जुलाई 2020

बाढ़ आपदा प्रबंधन पर कैसे ध्यान दें और क्या करें? 


आजकल भारत में मानसून की बारिश का मौसम है। भारत के मौसम विभाग ने अप्रैल माह में ही बताया था कि भारत में इस बार अच्छी बारिश होगी। ऐसे  में स्वाभाविक है कि इस समय वर्षा होगी कहीं कम और कहीं ज्यादा। 

जहां ज्यादा बारिश होगी वहां बाढ़ का भी खतरा रहेगा। इस बाढ़ को लेकर हम हर साल समाचार पत्रों में और टीवी पर देखते रहते हैं। ये बाढ़ लोगों की जान और माल को भारी नुकसान पहुंचाती है। ऐसी खबरों को हर साल देख कर मन में ख्याल आता है कि शायद बाढ़ प्रबंधन पर कोई भी ध्यान नहीं दे रहा है। तो हमें बाढ़ आपदा प्रबंधन पर कैसे ध्यान देना चाहिये और क्या करें? 

Flood Management

बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र


इस समय भारत में बिहार, असम, अरुणाचल प्रदेश एवं उत्तर-पूर्व के कई क्षेत्रों में बिहार की बयावह स्थिति है। इसी बाढ़ के बीच मानसून की वजह से और रोजाना होने वाली और बारिश भी प्रशासन के सामने चुनौती बनी हुई है। भारी बारिश से देश के कई अन्य इलाकों भी में हाल खराब है। 

मुंबई, दिल्ली, गुजरात, राजस्थान के कई इलाकों में भी बारिश होने से पानी भरने से कई जगहों पर बाढ़ आई हुई है। 

ऐसे में मौसम विभाग द्वारा काफी इलाकों में भारी से भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। इससे हालात और खराब होने की संभावना है।

वर्तमान में भारत के कई क्षेत्रों के बारे में लगभग पहले से ही पता होता है कि बरसात के मौसम में थोड़ी सी ठीक बारिश होने पर बाढ़ आ सकती है। अब तो हालत ये हो गई है बाढ़ आपदा प्रबंधन न होने की वजह से बड़े बड़े शहरो जैसे कि चेन्नई, मुंबई, अहमदाबाद, श्रीनगर कहीं भी अचानक बाढ़ आ जाती है और जान माल का भारी नुकसान होता है।

भारत में प्रमुख बाढ़ क्षेत्रों में गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना और बिहार में नेपाल से लगता हुआ क्षेत्र जिसमें कोसी नदी का डूब क्षेत्र शामिल है। देश में नदियों के बहाव से आने वाली कुल बाढ़ का करीब 60 प्रतिशत इसी क्षेत्र में आती है। 

देश के बाढ़ की सर्वाधिक आशंका वाले क्षेत्रों में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के हिमालयी नदियों के थाले में आने वाले क्षेत्र शामिल हैं। जम्मू कश्मीर, पंजाब के कुछ हिस्से, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश को कवर करने वाले कुछ उत्तर-पश्चिमी नदी थालों में भी बाढ़ की आशंका रहती है। झेलम, सतलुज, व्यास, रावी और चेनाब मुख्य नदियां हैं जो इस क्षेत्र में बाढ़ का कारण बनती हैं।


मध्य प्रदेश, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र मध्यवर्ती एवं प्राय:द्वीपीय नदी थालों के अंतर्गत आते हैं, जहां नर्मदा, ताप्ती, चम्बल और महानदी जैसी नदियां बाढ़ लेकर आती हैं। गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार और कावेरी में भी भारी बाढ़ आने से विस्तृत भूभाग जलमग्न हो जाते हैं और बाढ़ की समस्या आमतौर पर गंभीर होती है।

राष्ट्रीय बाढ़ आयोग द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार देश में करीब चार करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी है, जिसमें बाढ़ की आशंका रहती है। औसतन हर वर्ष करीब 80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वार्षिक बाढ़ आती है, जिससे करीब 37 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित होता है।

एक अनुमान के अनुसार, देश में 60 प्रतिशत से अधिक नुकसान नदियों में आने वाली बाढ़ के कारण होता है। 40 प्रतिशत क्षति भारी वर्षा और तूफानों के कारण होती है। हिमालयी नदियां देश में होने  वाले कुल नुकसान में करीब 60 प्रतिशत योगदान करती हैं। 

प्रायद्वीपीय नदी थालों में अधिकतर क्षति चक्रवातों के कारण और हिमालयी नदियों में करीब 66 प्रतिशत नुकसान बाढ़ से और 34 प्रतिशत भारी वर्षा के कारण होता है। राज्यवार अध्ययन से पता चलता है कि देश में बाढ़ से करीब 27 प्रतिशत क्षति बिहार में, 33 प्रतिशत उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड मेें तथा 15 प्रतिशत पंजाब और हरियाणा में होती है।

भारत में अधिकतर बाढ़ भारी वर्षा या पर्वतीय और नदी धारा क्षेत्रों में बादल फटने के कारण आती है। एक दिन में करीब 15 सेंटीमीटर वर्षा होने पर नदियां उफनने लगती हैं। यह धारणा पश्चिमी घाटों के पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्रों, असम और उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और भारत के गंगा के मैदानों को प्रभावित करती है।

क्या बाढ़ का कारण बारिश है?


भारत में आने वाली विभिन्न आपदाओं में बाढ़ सर्वाधिक सामान्य है और इसके संकट बार बार आते रहते हैं। परंपरागत दृष्टि से यह कहा जाता है कि बाढ़ आने के लिए भारी वर्षा जिम्मेदार है। 

यह बात भारत के संदर्भ में विशेष रूप से लागू होती है जहां कृषि क्षेत्र के लिए मानसून अनिवार्य है। यह सार्वभौमिक सत्य है कि बाढ़ भारी वर्षा के कारण आती है, जबकि समूचे वर्षा जल को धारण करने की प्राकृतिक जलमार्गों की क्षमता से अधिक जल गिरता है।

परंतु, कुछ अन्य तथ्य भी हैं, जो यह सुझाव देते हैं कि बाढ़ हमेशा भारी वर्षा से ही नहीं आती है। हाल ही में यह नई और गंभीर आयाम वाली धारणा सामने आई है कि बाढ़ में मानव का भी योगदान है, जो मानव निर्मित आपदा में परिणत होता है। 

इस तरह बाढ़ के दो पहलू हैं - प्राकृतिक और मानव निर्मित। मानव निर्मित घटक अत्यंत खतरनाक है जो प्राकृतिक घटकों के साथ मिल कर प्राकृतिक आपदा को अधिक घातक आयाम प्रदान करता है।

बाढ़ का कारण बनने वाले अप्राकृतिक घटकों में धरती का तापमान बढऩा, पर्यावरणीय ह्रास, नगरीय और खेती संबंधी उपयुक्त योजना का अभाव, उपलब्ध जमीन के प्रत्येक इंच पर अमीर होने का लालच, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में, जो वर्षा ऋतु के दौरान जल निकासी का मार्ग प्रदान करते हैं, आदि प्रमुख हैं। 

अन्य अप्राकृतिक घटकों में तूफान या उष्णकटिबंधीय चक्रवात, सुनामी या सामान्य नदी स्तरों से ऊंची लहरें उठना शामिल हैं, जिनके कारण मुख्य रूप से तटवर्ती क्षेत्रों में भारी मात्रा में पानी जमा हो जाता है और व्यापक क्षेत्र डूब जाते हैं। 

बांधों को क्षति पहुंचाने वाले भूकंप, खुश्क मौसम के दौरान भी, निम्नवर्ती धारा क्षेत्र में बाढ़ का कारण बन सकते हैं। लेकिन यह कोई नियमित घटना नहीं है और कभी-कभार ऐसा हो जाता है।

इधर हाल में मौसम वैज्ञानिकों को मानसून की पद्धति में अनियमितता का आभास हुआ है, जिसे देखते हुए यह आपदा घटक और भी चिंताजनक हो गया है। 

वर्षा का मौसम तीन से चार महीने की अल्पावधि में अधिक संकेंद्रित रहता है, जिससे इन महीनों में नदियों में विनाशकारी बाढ़ आती है। कई बार देखा गया है कि पूरे महीने की बारिश उस क्षेत्र में 1-2-3 दिन में ही लगातार गिर जाती है, इससे क्षेत्र विशेष का बारिश का औसत तो बना रहता है लेकिन खूब सारी बारिश एक साथ होने से वहां पर बाढ़ आपदा का खतरा बन जाता है। 

एक नया आयाम और भी है, जो पिछले कुछ वर्षों से दिखाई दे रहा है, कि बेमौसम की बरसातें होती हैं और यहां तक कि मॉनसून की जो परंपरागत अवधि है, उसमें भी बदलाव दिखाई देता है।

बाढ़ में योगदान करने वाले अन्य घटकों में नदी तल में वृद्धि, जो गाद और रेत जमने के कारण होती है, शामिल हैं, क्योंकि बरसों तक नदियों की सफाई के लिए कोई अभियान नहीं चलाया जाता है। 

हिमालयी नदियां अपने साथ भारी सामग्री लेकर चलती हैं, जिसमें गाद और रेत की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो अंतत: निचले जलग्रहण क्षेत्रों में जमा हो जाती है। नतीजतन नदियों की जलवहन क्षमता कम हो जाती है और निकटवर्ती क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है।

कई बार लोग नदियों के किनारे के क्षेत्रों में घर और अन्य निर्माण कर लेते हैं इससे भी नदी को बारिश के पानी को निकालने के लिये अधिक जगह नहीं मिल पाती है। नदियों में जल के मुक्त प्रवाह में तटबंधों, नहरों और रेलवे संबंधी परियोजनाओं के निर्माण के कारण भी रुकावट पैदा होती है।

2013 की उत्तराखण्ड की विनाशकारी बाढ़ इसी कारण से थी। इसका एक और गंभीर उदाहरण झेलम नदी है, जिसके किनारों पर श्रीनगर और अन्य कस्बेे स्थित हैं। दीर्घावधि वर्षा से नदी में आने वाले आकस्मिक और भारी जलप्रवाह को झेलम नियंत्रित नहीं रख पाती है, क्योंकि पिछले 5 दशकों से नदी क्षेत्र में एकत्र गाद और रेत की सफाई के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। 


बाढ़ के अन्य कारण


बाढ़ का एक बहुत बड़ा कारण नदी तल में वृद्धि, जो गाद और रेत जमना है, शामिल है, क्योंकि बरसों तक नदियों की सफाई के लिए कोई अभियान नहीं चलाया जाता है। हिमालयी नदियां अपने साथ भारी सामग्री लेकर चलती हैं, जिसमें गाद और रेत की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो अंतत: निचले जलग्रहण क्षेत्रों में जमा हो जाती है। 

नतीजतन नदियों की जलवहन क्षमता कम हो जाती है और निकटवर्ती क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है। नदियों में जल के मुक्त प्रवाह में तटबंधों, नहरों और रेलवे संबंधी परियोजनाओं के निर्माण के कारण भी रुकावट पैदा होती है। पिछले कई दशकों से नदी क्षेत्रो में एकत्र गाद और रेत की सफाई के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं।  

वनों की कटाई का प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, जिससे वैश्विक  तापमान में इजाफा हो रहा है। पर्वतीय ढलानों पर वनों के काटने से मैदानों की ओर नदियों के प्रवाह में रुकावट आती है, जिससे उनकी जलवहन क्षमता पर असर पड़ता है, जिससे पानी तेजी से नीचे की तरफ आता है। 

वनों के ह्रास के कारण भूमि कटाव की समस्या भी पैदा होती है क्योंकि वृक्ष पर्वतों की सतह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और तेजी से नीचे आने वाले वर्षा जल के लिए प्राकृतिक बाधाएं पैदा करते हैं। नतीजतन नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है, जिससे बाढ़ आती है।


शहरी क्षेत्रों में बाढ़ का मूल कारण यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में अंधाधुंध पलायन हो रहा है, जिससे आवास और वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए भूमि पर दबाव बढ़ता है। जमीन, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों जो नदियों और उनकी सहायक नदियों के बाढ़ के पानी की परंपरागत निकासी का स्रोत होते हैं, पर अतिक्रमण रोकने में नगर प्राधिकारियों और यहां तक कि सरकारों की विफलता और अधिकतर मामलों में जटिलता से शहरों में अभूतपूर्व बाढ़ आती है। 

देश के अधिकांश बड़े शहरों को जलभराव के खतरे का सामना करना पड़ रहा है। इसके कारणों में कुप्रशासन, आयोजना का अभाव, भूमि के अतिक्रमण संबंधी भ्रष्टाचार और अंधाधुंध अनधिकृत निर्माण शामिल है।

चेन्नई और श्रीनगर में पिछले दिनों आई अभूतपूर्व बाढ़ इसी तरह की बर्बरता का उदाहरण है। इससे पहले मुम्बई में भी इन्हीं कारणों से बाढ़ आई थी। आवास और आर्थिक कारणों के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण के नाम पर अनियोजित वाणिज्यीकरण से शहरों में प्राकृतिक आपदाओं को सहने की क्षमता कम होती जा रही है।


वर्तमान बाढ़ आपदा प्रबंधन


वर्तमान में कटाव नियंत्रण सहित बाढ़ प्रबंधन का विषय राज्‍यों के क्षेत्राधिकार में आता है। बाढ़ प्रबंधन एवं कटाव-रोधी योजनाएँ राज्‍य सरकारों द्वारा प्राथमिकता के अनुसार अपने संसाधनों द्वारा नियोजित, अन्‍वेषित एवं कार्यान्वित की जाती हैं। इसके लिये केंद्र सरकार राज्‍यों को तकनीकी मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

पिछले कई बर्षों से देखने में आया है कि बाढ़ के पैटर्न में निश्चित रूप से परिवर्तन हुआ है, जो वर्षा की बदलती पद्धति से सम्बद्ध है। दशकों पहले मानसून मॉडल की तुलना में परिवर्तन स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है। 

प्रौद्योगिकी उन्नयन के चलते मौसम विशेषज्ञ या जिन्हें हम लोकप्रिय रूप में वैदरमैन कहते हैं, वे आज मानसून या अन्य मौसम स्थितियों की भविष्यवाणी लगभग शत प्रतिशत यथार्थ रूप में कर देते हैं। भारत का मौसम विभाग अब लगभग सही भविष्यवाणी कर पा रहा है। इससे केंद्र और राज्य, दोनों ही सरकारों को निश्चित रूप से आपदा प्रबंधन कार्रवाइयों को अंजाम देने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। 

इससे न केवल असामान्य भारी वर्षा के कारण आने वाली बाढ़ से बल्कि बारिश की कमी के कारण पडऩे वाले सूखों से भी लोगों को निजात दिलाने की तैयारी जा सकती है। 

परंतु, वैज्ञानिक साधनों से वर्षा पद्धतियों पर नियंत्रण करना या ऐसा कोई डिजाइन तैयार करना संभव नहीं है। अत: बाढ़ प्रबंधन के लिए परिवर्तित वर्षा पद्धतियों के अनुरूप बहु-आयामी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है।

वनों के ह्रास को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। अनेक हिमालयी राज्यों में पिछले दशकों के दौरान वनों का राष्ट्रीयकरण किया गया है ताकि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगाई जा सके। 

सभी स्तरों पर पौधे लगाने या वनरोपण के व्यापक अभियान चलाना भी सही दिशा में एक कदम है। बाढ़ नियंत्रण के संदर्भ में इन उपायों का अपेक्षित लाभ तभी मिल सकता है जबकि वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर सतत और दीर्घावधि योजना के अनुसार ये प्रयास जारी रखे जाएं।

अतिक्रमण रोकने में नगर प्राधिकारियों और यहां तक कि सरकारों की विफलता और अधिकतर मामलों में जटिलता से शहरों में अभूतपूर्व बाढ़ आती है। देश के अधिकांश बड़े शहरों को जलभराव के खतरे का सामना करना पड़ रहा है। इसके कारणों में कुप्रशासन, आयोजना का अभाव, भूमि के अतिक्रमण संबंधी भ्रष्टाचार और अंधाधुंध अनधिकृत निर्माण शामिल है।

चेन्नई और श्रीनगर में पिछले दिनों आई अभूतपूर्व बाढ़ इसी तरह की बर्बरता का उदाहरण है। इससे पहले मुम्बई में भी इन्हीं कारणों से बाढ़ आई थी। आवास और आर्थिक कारणों के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण के नाम पर अनियोजित वाणिज्यीकरण से शहरों में प्राकृतिक आपदाओं को सहने की क्षमता कम होती जा रही है।

यदि सम्बद्ध अधिकारियों ने निहित स्वार्थों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की होती और बाढ़ से होने वाली आकस्मिकताओं के लिए निवारक उपायों की पूरी तरह तैयारी की होती तो ऐसी आपदाओं को रोका जा सकता था। 
ये निहित स्वार्थ नगर योजनाकारों, नौकरशाहों और यहां तक कि राजनीतिज्ञों की भी मिलीभगत होते हैं। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मकान की जरूरत या अन्य कारणों से आम नागरिक भी इसमें एक घटक बनते हैं। 

तो ये ऊपर लिखे हुये जो भी वर्तमान बाढ़ आपदा प्रबंधन के उपाय किये जा रहे हैं वो अपर्याप्त हैं। सरकारें बाढ़ प्रबंधन को लेकर देर से जागती हैं और संबंधित जिलों को प्रशासनिक अधिकारियों के भरोसे छोड़ देती हैं। ज्यादा हालात खराब होने पर सरकारों के मुखियाओं द्वारा हैलीकॉप्टर से दौरा कर के कुछ बाढ़ सहायता राशि की घोषणा कर दी जाती हैं और उसके बाद धीरे धीरे सब भुला दिया जाता है और ये सिलसिला साल दर साल चलता रहता है।

जबकि होना तो ये चाहिये कि वर्तमान बाढ़ प्रबंधन जिस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है को केवल बाढ़ प्रबंधन के विशेषज्ञों के द्वारा ही किया जाना चाहिये। 


बाढ़ आपदा प्रबंधन के लिये और क्या किया जा सकता है


बाढ़ नियंत्रण एक ऐसा विषय है, जिसके लिए कोई स्पष्ट विधायी दायरा तय नहीं किया जा सकता। एक विषय के रूप में यह देश की किसी भी विधायी सूची अर्थात् केंद्रीय, राज्य या समवर्ती सूची में शामिल नहीं है। 

यह अलग विषय है कि जल निकासी और तटबंध संबंधी मुद्दों का उल्लेख राज्य सूची की द्वितीय सूची की प्रविष्टि संख्या 17 के रूप में किया गया है। इसका यह निहितार्थ है कि बाढ़ को रोकना और उसका मुकाबला करना मुख्य रूप से राज्य सरकारों का दायित्व है। कई राज्यों ने बाढ़ संबंधी मुद्दों से निपटने के प्रावधानों के साथ कानून बनाए हैं। 

केंद्र सरकार मुख्य रूप से परामर्शी क्षमता में भूमिका अदा करती है अथवा राज्यों के राहत और पुनर्वास प्रयासों में पूरक मदद करती है।

एक विस्तृत टिप्पणी के अनुसार वर्तमान में बाढ़ प्रबंधन की देखरेख के लिए दो स्तरीय प्रणाली कायम है। राज्य के स्तर पर जल संसाधन विभाग, बाढ़ नियंत्रण बोर्ड और राज्य तकनीकी परामर्शी समितियां स्थापित की गई हैं। 

केंद्रीय व्यवस्था के अंतर्गत संगठनों का एक नेटवर्क शामिल है और बाढ़ प्रबंधन के बारे में परामर्श देने के लिए समय समय पर विशेषज्ञ समितियों का गठन किया जाता है।

ये व्यवस्था कागजों मे तो अच्छे से काम कर रही है परंतु हमारे अनुसार बाढ़ आपदा प्रबंधन के लिये ये किया जाना चाहिये ---

  • अधिक समन्वय पर ध्यान देते हुए केंद्र, राज्य तंत्र को अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। यह व्यवस्था एक सतत और निरंतर प्रणाली के रूप में होनी चाहिए, न कि केवल आपदा के समय काम करने वाली प्रणाली। 
  • आधुनिक प्रौद्योगिकी के सहारे संकट प्रबंधन नेटवर्क हेतु ढांचे का निर्माण करना चाहिये। अब तो भारत के पास खुद के मौसम सेटेलाइट भी हैं। इसरो (ISRO) की सहायता से अंतरिक्ष से अच्छी गुणवत्ता की फोटो लेकर उनका विश्लेषण विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिये।
  • पर्यावरण के मोर्चे पर नई चुनौतियों और कुप्रशासन के मुद्दों को देखते हुए राज्यों के लिए यह कठिन है कि वे स्वयं बाढ़ प्रबंधन की योजना बनाएं। केंद्र और राज्य सरकारों को एक संयुक्त योजना के जरिए विभिन्न बाढ़ नियंत्रण उपायों को अंजाम देना  चाहिए। 
  • तटबंधों, बाढ़ रोकने वाली दीवारों, रिंग बांधों, बाढ़ नियंत्रण जलाशयों के निर्माण से बाढ़ के लिये व्यवस्था की जानी चाहिये ताकि नीचे जाने वाले पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षित सीमाओं के भीतर बाढ़ के जल की कुछ मात्रा को अस्थाई तौर पर एकत्र किया जा सके।
  • एक अन्य महत्वपूर्ण उपाय में नदी चैनलों और सतही नालों में सुधार और नदी किनारों पर भूमि कटाव रोकना शामिल है। इससे भले ही पूरी तरह बाढ़ रोकना संभव न हो, लेकिन बाढ़ के पानी को फैलने से रोकने में अवश्य मदद की जा सकती है।
  • उदाहरण के तौर पर मैं ये बताना चाहुंगी कि दुनिया के सभी बड़े देशों और शहरो को देखना चाहिये कि उन्होंने अपने यहां आने वाली बाढ़ आपदा का प्रबंधन कैसे किया। 
  • अगर आप बैंकाक, लंदन, मास्को, न्यूयार्क, शंघाई इत्यादि शहरों को देखेंगे तो पायेंगे कि वहां पर नदियों को गहरा कर कर के दोनों ओर के किनारों पर पक्का कर दिया गया है और साथ ही जमीन को नदी से निकाल कर वहां निर्माण कार्य किया गया है जिससे नदी में पाना बना रहता है और वो कटाव भी नहीं कर पाती है।
  • ऐसी गहरी करी गई नदियों में जल यातायात भी यात्रियों और सामान को ढोने के लिये किया जाता है। 
  • यही करने से काफी हद तक हम बाढ़ की समस्या से बच सकते हैं यानी कि नदियों कि सफाई कर के उनको गहरा करते रहना चाहिये।
  • वर्तमान में प्रचलित परिस्थितियों और नई चुनौतियों को देखते हुए यह जरूरी है कि बाढ़ प्रबंधन को एक पृथक विषय के रूप में देखना उचित होगा। यह जरूरी है कि बाढ़ नियंत्रण और प्रबंधन प्रणाली को सुदृढ़ बनाया जाए लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि इसे पर्यावरणीय ह्रास, वैश्विक तापमान और विभिन्न स्तरों पर कुप्रशासन के संदर्भ में भी देखा जाए।
  • बाढ़ प्रबंधन के प्रति किसी भी दृष्टिकोण में इन सभी महत्वपूर्ण घटकों को शामिल किया जाना चाहिए। बाढ़ प्रबंधन केवल पुराने सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभागों के माध्यम से नहीं किया जा सकता। 
  • शहरी बाढ़ का मुख्य कारण निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा भूमि का अतिक्रमण करना और बरसात के मौसम से पहले अग्रिम आयोजना का अभाव है। शहरों के निकट नालों और नालियों की सफाई को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में भी नदियो को गहरा करके बाढ़ आपदा का प्रबंधन किया जा सकता है। 
  • जैसा कि वर्तमान में जो वृक्षारोपण वगैरह का सरकारी कार्यक्रम चलता रहता है, उसको ठीस से देखने की जरूरत है। केवल वृक्षारोपण उद्देश्य न होकर पेड़ को बड़ा करने का उद्देश्य होना चाहिये।

अधिक ध्यान बाढ़ से संबंधित दीर्घावधि योजना पर केंद्रित किया जाना चाहिए ताकि निवारक और राहत पहलुओं को भी शामिल किया जा सके।

लोग कह सकते हैं कि ये तो बहुत मंहगा समाधान है, लेकिन अगर हम भारतीय अपने आप को दुनिया के विकसित देशों में देखते हैं तो हमें पक्के समाधान निकलने ही होंगे भले ही वो मंहगे हों।

मुझे यहां पर आपके विचारों और टिप्पणियों का स्वागत रहेगा ताकि हम लोग परंपरागत बाढ़ प्रबंधन की बजाए कुछ अलग उपाय करके बाढ़ आपद प्रबंधन की दिशा में विचार विमर्श कर सकें। 

Manisha सोमवार, 27 जुलाई 2020

हिंदी को बढ़ावा देने के लिये हम सब क्या करें?


भारत सरकार की राजभाषा नीति के अनुसार हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। सरकार हिंदी को बढ़ावा देने के लिये हर साल 14 सितम्बर को हिंदी दिवस का सभी सरकारी कार्यालयों में आयोजन करती है। सरकार तो हिंदी को बढ़ावा देने के लिये जो कुछ कर सकती है वो करती है पर हिंदी को बढ़ावा देने के लिये सबसे ज्यादा ये जरुरी है कि हम हिंदी भाषी लोग भी कुछ प्रयत्न करें। 


हिंदी को बढ़ावा


ये बात सर्वमान्य है कि हिंदी को हम हिंदी वालों ने ही छोड़ दिया है। हमें हिंदी से तो प्यार है लेकिन नौकरी के बाजार में अंग्रेजी की महत्ता देखकर हम सब हिंदी के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। जबकि हमें हिंदी को ही हर क्षेत्र में बढ़ाना चाहिये। 


ध्यान रहे कि आजादी के आन्दोलन में हिंदी का बहुत बड़ी योगदान है, बहुत लोगों ने अपनी कुर्बानी दी है।

चलिये अंग्रेजी की जो महत्ता आज के जमाने में है वो तो रहेगी ही और समय के साथ कम भी होगी, लेकिन तब तक हम कुछ छोटे छोटे उपाय करके अपने अपने लेवल पर हिंदी को थोड़ा थोड़ा बढ़ावा तो दे ही सकते हैं।

हिंदी को बढ़ावा देने के विभिन्न उपाय


आइये देखें कि किन छोटे छोटे उपायों से हिंदी को बढ़ावा दे सकते हैं - 


  1. अगर हम कोई व्यवसाय करते है तो हम कोशिश कर सकते हैं कि समस्त साइन बोर्ड, नाम पट्टिकायें, काउन्टर बोर्ड, सूचना पट्ट आदि को हिंदी में अवश्य ही लिखें भले ही साथ में आप अंग्रेजी या अन्य किसी भाषा में भी लिखवा लें। महाराष्ट्र में सरकार ने हर बोर्ड पर मराठी में लिखने का नियम बना रखा है जिससे हिंदी वालों को भी वहां कुछ पढ़ने में दिक्कत नहीं आती है (मराठी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है)। जबकि अगर आप लखनऊ जायें तो आप देखेंगे कि दुकानों के बोर्ड अधिकांशतः अंग्रेजी में लिख हुये हैं।
  2. सभी पपत्रो, दस्तावेजों, मुद्रित सामग्री तथा अन्य लेखन सामग्री को हिंदी में मुद्रित (प्रिंट) करवाया जाये।
  3. हो सके तो व्यवसायिक और व्यक्तिगत पत्रो को हिंदी में ही लिखा जाये।
  4. विजिटिंग कार्ड पूर्ण रुप से आकर्षक हिंदी में लिखे जायें। अगर पूर्ण रुप से हिंदी में लिखना संभव नहीं है तो कुछ तो हिंदी मे होना ही चाहिये (कम से कम आप का नाम तो आकर्षक हिंदी में हो सकता है)।
  5. संभव हो तो कंप्यूटर पर यूनीकोड एनकोजिंड वाली टाईपिंग सीख लीजिय। यकीन मानिये हिंदी टाइपिंग सीखना बहुत ही आसान है, आप 2-3 दिन में ही अच्छी खासी टाइपिंग सीख जायेंगे।
  6. लिखने में आसान हिंदी पा प्रयोग करें ताकि सभी लोग समझ सकें।
  7. अच्छी हिंदी जानने वाले कभी कभी उन लोगों की कठिनाई नहीं समझ नहीं समझ पाते जिन्होंने हाल ही में थोड़ी बहुत हिंदी सीखा है। ऐसे लोगों की कठिनाई का पूरा ध्यान रखना चाहिये और अपने पांडित्य का प्रदर्शन नहीं करना चाहिये।
  8. हिंदी का वाक्यों में संस्कृत के कठिन शब्दों का अनावश्यक प्रयोग न करें।
  9. हिंदी के वाक्यों में अंग्रेजी की वाक्य संरचना से बचें अर्थात वाक्य रचना हिंदी भाषा की प्रकृति के अनुसार ही होनी चाहिये। वह अंग्रेजी मूल का अटपटा अनुवाद नहीं होना चाहिये।
  10. जहां कहीं भी यह लगे कि पढ़ने वाले को हिंदी में लिखे किसी शब्द या पदनाम को समझे में कठिनाई हो सकती है, तब कोष्ठक में अंग्रेजी रुपान्तर भी लिख देना उपयोगी रहेगा।
  11. अगर आप को हिंदी में लिखने में कठिनाई या झिझक है तो इसके लिये शुरूआत छोटी-छोटी टिप्पणियों को हिंदी में लिख कर करनी चाहिये। आप हिम्मत करेंगे तो धीरे-धीरे सब हिंदी में काम करने लगेंगे।
  12. खास बात ये है कि हमें अंग्रेजी में सोचकर हिंदी में नहीं लिखना चाहिये। कोशिश यह होनी चाहिये कि हिंदी में ही सोच कर हिंदी में  लिखें।
  13. हिंदी मे लिखते समय शब्दों के लिये अटकिये मत, किसी भी शैली के लिये रुकिये नहीं और अशुद्धियों से घबरायें नहीं।
  14. कोशिश करें कि मौलिक रुप से हिंदी लेखन करें। अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद का सहारा बहुत कम लेना चाहिये क्योंकि दोनों भाषाओं की शैली अलग-अलग है। खासकर मशीनी अनुवाद जैसे कि गूगल अनुवाद में काफी गलतियां हो सकती हैं। ऐसी मशीनी भाषा से बचें।
  15. हो सकता है कि शुरू में हिंदी में काम करने में आपको झिझक महसूस हो सकती है किन्तु काम करते-करते आप देखेंगे कि अंग्रेजी की तुलना में हिंदी सरल भाषा है, इसमें समय बचता है, हिंदी भाषा हमारी अभिव्यक्ति को स्पष्ट और प्रभावी बनाती है।

तो हम सब को प्रण लेना चाहिये कि हम हिंदी में ही काम करेंगे और हिंदी को बढ़ावा देने के सभी प्रकार के उपाय करेंगे ताकि हमारी प्यारी हिंदी भाषा का प्रसार और प्रचार हो सके।

Manisha रविवार, 26 जुलाई 2020

खेल की संस्कृति बढ़ाने की जिम्मेदारी सरकार की है


भारत सरकार के खेल मंत्री किरन रिजिजू को लगता है कि भारतीयों में खेल की समझ न के बराबर है इसके लिये उनके खेद है। माननीय  मंत्री जी का कहना है कि भारत में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने की जरूरत है। उन्होंने ये भी कहा कि आम भारतीयों में और यहां तक कि संसद के सदस्यों को भी खेलों जी ज्यादा समझ नहीं है। मंत्री जी को मलाल  है कि भारतीय समाज में खेल ज्ञान बहुत कम है। केवल क्रिकेट के खेल को ही अधिकांश भारतीय जानते हैं। 


मंत्री जी बात तो आपकी कुछ हद तक सही है पर आपको ये भी मानना पड़ेगा कि खेल की संस्कृति बढ़ाने की जिम्मेदारी आप ही की है। आप ही लोग केवल क्रिकेट के खेल को बढ़ाते हो। क्या कारण है कि भारत के हर जिले और शहर में ढंग के स्टेडियम तक नहीं हैं? क्यों भारत के अधिकांश स्टेडियमों में हॉकी के खेल के लिये एस्ट्रो टर्फ नहीं है? 

ये एक मानी हुई बात है कि खेलों में भारत को प्रतिभायें छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से ही मिलती हैं। लेकिन वहां पर उनको ढंग की खेल सुविधाओं का अभाव ही मिलते है। मंत्री जी, खेलों की सुविधाओं को छोटी जगह तक ले जाओ फिर देखो कैसे खेलो को बढ़ावा मिलता है।


आप को ये याद दिला दूं कि हरियाणा को लड़को ने मुक्केबाजी (बॉक्सिंग) कुश्ती और झारखण्ड की लड़कियों ने हॉकी में सुविधाओं के बल पर पदक लाने शुरु किये तो कैसे एकदम से वहां प्रतिभाये भी विकसित होने लगीं और खेलों को लेकर लोगों में विश्वास भी पैदा हुआ।

मंत्री जी, खेलों की संस्कृति का विकास खेलों की जबर्दस्त सुविधाओं के बूते ही हो सकता जो कि केवल सरकार ही कर सकती है।


Manisha बुधवार, 15 जुलाई 2020

प्लाज्मा थैरेपी क्या है? Plasma Therapy Kya Hai?


आजकल आप सब लोग प्लाज्मा थैरेपी का नाम  बहुत सुन रहे हैं। दरअसल कोरोना की महामारी से जो कोहराम मचा है, उसमें अभी तक कोई इलाज न होने की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की जान जा रही हैं। कुछ डाक्टरों ने अपने अस्पतालों मे प्लाज्मा थैरेपी के द्वारा कोरोना के इलाज में कुछ सफलता का दावा किया हैं। दिल्ली में तो भारत का पहला प्लाज्मा बैंक भी बनाया गया है। तो ऐसे में आप के भी मन में आता होगा कि पता करें कि आखिर प्लाज्मा थैरेपी क्या है (Plasma Therapy Kya Hai)?

Manisha सोमवार, 13 जुलाई 2020

भारतीय संविधान का निर्माण कैसे हुआ?


भारत देश में सबसे ऊंचा पद भारतीय संविधान का है। सरकार, सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति, प्नधानमंत्री कोई भी इससे ऊपर नही है। सब इसके दायरे में रहकर काम करना होता है।

भारत के वर्तमान संविधान को बनाने के लिये आजादी के पहले से ही प्रयास किये जा रहे थे। दरअसल अंग्रेजी सरकार को ये पता था कि उन्हें जल्दी ही भारत को छोड़ना ही होगा। इसलिये उन्होंने भारत के संविधान के निर्माण के लिये काम करना शुरु कर दिया था। हम सब को ये पता होना चाहिये कि भारत के संविधान का निर्माण कैसे हुआ (Bharat ke samvidhan ka nirman kaise hua)?

Manisha शनिवार, 11 जुलाई 2020

भारत के राज्यों के पर्यटन विभागों की टैगलाइनें


भारत के सभी राज्य और भारत सरकार सभी यह प्रयास कर रहे हैं उनके यहां पर्यटन का विकास हो जिससे लोगों को रोजगार मिले और आर्थिक तरक्की हो सके। इस दिशा में काम करते हुये भारत सरकार पर्यटन मंत्रालय एवं विभिन्न राज्यों के पर्यटन विभागों ने अपनी वेबसाइटों, विज्ञापनों इत्यादि में बहुत ही रोचक टैगलाइनें (Taglines) या नारे बनाकर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करके लुभाने की कोशिश की है। 


ये नारे कहीं कहीं तो बहुत ही लोकप्रिय हो गये हैं जैसे कि गुजरात पर्यटन विभाग के ब्रांड अंबेसडर (Brand Ambassador) या उत्पाद दूत प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के द्वारा कहा गया नारा 'कुछ दिन तो गुजारो गुजरात में ' बहुत ही प्रसिद्ध हुआ। एक और उदाहरण राजस्थान की टैग लाइन 'पधारो म्हारे देस' का है जो कि लोगों की जुबान पर चढ़ गया है।

भारत के राज्यों के पर्यटन विभागों की टैगलाइनें और नारे Indian Tourism department Taglines

पर्यटन विभागों की टैगलाइन्स की सूची


हमने यहां पर भारत के राज्यों के पर्यटन विभागों की टैगलाइन्स की लिस्ट यानी की सूची बनाने की कोशिश की है। हमें उम्मीद थी कि शायद भारत के राज्यों ने पर्यटन नारे हिंदी भाषा या संस्कृत भाषा में बनाये होंगे पर हमारा अंदाजा गलत निकला। अधिकांश पर्यटन टैगलाइन अंग्रेजी भाषा में हैं। 

एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि अधिकांश राज्यों की पर्यटन विभागों की वेबसाइटों के हिंदी संस्करण नहीं हैं। आप हिंदी मे उस राज्य की पर्यटन जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते।

खैर, यहां पर इनको यह सोच कर नजरअंदाज किया जा सकता है कि शायद भारत के राज्य विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करना चाहते होगें। देसी पर्यटक के लिये शायद इन्हें लगता होगा कि ये लोग इतना खर्चा नहीं करते हैं तो इनको लुभाने की आवश्यकता ही क्या है?
अधिकांश राज्यों के पर्यटन विभागों द्वारा उनकी सार्वजनिक क्षेत्र की पर्यटन कंपनियों राज्य पर्यटन विकास निगम (State Tourism Development Corporation) के माध्यम से पर्यटकों को होटल बुकिंग, टैक्सी बुकिंग, खरीददारी आदि की सुविधाये प्रदान की जा रही हैं। अगर हमें किसी राज्य के इन पर्यटन विकास निगमों के भी टेगलाइन मिले तो इसी यहां सूची में शामिल किया गया है। जिन राज्यों के पर्यटन विभागों की कोई टैगलाइन हमको नहीं मिली उसको यहां पर खाली छोड़ दिया गया है। जब कभी ये राज्य अपना कोई पर्यटन नारा बनायेंगे तो उसे यहां अद्यतन (Update) किया जायेगा।


तो लीजिये देखिये जून 2020 तक अद्यतन की गई भारत के राज्यों के पर्यटन विभागों की टैगलाइनों की लिस्ट -


  1. भारत सरकार पर्यटन मंत्रालय (Ministry of Tourism, GoI) - अतिथि देवो भव: (Incredible India! Atithi Devo Bhava)
  2. अंडमान एवं निकोबार (Andaman & Nicobar)  - Emerald. Blue. And You
  3. आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) - Everything Possible
    • Andhra Pradesh Tourism Development Corporation (APTDC) - The more you see it. The more you love it...
  4. अरूणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh)  - Gateway to Serenity
  5. आसाम (Assam) - Awesome Assam
  6. बिहार (Bihar) - Blissful Bihar
  7. चंडीगढ़ (Chandigarh) - The City Beautiful
  8. छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh)  - Full of Surprises
  9. दादरा - नागर हवेली और दमन एवं दीव  (Dadra Nagar Haveli and Daman & Diu)  - Small is Big
  10. गोवा (Goa)  - See More. Be More.
  11. गुजरात (Gujarat)  - कुछ दिन तो गुजारो गुजरात में
  12. हरियाणा (Haryana) - Come, holiday with us!
  13. हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh
  14. जम्मू और कश्मीर (Jammu and Kashmir) - See J&K in a new light
    • Jammu & Kashmir Tourism Development Corporation (JKTDC) - Proud to serve you
  15. लद्दाख (Ladakh
  16. झारखण्ड (Jharkhand)  - Nature's hidden jewel
  17. कर्नाटक (Karnataka Tourism) - One State. Many Worlds
  18. केरल (Kerala) - God's own Country
  19. लक्षद्वीप (Lakshadweep
  20. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh)  - The heart of Incredible India
  21. महाराष्ट्र (Maharashtra)  - Maharashtra Unlimited
  22. मणिपुर (Manipur
  23. मेघालय (Meghalaya)  - Check into Nature
  24. मिजोरम (Mizoram
  25. नागालैण्ड (Nagaland)  - Land of Festivals
  26. दिल्ली (Delhi
  27. ओडिशा (Odisha) - India's Best Kept Secret
  28. पुडुचेरी (Puducherry) - Peaceful Puducherry - Give time a break
  29. पंजाब (Punjab) - India begins here
  30. राजस्थान (Rajasthan) - पधारो म्हारे देस! The Incredible State of India
  31. सिक्किम (Sikkim) - Sikkim, where Nature smiles
  32. तमिलनाडु (Tamil Nadu) - Enchanting Tamil Nadu - Experience Yourself
  33. त्रिपुरा (Tripura)  - Tripura: Where Culture Meets Nature
  34. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) - यूपी नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा
  35. उत्तराखण्ड (Uttarakhand) - Simply Heaven
  36. पश्चिम बंगाल (West Bengal) - Experience Bengal - The Sweetest part of India

हिंदी भाषी राज्यों के पर्यटन नारे भी अंग्रेजी में हैं। 

यहां नीचे 👇 कमेंट टिप्पणी कर के बताइये आपको किस राज्य का पर्यटन नारा सबसे अच्छा लगा।

Manisha शुक्रवार, 3 जुलाई 2020