रहा है। किसी भी सामाजिक मनोरंजक या समाचार चानल पर कभी भी शराब के खिलाफ कोई कार्यक्रम नहीं दिखाया जाता है। आर्य समाज और गांधीजी ने बीसवीं सदी मे शराब के खिलाफ आंदोलन चलाकर कुछ काम किया था लेकिन इक्कीसवीं सदी आते-ते सब खत्म हो गया और अब लोग सड़कों पर हवाई यात्रा में असुरक्षित महसुसू करेंगे तब ही शायद कुछ विरोध शुरु होगा वर्ना तो समाज इस समय शराब के नशे में है।

Manisha