अपने दस्तावेज कागजों को प्रमाणित करने के लिये लिख कर दें

अपने  दस्तावेज कागजों को प्रमाणित करने के लिये लिख कर देंये मैं अपने और दूसरों के भुक्तभोगी अनभव के आधार पर  बता रही हूं कि जब भी कभी आप किसी नये मोबाइल फोन कनेक्शन, गैस कनेक्शन,  क्रेडिट कार्ड  लेने, बैंक में खाता खुलवाने हेतु अपने किसी कागजात  की फोटोकोपी अगर किसी कर्मचारी या किसी को अन्य को दें तो कृपया उस पर साफ-साफ लिख दें किसी कि सिर्फ इसी काम के लिये। उदाहरण के तौर पर मान लीजिये कि आपने अपने कागजात आईसीआईसीआई बैंक में खाता खुलवाने के लिये हैं तो अपने द्वारा दिये गये कागजात पर लिख दीजिये कि सिर्फ आईसीआईसीआई बैंक में खाता खुलवाने के प्रयोग हेतु (अंग्रेजी में भी)। ये भी इस प्रकार लिखें कि यदि उसकी दुबारा कोई कोपी करे तो आपके द्वारा लिखा गया जरूर उसमें दिखे। दरअसल आजकल हमारे द्वारा दिये गये कागजातों के आधार पर लोग मोबाईल कनेक्शन व अन्य प्रकार की आपराधिक गतिविधियां करते हैं और असली मालिक को पता भी नहीं होता। हमारे एक परिचित जब एक बैंक से होम लोन लेने गये तो पता चला कि उनके नाम से पहले चार (4 पर्सनल लोन) लोन चल रहे हैं। अब बेचारे घूम रहे हैं। इसके अलावा आये दिन आतंकियों द्वारा नकली कागजात के आधार पर अपनी पहचान के लिये ड्राईविंग लाईसेंस, बैक एकाउंट खुलवाने व पासपोर्ट बनवाने की खबरें आती रहती हैं। अत:  बाद की परेशानी से बचने के लिये पहले ही सावधानी बरतें व अपने कागजों को इस तरह से दें कि जहां पर प्रयोग होने हैं वहां को छोड़कर कहीं और न प्रयोग हो सकें।

Manisha शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009
स्वाईन फ्लू का प्रकोप बढ़ गया है

पिछले करीब 15 दिनों से दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में और उत्तर भारतswine-flu के सभी राज्यों में स्वाईन फ्लू मान की बीमारी फिर से बड़े पैमाने पर लौट आई है।  हमारे एक परिचित को भी स्वाईन फ्लू हो गया है जिनसे मिलने के बाद हमें भी डाक्टर द्वारा टैमी फ्लू नाम की दवा खाने को बोला गया है। परिवार में सभी ने ये गोली खा ली है। वैसे होम्योपैथी की इन्फ्ल्यूऐंजा-200 व अपनी पारंपरिक तुलसा का काढ़ा भी इसमें प्रभावी बताया जा रहा है। हमारे परिचित वेंटीलेटर पर अस्पताल में भर्ती हैं और स्थिति गंभीर है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जाड़े के आगमtami-fluन के कारण ही स्वाईन फ्लू के केस बढ़ गये हैं, लेकिन जाड़ा तो हर साल आता है, इसी साल इतना घातक क्यों है?  जिस तरह से बड़े पैमाने पर ये इस समय फैल रहा है उससे तो ये भी लगता है कि किसी विकसित देश ने अपने देश में स्वाईन फ्लू के बचाव के टेस्ट के लिये भारत में तो नहीं फैला दिया या फिर किसी आतंकी संगठन ने चुपचाप तो नहीं फैला दिया?  बहरहाल जो भी हो, रोजाना लोगों के मरने और स्वाईन फ्लू से पीड़ित होने की खबरे छप रही हैं और अस्पतालों में जगह कम पड़ रही है। स्थिति गंभीर है। सरकारें प्रयत्न कर रही हैं पर अभी अपर्याप्त है।

Manisha गुरुवार, 10 दिसंबर 2009
26/11 : पश्चिम से ही हमेशा हमला हुआ है भारत पर

पश्चिम से ही हमेशा हमला हुआ है भारत परअगर आप इतिहास उठा कर देखें तो पायेंगे कि भारत भूमि पर केवल एक बार को छोड़ कर ((जब चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण किया था)  हमेशा  पश्चिमी सीमा से हमला होता रहा है। केवल 1962 में ही उत्तर की ओर से चीन द्वारा हमला किया गया था। सिकन्दर, मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, तामूर लंग, बाबर, अकबर, नादिरशाह, अहमदशाह अब्दाली, याह्या खां, अजमल आमिर कसाब आदि हमलावर सब भारत पर पश्चिमी दिशा से ही आये थे। जब भी भारत की  पश्चिमी सीमा कमजोर हुई तो भारत पर हमला हुआ है। आजादी के बाद से भी पश्चिमी सीमा पर तीन बार पाकिस्तान की ओर से हमला किया गया है। इसलिये इतिहास से सबक लेते हुये देश को पश्चिम की ओर विशेष ध्यान  रखना चाहिये। विश्व के आतंकवाद की केन्द्र भी भारत के पश्चिम में ही स्थित है और इधर ही दुनिया का सबसे ताकतवर देश अपनी सेना लेकर बैठा हुआ है। दरअसल पश्चिम की ओर भारत में सपाट मैदान हैं जहां सेना तीव्र गति से चल पाती हैं, इसके अलावा ये इलाका उपजाऊ भी है इस कारण यहां समृद्धि है और इसीलिये विदेशी आक्रमणकारी हमेशा लूटने के लिये लालायित रहते रहे हैं। अब इसमें जेहाद और धार्मिक तथा राजनीतिक विद्वेष  भी मिल गया है। मेरे विचार में भारत को अपने आप को सुरक्षित करने के लिये पश्चिमी सीमा को सुदृण होना बहुत आवश्यक है।

Manisha गुरुवार, 26 नवंबर 2009
अंग्रेजी और हिंदी के अखबार और पत्रिकायों में बहुत विरोधाभास हैं

अंग्रेजी और हिंदी के अखबार और पत्रिकायों  बहुत विरोधाभास हैं एनडीटीवी के पत्रकार एवं हिंदी के अच्छे चिठ्ठाकार श्री रवीश कुमार जी ने अपने चिठ्ठे कस्बा  में यह प्रश्न उठाया था कि हिंदी-अंग्रेजी के अख़बारों का किसान अलग क्यों होता है?  दरअसल ये बहुत ही बुनियादी सवाल है और ये वास्तव में हिंदी और अंग्रेजी भाषा के द्वारा सोचने और समझने का भी अन्तर है और साथ ही संस्कृतियों का भी अंतर हैं। मैं हिंदी और अंग्रेजी की तमाम पत्रिकायें (खास कर महिलाओं की) एवं समाचार पत्र पढ़ती हूं और कई विषयों पर देखा है कि अंग्रेजी के अखबार और पत्रिकायों की सोच बिलकुल अलग है।
  • अंगेजी की पत्रिकाये हमेश इस तरह के लेख छापती हैं – हाउ टू प्लीज योर मैन, नो हिज सेक्सी प्लेसेज, फिफ्टी वेज टू सेटिस्फाई हिम इत्यादि। इनमें योर मैन की बात की जाती है यानी ये बताया जाता है कि किसी से भी आप संबंध बना सकती हो। यहां कभी भी हसबैण्ड शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। पूरा ध्यान पति-पत्नी पर न होकर मैन-वूमेन पर होता है।
  • अंगेजी के सारे अखबार मिलकर भी अकेले दैनिक जागरण से कम बिकते हैं (ताजा सर्वेक्षण 2009 के अनुसार) लेकिन फिर भी हिंदी समाचार पत्रों को भाषाई या वर्नाकुलर लिखते हैं और अपने आप को नेशनल (राष्ट्रीय) समाचार पत्र कहते हैं।
  • पश्चिम की हर बुराई जैसे कि प्रास्टीट्यूशन, लिव-इन-रिलेशनशिप, लेस्बियन और गे सेक्स इत्यदि के समर्थन में लेखों की अंग्रेजी पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में बहुतायत रहती है और उसके पक्ष में माहौल बनाते रहते हैं।
  • शराब के किसी बन्दीकरण के विरोध में भी अंग्रेजी पत्रकारिता सबसे आगे है।
  • अब अंग्रेजी ही इनका जीवन-यापन का साधन है इसलिये ये अंग्रेजी को बढ़ावा देने के लिये हमेशा हल्ला करते रहते हैं। अंग्रेजी इनके अनुसार अंतर्राष्ट्राय भाषा है जिसके बिना भारत का विकास नहीं हो सकता।
  • हिंदी के पत्र-पत्रिका वाले पता नहीं किस हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं कि वो खुद ही हिंदी वालों को अंग्रेजी वालों के समतर समझते हैं। हिंदी के अखबारों और पत्रिकायों में वैज्ञानिक व अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर बहुत ही कम छपता है। उनके अनुसार हिंदी के पाठकों का स्तर कम है।
  • स्वतंत्र किस्म के लेख हिंदी पत्रिकायों और समाचार पत्रों मे कम ही आते है, अधिकांश समाचार ऐजेंसी से लिया हुआ होता है।
  • हिंदी के समाचार पत्र स्थानीय समाचारों को बहुत ही अच्छा कवर करते हैं।

Manisha बुधवार, 25 नवंबर 2009
नकली नोट का पता आखिर कैसे लग सकता है?

अगर आप बैंक जायें तो आप देखेंगे कि जगह जगह इस बात के पोस्टर लगे रहते हैं कि आप अपने नोट के नकलीपन को कैसे पहचान सकते हैं। इसके अलावा सरकार समय समय पर विज्ञापन इस संदर्भ में देती रहती है। इसी तरह का एक विज्ञापन मैंने नीचे दिया है। दरअसल भारत में नकली नोट की समस्या बहुत बड़ी हो चुकी है और अब तो बैंको के एटीएम से भी नकली नोट निकल रहे  हैं। अब हालत ये है कि कहीं भी जायो, कुछ खर्च करो, पहले सामने वाला आपके नोट का परीक्षण करता है। नकली नोट दो तरह से बन रहे हैं। एक तो भारत में कुछ लोग स्कैन करके प्रिंटर और कंप्यूटर की मदद से नकली नोट छापने वाले, ये लोग कम ही मात्रा में छाप पाते हैं और इस तरह के नकली नोट को ही आप पकड़ सकते हैं। दुसरे नोट वो हैं जो पाकिस्तान में वहां की सरकार आईएसआई के द्वारा वहां की राजकीय प्रेस से छपवा कर भेज रही है। इस तरह का नोट नकली होने पर भी असली हैं क्योकि ये पाकिस्तान की अधिकृत प्रेस मे छप रहे हैं जहां पर इनको वो सारी तकनीक उपलब्ध जिससे भारतीय रिजर्व बैंक नोट छापता है। यानी रिजर्व बैंक कुछ भी युक्ति अपनाये, ये लोग असका तोड़ निकाल लेगे। आप इसी से अंदाज लगा सकते हैं कि ये नोट असली जैसे ही होते हैं और भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर रहे हैं। अस समस्या का इलाज तो सरकार पाकिस्तान पर दबाव डालकर ही निकाल सकती है अन्यथा हम लोग ऐसे ही नकली नोट लिये बैठे रहेंगे। ऐसे नकली नोट जो कि असली जैसे ही हैं का पता अखिर कोई व्यक्ति कैसे लगा सकता है?
Know Bank Note नकली नोट

Manisha मंगलवार, 24 नवंबर 2009
हिंदीबात चिठ्ठा अब अमित के ब्लॉग सूची में भी

प्रसिद्ध अंगेरेजी ब्लॉगर अमित अग्रवाल नें सबसे मशहूर भारतीय ब्लोगों की सूची के हिंदी भाग में अब इस चिठ्ठे को भी शामिल कर लिया है। इसी समय मेरे इस हिंदीबात चिठ्ठे के 400 से के ऊपर फीड ग्राहक भी हो गये हैं।

HindiBaat-in-IndiaBlogs

Manisha
हैडली और राणा के नाम से देश को डराया जा रहा है

पिछले एक महीने से जब से अमेरिका की गप्तचर संस्था एफबीआई (FBI) ने डेविड हैडली और तहावुर्रहमान हुसैन राणा को गिरफ्तार किया है, देश के अखबारों में रोजाना उन से संबंधित समाचार छप रहे हैं। जो समाचार छाप रहे है वो मेरे विचार में देश पर कोई अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ रहे हैं। इन सभी समाचारों से बिनी बम फोड़े ही देश को डराया जा रहा है। सोचने वाली बात ये है कि खुफिया जानकारी आखिर पत्रकारों को कौन और क्यों दे रहा है जिसे वो बिना दांचे छाप रहे हैं। कभी छपता है कि हेडली देश में कई जगह घूमा, कभी छपता है कि वो कई फिल्मी लोगों के संपर्क में था। कभी छपता है कि वो 26/11 से ठीक पहले भारत में था, अन्य स्थानों पर होने वाले हमलों से पहले वहां था। आज उसके द्वारा अपने एक दोस्त को भेजी गई ईमेल के जरिये आतंकवादियों के साहसिक की बात छापी गई हैं। यानी अब आतंकवाद के बारे में भी तारीफ की बातें छापी जा रही हैं। ये वही देश है जहां आतंकवाद से लडने के लिये जीरो टोलरेंस की बाते कीं जाती हैं, वहां पर इन लोगो की खबरें कैसे छप रही हैं? मेरे विचार में ये सब अपने आप ही नहीं हो रहा है बल्कि एसा लगता है कि देश को डराया जा रहा है कि देखों तुम लोग कुछ नहीं कर सकते। देश की पुलिस को कार्यवाही करनी चाहिये न कि जनता को डराने की खबरें छपवानी चाहिये।

Manisha सोमवार, 23 नवंबर 2009
किसके पीछे किसका हाथ है?

रोजाना समाचार पत्रों में अनेक समाचार छपते रहते हैं और अनेक प्रकार की प्रतिक्रियायें मिलती रहती हैं जिनमें बताया जाता है कि फलां-फलां के पीछे फलां का हाथ है। एक बानगी में यहां देना चाहती हूं। भारत कहता है कि आतंकवाद में पाकिस्तान का हाथ है। पाकिस्तान में लगातार हो रहे बम विस्फोटों मे पाकिस्तान के नागरिकों और सरकार के अनुसार अमेरिका, इस्राइल और अमेरिका मिल कर पाकिस्तान को और इस्लाम को बर्बाद करना चाहते हैं। पाकिस्तान के अनुसार तालीबान के पीछे भारत का हाथ है। तालीबान पाकिस्तान के परमाणु बमों को हथियाना चाहता है, जिसको बनवाने के पीछे चीन का हाथ था। चीन सोचता है कि तिब्बत की गड़बड़ियों के पीछे दलाई लामा का हाथ है और दलाई लामा के पीछे भारत का हाथ है और इसी लिये दलाई लामा ने अरुणाचल प्रदेश का दौरा भी किया था। भारत का सोचना है कि अरुणाचल प्रदेश को चीन  हथियाना चाहता है। इस्राईल के अनुसार उसके यहां की समस्याओं के लिये पश्चिमी एशिया के देश जिम्म्दार हैं। हमास और अल फतह के अनुसार हिंसा के लिये इस्राइल जिम्मेदार है। इस्राइल के अनुसार इरान उसके उपर हमला कर सकता है। अमेरिका के अनुसार ईरान के पास परमाणु बम हैं। भारत में कुछ लोग मानते थे (हैं) कि हेमंत करकरे कि मृत्यु के पीछे हिंदूवादी संघटनों का हाथ है।

भारत में मंहगाई के लिये लोग कांग्रेस सरकार को दोषी मानते हैं।  प्रकाश करात के अनुसार मंहगाई के लिये अमेरिका, पश्चिमी देश और पूंजीवादी व्यवस्था जिम्मेदार है। मुलायम सिंह के अनुसार चुनावों में उनकी हार कल्याण सिंह और राहुल गांधी के कारण है। राज ठाकरे के अनुसार मराठियों की दुर्दशा के लिये हिंदी जिम्मेदार है। सेक्यूलरों के अनुसार भारत में मुस्लिमों की समस्त समस्याओं के पीछ नरेंद्र मोदी का हाथ है। 70 के दशक में भारत में हर घटना के पीछे सीआईए का हाथ होता था। आजकल भारत में हर घटना के पीछे आईएसआई का हाथ होता है।

इस प्रकार हम लोग रोजाना षणयंत्र कारी नई नई थ्योरी पाते रहते हैं जिनसे ये हमारा पूरा मनोरंजन होता है और ये भी पता चलता है  किसके पीछे किसका हाथ है। आप भी अंदाजा लगाईये कि किसके पीछे कौन है?

Manisha गुरुवार, 19 नवंबर 2009
अब क्या होगा कोड़ा का? (पुराने अनुभवों के आधार पर)

झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के द्वारा अरबों रुपये की अवैध कमाई औरMadhu-Kora भ्रष्टाचार के समाचारों के बाद हर कोई सोच रहा है कि अब कोड़ा का क्या होगा? वैसे मधु कोड़ा को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है और वो अपने आप को राजनैतिक साजिश में फंसाने की बात करने लगे हैं और अपने को फंसाने वालों को देख लेने की बात भी करने लगे हैं। इसके अलावा चाईबासा में हंकार रैली करने वाले हैं। यानी कुल मिला कर हम लोगों ने जैसा भ्रष्टाचार के पूराने मामलों में देखा है वैसा ही कुछ इस बार भी होने जा रहा है। आये देखें कि क्या हो सकता है -

  1. अभी शायाद इस बात का इंतजार हो रहा है कि कोई काबिल वकील जमानत के लिये मामला तैयार कर ले  और मधु कोड़ा हजारों समर्थकों की भीड़ जुटा ले उसके बाद ही शायद गिरफ्तार किया जायेगा।
  2. आगामी विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से जीत कर आयेगा और फिर कहा जायेगा कि जनता की अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दे दिया है।
  3. ये कि दो-चार विधायक और चुनके आ गये तो सरकार में आने वाली पार्टी सहयोग लेने के बदले में केस को लटका देगी।
  4. अगर कुछ नहीं हुआ तो भी केस तो बहुत लंबा चलेगा ही, बाद की बाद में देखी जायेगी।

यानी कि कुल मिलाकर जनता तो यही समझती है कि किसी का कुछ नहीं होगा क्योंकि इसस् पहले के घोटालों में भी किसी को कभी कोई सजा नहीं हुई है। भारत में भ्रष्टाचार भी मॆंहगाई की तरह है जिससे सब परेशान है लेकिन कुछ होता नहीं है।

Manisha मंगलवार, 17 नवंबर 2009
ये लोग लड़ने मरने के लिये ही पैदा हुये हैं

आज फिर पाकिस्तान के पेशावर में एक बम विस्फोट हुआ है जिसमें अभी तक कीfata_map जानकारी के अनुसार 8 लोग मारे गये हैं, ये हमला पाकिस्तान की खुफिया संस्था आईएसआई के क्षेत्रीय कार्यालय पर हुआ है। पिछले 2-3 महीने से कोई दिन ऐसा नहीं जा रहा, जब पाकिस्तान में रोज कुछ न कुछ ऐसी घटनायें न घट रही हो। दरअसल पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत  और पास के कबीलाई इलाकों (फाटा) के  पख्तून लोग का काम ही लड़ना मरना है। ये जाति बहादुर और लड़ाकू है। ये लोग हजारों सालों से इसी तरह से लड़ते आये हैं। इन लोगों ने सिकंदर से लड़ाई लड़ी, बाबर, अकबर, जहांगीर, शाहजहां से लड़े, अंग्रेजों से लड़े, महाराज रणजीत सिंह के जमाने में लड़े पर कुछ काबू में रहे, सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान में लड़े  और अब पाकिस्तान की सेना और सरकार से लड़ रहे हैं। दरअसल पुराने भारत के इस इलाके से भारत की शुरुआत थी और आर्यों ने बहुत ही रणनीतिक तौर पर इस दुर्गम इलाके में ऐसी जातियों को बसाया था जो कि लड़ने में माहिर थी और जिनके लिये लड़ांई जीवन जीने का एक तरीका है। पुराने जमान् में ये लोग शठ कहलाते थे और इन लोगों की इतनी बदनामी थी कि एक कहावत थी कि शठ को शठ की भाषा में जबाव  देना चाहिये।

जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था तब इन लोगों ने सिकंदर की सेना के साथ बहुत ही बहादुरी से लड़ा था और इनका इतना आतंक था कि सिकंदर की सेना जो कि एक तिहाई रह गई थी, ने भारत में आगे जाने से इंकार कर दिया था। सिकंदर के जाने के बाद चाणक्य ने इनको  छापामार लड़ाई के लिये प्रशिक्षण दिया जो कि ये लोग अभी तक प्रयोग करते हैं। छापामार लड़ाई की तैयारी से ही सेल्युकस के बाद भारत में यवन शासन खत्म हो गया।  इस पूरे इलाके की संरचना भी इस प्रकार की है कि दुश्मन वहां फंस जाता है इस कारण अक्सर लंबी लड़ाई चलती है। अंग्रेजों को इन्होंने 1897 मे औरक्जई में बुरी तरह हराया था। इसके बाद अंग्रेज इस इलाके में कभी शांति से नहीं रह सके और इल के कबीले वाले इलाकों को अंग्रेजों ने विशेष अधिकार से केवल राजनीतिक एजेन्ट रख कर आजाद ही रखा था। अंग्रेजों की ये व्यवस्था पाकिस्तान ने भी जारी रखी जिसकी वजह से ये लोग अभी भी पुराने कबीलों वाले सिस्टम से रह रहे हैं और आज भी केवल लड़ना-भिड़ना जारी रखे हुये हैं। अंग्रेजों का ये लोग सिर काट लेते थे जिससे अंग्रेजों में इनका बहुत खौफ था।  इनको नये जमाने के हिसाब से पढ़ना-लिखना और कुछ काम सिखाया नहीं गया है। इसलिये ये लोग अभी भी पुराने जमाने के कबाले वाले तरीकों से रह रहे हैं और कबीले का सरदार जिसे मलिक या बाबा कहते हैं का कहना मानकर चलता है और अपने कबीले के लिये छोटी मोटी बातों पर भी लड़ते मरते रहते हैं।

 

(आगे भी जारी रहेगा)

Manisha शुक्रवार, 13 नवंबर 2009
सही मौके को गंवाते लोग

आजकल झारखंड के भूतपूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा द्वारा 4000 करोड़ रुपये से ज्यादा के भ्रष्टाचार का मामला चर्चा में है। पता नहीं कभी आरोप सही भी सावित होंगे या नहीं, या फिर पुराने मामलों की तरह इसमें भी कुछ नहीं होगा और जनता सब जानकर भी कुछ नहीं कर पायेगी।
Never Loose a chance

लेकिन मै इस मामले को किसी और नजरिये से देखती हूं। मेरे विचार में मधु कोड़ा ने ये भ्रष्ट आचरण करके इतिहास में मिले एक सुनहरी मौके को गंवा दिया है। सोचिये कि एक खनिज खान में काम करने  वाला आदमी, एक गरीब घर का आदमी एक राज्य का मुख्यमंत्री बन गया वो भी निर्दलीय हो कर। ये कहानी कुछ मंबईया फिल्मों की तरह की है जो कि लोक गाथा बन सकती थी अगर मधु कोड़ा ने कुछ काम दिल से किये होते। गरीब आदमी से मुख्यमंत्री तक के सफर में मधु कोड़ो ने जो कुछ देखा और जाना उसके बाद वो कुछ ऐसे काम कर सकते थे जिससे झारखंड की जनता का बहुत फायद हो सकता था। लेकिन करोड़ों लोगो मे किसी एक आदमी को मिलने वाले इस मौके को मधु कोड़ा ने गंवा दिया और अपने साथ-साथ अपने राज्य के लोगो को भी निराश किया।

यों इस तरह से अच्छे भले मौकों को गंवाने के किस्से हजारों सालों से हैं, लेकिन मैं पिछले 10-12 सालों के अपने सामने गंवाये गये कुछ मौकों को यहं पर बताना चाहूंगी।
  1. रूबईया और आईसी 814 विमान अपहरण केस – ये ऐसे वाक्ये थे जब देश के लोग और  सरकार एक सख्त रुख अपना कर दुनिया को दिखा सकते थे कि भारत  गलत बातों पर समझौता नहीं करेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ और दुनिया में और खास कर आतंकियों को संदेश मिल गया कि भारत लड़ना नहीं जानता।
  2. मध कोड़ा – जैसा कि मै उपर बता ही चुकी हूं कि किस प्रकार मधु कोड़ा ने मौका गंवा दिया।
  3. लालू प्रसाद यादव -  लालू प्रसाद ने भी कुछ कुछ मधु जैसा ही काम किया। लालू ने भी अपनी जिंदगी मे वो सब खुद देखा है जिसको जानने के लिये पुराने जमाने के राजा भेष बदल कर अपने राज्यों में घूमा करते था, या फिर आजकल राहुल गांधी जानने के लिये घूम रहे हैं। लालू प्रसाद के पास बिहार और दबे, कुचले, पिछड़े गरीब लोगों के लिये काम करने का बहुत ही अच्छा मौका मिला था। जनता ने भी 15 साल तक इसी उम्मीद में लगातार उनको सत्ता में रखा लेकिन बिहार का विकास दूर वो बिहार को और पीछे कर गये। लालु चाहते तो बिहार कहां से कहां पहुंच जाता।
  4. अटल बिहारी बाजपेई और भाजपा -  आजादी के बाद से ही भाजपाई (पहले के जनसंघी) कांग्रेस को अपने निशाने पर लेते रहे कि कांग्रेस ने ये गलत किया, वो गलत किया आदि आदि लेकिन जब भारत की जनता ने तमाम राज्यों में और केन्द्र में भाजपा को मौका दिया तो शासन तंत्र उसी तरह चलता रहा जैसे कि पहले गैर भाजपाई शासन में चलता था। क्या कोई बता सकता है कि  कांग्रेस शासित और भाजपा शासित राज्यों की शासन संरचना और तंत्र में क्या अलग है?  भाजपाईयों ने जिस बात के लिये इतने साल संघर्ष किया और अपनी बारी का इंतजार किया, लेकिन मौका मिलने पर उससे कुछ भी अलग न कर के दिखाया और इतिहास द्वारा मिला सुनहरी मौका गंवा दिया।  
  5. मायावती – मायावती दलितों की एक सशक्त नेता हैं इसमें कोई दो राय नहीं। इसी बात की वजह से उत्तर प्रदेश की जनता ने खास कर दलितों ने पूरे बहुमत से जिता कर सरकार बनाने का मौका दिया है। और ये मौका ऐसा हो कि मायावती चाहे तो इतिहास में हमेशा के लिये स्थान बना सकती हैं। लेकिन मुझे लगता है  वो ये जबर्दस्त मौका गंवा रही हैं। दलितों, गरीबो, पिछड़ों के विकास के लिये जी जान से न लग कर वो बस मूर्तियां और पार्कों के निर्माण में ज्यादा रुचि दिखा रही हैं।  प्रदेश की जनता खासकर दलित वहीं हैं जहां पहले थे, आज भी सड़क, बिजली, पानी, सफाई, शिक्षा वैसी ही है जैसी कि मायावती के मुख्यमंत्री बनने से पहले थी।
  6. राजीव गांधी – राजीव गांधी को भारत की जनता ने लोकसभा में 425 सांसदो का भारी बहुमत दिया था। ऐसा बहुमत को नेहरु और इंदिरा गांधी को भी नहीं मिला था। राजीव गांधी ने नया जमाना  देखा था, उम्र उनके साथ थी, वो भारत के सिस्टम ने काफी परिवर्तन कर सकते थे लेकिन उन्होंने तो एक तरह से हारी हुई सरकार की तरह से भ्रष्ट्राचार पर ये कह कर मुहर लगा दी कि सरकार द्वारा खर्च किये गये 1 रुपये में से केवल 15 पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। राजीव गांधी ने इतिहास का सबसे बहुमत लेकर भी मौका गंवा दिया।
  7. विनोद कांबली – सचिन तेंदुलकर आज भी खेल रहे हैं और रन बना रहे है लेकिन उन्ही का बचपन का साथी और उन्ही की तरह का प्रतिभावान क्रिकेट खिलाड़ी विनोज कांबली मौके गंवा चुका है। विनोद कांबली का रिकोर्ड तेंदुलकर से भी अच्छा था और वो भी लंबे समय तक खेल कर अनेक रिकार्ड बनाते लेकिन उन्होंने गैर क्रिकेट बातों में पड़ कर मौका गंवा दिया।
इसी प्रकार के बहुत सारे अन्य लोग हैं जिन्हें मौका तो मिला लेकिन उसक फायदा न उठा सके। जहां एक ओर सनुहरी मौके गंवाने वाले लोग हैं वहीं दुनिया ऐसे लोगो से भी भरी हुई है जिन्होंने उनको मिले मौके का फायदा उठाकर दुनिया को बहुत कुछ दिया। 

Manisha गुरुवार, 12 नवंबर 2009
हमें तो भूतों से शिकायत है

जी.के.अवधिया जी ने अपने ब्लॉग धान के देश में भूतो के उपर पूरा शोध पत्र पेश किया है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर तो भूतों पर कोई विश्वास नहीं है लेकिन जितना भी भतों के बारे में जानकारी है वो सब राजकुमार कोहली, रामसे बंधुओं और रामगोपाल वर्मा और कुछ हॉलीवुड के फिल्मकारों के कारण ही है। इन्हीं लोगों ने फिल्में बनाकर हमें जागरुक किया है कि भूत होते हैं, कैसे दिखते हैं, किस प्रकार लोगो के उपर आ जाते हैं, किस प्रकार वो अपने दुश्मनों से बदला लेते है आदि आदि। इसके अलावा सत्य कथा और मनोहर कहानियां भी इस प्रकार की बातो को प्रकाशित करते रहे हैं जिसमे बताया जाता रहा कि कैसे किसी के उपर भत आ गया और कैसे बहेड़ी के मौलवी साहब ने उसको काबू में किया इत्यादि इत्यादि। मै तो तो इन्हीं फिल्मकारों और प्रकाशकों की रचनाओं को ही  प्रमाणिक मानकर चलती हूं और इन्हे ही भूतों का विशेषज्ञ समझती हूं और उसी के आधार पर मेरी कुछ धारणायें हैं और भूतों से कुछ शिकायतें भी हैं ।

  1. भूत-प्रेत हमेशा गरीबों को ही परेशान करते हैं। देखिये फिल्मों मे भी या असल जिंदगी में  (सत्य कथा और मनोहर कहानियां के आधार पर) किसी गांव के किसी आदमी या औरत के उपर भूत आ गया। क्या आपने कभी पढ़ा या सुना कि दिल्ली, मंबई के किसी टाटा, बिड़ला, अंबानी, बच्चन, कपूर, गांधी के घर में कोई भूत की प्रवेश करने की हिम्मत भी हुई हो? तो हम क्यों न माने की भूत का जोर भी बस गरीब पर ही है।
  1. भूत हमेशा अपने अपमान का बदला लेता है। अब हमने तो फिल्मों और कहानियों मे ये ही पढ़ा है। लेकिन असल जिन्दगी मैंने कभी नहीं पढ़ा कि किसी भूत ने अपनी मौत का बदला ओसामा बिन लादेन, वीरप्पन, प्रभाकरण, चंगेज खां, तालीबान इत्यादि से लिया हो। तो क्या भूत भी बड़े-बड़े आतंकवादियों और अपराधियों से डरते हैं?
  1. कुछ भूत अच्छे होते है । हो सकता है कि अच्छे होते हों लेकिन कभी भी बुरे आदमी को ऊतों से परेशान होते नहीं सुना। कितनी ही आतंकी घटनायें जैसे कि 9/11, 7/7, 26/11  इत्यादि हईं, कितने ही जुल्मी लोग इतिहास में हुये लेकिन किसी को भी भूतों ने परेशान नहीं किया। क्या अच्छे भूतो को आतंकियो, डकैतों, जुल्मियों को परेशान नहीं करना चाहिये था?
  1. भूत सुनसान, उजाड़ जगह व जंगल वगैरह में रहते हैं।  ऐसी ही जगहों पर आतंकवादी, डाकू, चोर, लुटेरे रहते हैं, लेकिन उनको कोई भूत नहीं दिखता लेकिन यदि कोई सीधा-सादा गांव वाला अगर उधर चला जाये तो उसे परेशान कर देते हैं। बहुत नाइंसाफी है ये।
इस तरह मेरे को भूतों से शिकायत है। हिंदी ब्लॉग जगत में जिन लोगों को भूतों के होने का पूरा भरोसा है और जो ये जानते हें कि वो कहां रहते हैं, उनसे निवेदन हे कि मेरी ये शिकायतें भूतो तक पहुंचा दें।

Manisha सोमवार, 9 नवंबर 2009
सवाल ये है कि आप क्या कर लेंगे?

अमेरिका की एफबीआई ने बीते दिनों पाकिस्तान मूल के अमरीकी डेविड हेडली और पाकिस्तान में जन्मे कनाडाई नागरिक टी. हुसैन राणा को आतंकी साजिश के सिलसिले में गिरफ्तार किया था। दोनों लश्कर के इशारे पर भारत और डेनमार्क में हमलों की साजिश रच रहे थे। इस सिलसिले में भारत के गृहमंत्री चिदम्बरम जी ने कहा कि इसमें पाकिस्तान का हाथ साफ है। इससे पहले पिछले साल जुलाई और इस साल अक्टूबर में काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर भी हमले किये गये थे जिन में भारत ने पाकिस्तान और उसकी आईएसआई व तालीबान का नाम लिया था और सबूत पेश किये थे। मंबई में 26/11 के भीषण हमले में भी भारत ने पाकिस्तान का नाम लिया था। मेरा सवाल भारत सरकार से ये है कि जब इन सबके पीछे आईसएसआई और पाकिस्तान है ये बात सब जानते हैं लेकिन आप ने ये सब जानने के बाद क्या किया ये कोई नहीं जानता। आप तो  पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देते हैं, कभी पाकिस्तान को आतंकवाद का शिकार बताते हैं, कभी शर्म अल शेख में उससे समझौता कर लेते हैं, कभी उसको वार्ता के लिये आमन्त्रण देते हैं। तो फिर किसी भी घटना होने पर केवल पाकिस्तान का नाम लेने से क्या होगा? कुछ कर के भी तो दिखाइये। आईएसआई और पाकिस्तान बार-बार घटनाये करते जाते हैं और आप बस उनका नाम ले लेते हैं। मैं कहती हूं कि आईएसआई का हाथ है तो आप उसका क्या कर लोगे?

Manisha शनिवार, 7 नवंबर 2009
जाना हुआ अपोलो हॉस्पिटल में

पिछले दिनों हमारे एक परिचित दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में सीने में दर्द के कारण भर्ती थे और सबसे अच्छी बात मुझे जो लगी जिसका वजह से मैं ये पोस्ट लिख रही हूं कि वहां पर हर बोर्ड पर अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में जरुर लिखा हुआ है और इसका ध्यान हर जगह रखा गया है। अधिकांश प्राइवोट संस्थानों में केवल अंग्रेजी में ही सब कुछ लिखा मिलता है लेकिन अपोलो अस्पताल शायद अपवाद है मुझे ये देख बहुत ही अच्छा लगा और इसके लिये मैं अपोलो अस्पताल की प्रशंसा करना चाहुंगी। अपोलो हॉस्पिटल उनका इलाज ह्रदय रोग विभाग में चल रहा था, तो हम लोग उनको देखने और मिलने के लिये वहां पर गये थै। अपोलो अस्पताल के बारे में हमने पहले काफी सुन रखा था जिस में से अधिकांश नकारात्मक था। ये अस्पताल काफी मंहगा है और पांच सितारा स्तर की सुविधायें हैं। बहरहाल हम जब वहां पहुंचे तो पता चला कि पार्किंग वैसे तो काफी बड़ी है लेकिन पूरी भरी हुई थी और प्रति आगमन 25 रूपये का शुल्क लगता है। खैर किसी तरह जगह मिली और गाड़ी खड़ी करके हम लोग अपोलो अस्पताल के अन्दर गये।  अस्पताल के अन्दर की लॉबी काफी अच्छी बनी हुई है और वहां पर लोगो के बैठने के लिये बहुत सारी कुर्सियां लगी हुई हैं। यहीं पर लोगो के खाने पीने के लिये काफी हॉउस व अन्य दुकाने भी हैं।

मैने देखा कि अफगनिस्तान के लोगों के लिये अपोलो में एक विशेष काउंटर खोला हुआ है और इस अस्पताल में बहुत सारे विदेशी लोग इलाज कराने आते हैं खास कर अफगानी और इराकी लोग। हम ने बहुत सारे विदेशियों को वहां देखा।  अपने परिचित से मिलने के समय मैंने देखा कि वहां पर मेडिकल से संबंधित काफी सुविधायें हैं बहुत सारे उपकरण हैं हालांकि इलाज काफी मंहगा है। लेकिन इसके बावजूद अपोलो अस्पताल में काफी भीड़ दिखी। इससे ये पता चलता है कि लोगो को अच्छा इलाज चाहिये भले ही वो मंहगा हो।  लेकिन आम आदमी क्या करे? क्या उसके लिये बिना सुविधाओं के सरकारी अस्पताल ही बने हैं?

Manisha सोमवार, 2 नवंबर 2009
फियेट का मल्टीजेट इंजन देश का इंजन बन गया है

पिछले दिनों हमारे एक जानकार को नई कार खरीदनी थी उन्होंने कारों के बारे में थोड़ी जानकारी इकठ्ठीMultijet-Fiat-Engine करनी शुरु की और इस मामले में हम लोगों से भी सलाह मांगी। हमारे परिचित को डीजल इंजन की कार खरीदनी थी। उनके हम से संपर्क करने के बाद हमने भी कारों से संबंधित वेबसाइट और ब्लॉगों को खंगालना शुरु किया। कई दिनों के बाद हम को कुछ समझ में आया कि कार खरीदने के लिये क्या क्या जानना चाहिये। लेकिन एक विशेष बात ये समझ में आई की इटली की फियेट कार कंपनी का  बनाया हुआ 1.3 लीटर की मल्टीजेट डीजल इंजन (1.3 Multijet) इतना अच्छा है कि उसको कई कारो में इस्तेमाल किया जा रहा है। कई कार ब्लॉगो पर इस डीजल इंजन को राष्ट्रीय इंजन लिखा जा रहा है।  आप भी देखिये कि ये मल्टीजेट इंजन फियेट की पालियो, लीनिया, ग्रांदे पुंटो, मारुति सुजुकी की स्विफ्ट, स्विफ्ट डिजायर, रिट्ज वा टाटा की इंडिका विस्टा व इंडिगो मांजा के कई विकल्पों में इस्तेमाल किया जा रहा है। तो क्या वाकई ये हमारे देस का सबसे पसंदीदा इंजन है?   कारों की बिक्री के आंकड़े तो इसी की पुष्टि करते दिख रहे हैं। वैस हमारे परिचित नें टाटा की इंडिका विस्टा खरीद ली है।

Manisha शनिवार, 31 अक्तूबर 2009
कुछ भी तो नहीं बदला मध्य युग से अब तक

मध्य युगीन लड़ाकू लोगकल शाम पश्चिम बंगाल में नक्सली समर्थक पुलिस संत्रास प्रतिरोध समिति [पीसीपीए] के माओवादियों ने दुस्साहसिक कार्रवाई करते हुए भुवनेश्वर-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस को अगवा कर लिया और ट्रेन के चालक और सह चालक का अपहरण कर लिया हालांकि बाद में चालक-सह चालक को रिहा करा लिया गया। यह सब देख कर मुझे लगा कि आज के सभ्य समाज में और मध्य युग में क्या कहीं कुछ बदला है? जैसे मध्य युग में होता था वैसै ही आज के युग में भी कोई भी हथियार उठाकर बड़े इलाके पर कब्जा कर लेता है और सरकारों और जनता पर अपना राज चलाने लगता है। प्रभाकरण, वीरप्पन, सलाउद्दीन, हकीमुद्दीन महसूद, बैतुल्लाह मेहसूद, मंगल बाग, हकीमुद्दीन हक्कानी, किशनजी, छत्रधर महतो, मुल्ला उमर जैसे कितने ही आजकल के जमाने में भी हथियार देशों के बड़े इलाकों पर अपना राज चलाते रहते हैं।  पहले जमाने में राजा लोग इस तरह के हथियार उठाने वाले से मुकाबला भी करते थे, लेकिन आज के जमाने में लोकतंत्र में सरकार किसी की अपनी नहीं होती है इसलिये मुकाबला ढंग से नहीं करते बल्कि कई बार उन्हीं से मिल जाते है। कई बार तो संबंधित देशों की सरकारें ही इनको खडा करती हैं बाद में अपने लिये मुसीबत बढ़ा लेती हैं। अब यही कहा जा सकता है  आजकल के जमाने में कुछ नहीं  बदला है बल्कि आज भी कोई अगर अपना गिरोह बना ले तो वो सत्ता पर कब्जा कर सकता है।

एक तरफ तो ऐसे हथियारों के बल पर राज्य पर कब्जा करने वाले लोग हैं वहीं दूसरी ओर आज के जमाने में आम जनता भी उसी दिमागी तौर पर मध्य युगीन हालात में रह रही है। आज ही के समाचार पत्रों मे छपा है कि दिल्ली में अक परिवार ने अपनी ही लड़की को समान गोत्र में शादी करने के कारण बलात्कार करवा कर हत्या कर दी। इस तरह के समाचार रह रह कर सामने आते रहते हैं। इसलिये मुझे आश्चर्य लगता है कि कुछ भी तो नहीं बदला मध्य युग से अब तक।

Manisha बुधवार, 28 अक्तूबर 2009
लोकतंत्र नीचे तक नहीं पहुंचा है

हम लोग यह बात  दुनिया को गर्व से बताते हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और हमारे यहां लोकतंत्र लोकतंत्र की परम्परायें रही हैं। लेकिन दुसरी ओर मैं देखती हूं कि वास्तव में सच्चे लोकतंत्र के तो कोई लक्षण ही नहीं हैं। सच्चा लोकतंत्र वो होता है जहां पर कोई अदना सा भी अपनी बात कह सके, अपनी बात के लिये लोगो का समर्थन ले सकें। लेकिन व्यवहार में क्या हो रहा है?  अभी हाल ही में तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद कहा गया कि मुख्यमंत्री का चुनाव कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी करेंगी। अब नवनिर्वाचित विधायकों को तो काम ही नहीं रहा अपने और प्रदेश के लिये कोई नेता वो चुनने से वंचित हो गये, इसी तरह बीजेपी ने राजस्थान में वसुंधरा राजे से कहा कि वो पद छोड़ दे भले ही वहां के भाजपा के विधायक चाह रहे कि वो उस पद पर रहें। उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार और बसपा के सारे निर्णय खिद ही लेना चाहती हैं, किसी अन्य को कोई निर्णय लेने की आजादी नहीं है। यहां तक की मंत्री भी अपने विभाग के सिसी आदमी का ट्रांसफर तक नही कर सकता। दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के लिये तैयारी को लेकर निगरानी का मामला उठा तो सीधे प्रधानमंत्री को दखल देनी पड़ी। नीचे कोई सही तरीके से निर्णय लेने के लिये नहीं है। यानी सारे निर्णय उपर के लोग ही लेंगे, नीचे कोई जिम्मेदार नहीं है। क्या ऐसे ही लोकतंत्र चालाया जाता है? हमारे घरों में भी कुछ ऐसा ही हाल है। भले ही बच्चे वयस्क हो जायें, लेकिन घर के अधिकांश मामलों में घर के बुजुर्ग ही अंतिम फैसला करना चाहते हैं। आखिरकार निर्णय लेने की क्षमता नीचे तक तो पहुंचनी ही चाहिये न। क्या केवल समय पर चुनाव करा देना ही लोकतंत्र है या अपने व्यवहार में लोकतांत्रिक बनना भी जरुरी है?

Manisha सोमवार, 26 अक्तूबर 2009
अंग्रेजी नामों वाली हिंदी फिल्में बन रही हैं

अंग्रेजी नाम वाली हिंदी फिल्में बन रही हैंअगर आप ने गौर किया हो तो शायद ये देखा हो कि आजकल प्रदर्शित होने वाली अधिकांश फिल्मों के नाम वांटेड, ऑल द बेस्ट, ब्ल्यू, वेक अप सिड, फ्रूट एंड नट, डू नॉट डिस्टर्ब  इत्यादि प्रमुख हैं। हालांकि पहले भी ऐसी फिल्में पहले भी बनती रही है लेकिन पिछले कुछ समय से इस तरह की अंग्रेजी नाम वाली फिल्में कुछ ज्यादा ही बन रही हैं। अपनी कॉमेडी फिल्मों के लिये प्रसिद्ध डेविड धवन  अंग्रेजी नाम का इस्तेमाल काफी समय से कर रहे हैं उनकी कई फिल्मों के नाम इसी तरह के थे जैस् कि कुली नंबर वन, आंटी नंबर वन, हीरो नंबर वन, बीबी नंबर वन, पार्टनर, लोफर, डू नॉट डिस्टर्ब इत्यादि रहे हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक मधुर भंडारकर की तो हर फिल्म का नाम अंग्रेजी का होता है। उन्होनें अब तक चांदनी बार, पेज थ्री, कॉरपोरेट, ट्रैफिक सिगनल, फैशन आदि बनाई हैं जो कि अंग्रेजी नामों की है और अब वो एक और फिल्म जेल लेकर आ रहे हैं। आने वाली कुछ फिल्में भी इसी तरह से आखिर क्या कारण है इस तरह से फिल्में बन रही है। कुछ बातें इस बात का शायद जबाब दे सकें
अंग्रेजी में हैं। पिछले कुछ दिनों में रिलीज हुई फिल्मों में
  • हिंदी फिल्में अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज होती हैं और अंग्रेजी नाम से थोड़ा फायदा मिल सकता है। हिंदी फिल्मों की अधिकांश कमाई प्रवासी भारतीयों द्वारा फिल्में देखने से होती है, लिहाजा उन्हीं के हिसाब से फिल्में बनती हैं।
  • इससे ये भी पता चलता है कि भारत में मल्टीप्लेक्स में फिल्मे देकने वाले मध्यम और उच्च वर्ग के लिये ही फिल्में बन रही हैं
  • ये भी पता चलता है कि देश के अंदर के देसी और अंदर के इलाकों के लोगों की समस्याओं और उससे संबंधित फिल्में अब कम बनने लगी हैं।
  • भारत में अंग्रेजी की स्वीकार्यता भी इससे पता चलती है।
मेरे विचार में अपवाद के रुप में तो अंग्रेजी नाम वाली हिंदी फिल्में तो ठीक हैं लेकिन अगर ये बहुतायत से होने लगे तो खतरे की घंटी है। हमें समय रहते चेत जाना चाहिये।

Manisha रविवार, 25 अक्तूबर 2009
ब्लॉगर में ये क्या हो रहा है?

ज सुबह से मैं जब से ब्लॉगर  की साईट पर जाने की कोशिश कर रही हूं तो ये चेतावनी आ रही है। पता नहीं ब्लॉगर में क्या परेशानी है?   

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Manisha शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2009
दीपावली पर देसी से दूर लोग

कल धूमधाम से हमारा सबसे बड़ त्यौहार दीपावली संपन्न हुआ, हालांकि अभी कुछ और साथी त्यौहार बाकी हैं। जैसा कि दीवाली पर आम तौर पर होता है हम सभी लोग अपने घरों को सजाते हैं और बाजार में बड़े पैमाने पर खरीदारी करते हैं। लेकिन मुझे तब बहुत दुख होता है जब मैं ये देखती हूं कि भारतीयों (हिन्दुओं) के ही देश में भारतीय (हिन्दु) ही त्यौहार का मजा बिगाड़ने को तैयार रहते हैं। मजबूरी में हमें देसी छोड़ विदेशी वस्तुयें खरीदनी पड़ती हैं। पछले कई वर्षों से चीन से बड़े पैमाने पर ऐसा सामान आ रहा है जो कि दीवाली पर काफी प्रयोग होता है। तरह-तरह की रोशनी वाली लाइटें, आतिशबाजी, यहां तक की लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां भी चीन से आ रही हैं। इस बार लोगों द्वारा बड़ी मात्रा में भारतीय बैंकों से खरादे गये  सोने के सिक्के भी स्विटजरलैंड से बन कर आये हैं और पूरे शुद्ध हैं। विदेशी वस्तुयें न केवल सस्ती हैं बल्कि अच्छी क्वालिटी की भी हैं। लोगों को शायद बुरा लगे लेकिन जो वस्तुयें देसी लोगों के हाथ मे हैं वो न केवल मंहगी हैं बल्कि घटिया स्तर की और नकली तक हैं। पूरे बाजार में नकली देसी घी, नकली मावा, नकली पटाखें भरे पड़े हैं। ऐसे में अगर लोग विदेशी सामान न खरादें तो क्या करें? कोई आश्चर्य की बात नहीं अगर कुछ दिनों नें विदेशी देसी-घी और मिठाई भी भारत में आने लगें।  आखिर क्यों भारतीय अपने ही देश को लोगों को क्यों ठगने की कोशिश करते हैं और नकली व घटिया सामान देकर अपने ही देश का त्यौहार बिगाड़ रहे हैं?

Manisha रविवार, 18 अक्तूबर 2009
बचें चकाचौंध वाले विज्ञापनों से

ऐसा लगता है कि घरेलु सामान के निर्माता हमको इस त्यौहारों के मौसम मे कुछ न कुछ सामान बेच कर ही मानेंगे। किसी भी समाचार पत्र को उठा लीजिये या फिर टीवी का कोई भी मनोरंजन या समाचार चैनल देख लीजिये, चकाचौंध वाले, कई प्रकार के लुभावने विज्ञापन हाजिर हैं। इस तरह के विज्ञापन इस कदर चकाचऔंध वाले  कि अगर आप ने कभी एलसीडी टीवी (LCD TV) लेने के लिये नहीं सोचा हो तो सोचना शुरु कर देंगे, वाशिंग मशीन बदलने चाहे कोई इरादा न हो लेकिन इस बात पर कुछ गौर तो फरमाने ही लगते है।

 

आजकल विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रानिक व घरेलु सामान के निर्माता कई प्रकार की योजनायें लाकर ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं। जिनमें कुछ इस प्रकार है -

  1. फ्री गिफ्ट – इस प्रकार की योजना में ग्राहक को ये बताया जाता है कि आपको सामान करीदने पर कुछ न कुछ मुफ्त उपहार मिलेगा।  हालांकि ये बात अलग है कि ये उपहार कितना मुफ्त होता है और कितना मुख्य सामान की कीमत में शामिल होता है, दूसरी बात ये कि  हो सकता है कि मुफ्त मिलने वाले समान में आप की रुचि न हो या फिर कई बार पुरानी पड़ चुकी (आउटडेटेड) वस्तुयें भी इस तरह की स्कीमों में चला दी जाती हैं।
  2. स्क्रैच कार्ड – इस तरह की योजना में ग्राहक को ये बताया जीता है कि खरीदने पर आपको एक कूपन मिलेगा जिसमें कुछ न कुछ अवश्य मिलेगा और कुछ बड़ा भी निकल सकता है।  अधिकांश समय इस तरह के कूपन में मिलने वाली वस्तु कोई मामूली सी होती है और बड़ा सामान किसी का नहीं निकलता है।
  3. लकी ड्रा – ये वाली योजना सबसे ग्राहक के लिये सबसे ज्याद बेकार होती है। बताया तो ये जाता है कि लाखो-करोंड़ों के इनाम निकलेंगे। लेकिन अधिकांश ग्राहक इतने लकी नही होते और दूसरी बात ये कि अगर किसी का इनाम निकला भी तो केवल एक को ही तो मिला, सभी ग्राहकों को तो कुछ भी नहीं मिला।

अत: इस तरह की किसी योजना में न फंस कर अपनी अक्ल का प्रयोग करके ही सामान खरीदना चाहिये और चकाचौंध वाले किसी भी विज्ञापन से प्रभावित नहीं होना चाहिये।

Manisha गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009
नकारात्मक होना इतनी भी बुरी बात नहीं

सभी लोग कहते हैं कि जीवन में आदमी को सकारात्क होना चाहिये और उसकी सोच भी सकारात्मक होनी नकारात्मक होना इतनी भी बुरी बात नहीं चाहिये।  बात बिलकुल सही है सही सोच से ही जिन्दगी आगे बढ़ती है। लेकिन कई बार मुझे लगता है कि हालांकि नकारात्मक होना सही नहीं है लेकिन हर बात में ये इतना भी बुरा नहीं है। अगर किसी बात को लेकर नकारत्मक है तो क्या हम वास्तविकता के ज्यादा करीब होते हैं? पता नहीं। पर मैं एक बात के माध्यम से अपनी बात कहती हूं।

पिछले हफ्ते हमने अपने दुसरे बच्चे के लिये एक नामी स्कूल में दखिले के लिये आवेदन किया था और सब प्रकार से ऐसा लग रहा था कि वहां पर हमारे बच्चे की प्रवेश हो जायेगा, बच्चा ठीक-ठीक था, स्कूल घर के पास था, स्कूल वाले हमें जानते थे इत्यादि इत्यादि। हमने ये समझ कर कि इस स्कूल में एडमिशन तो हो ही जायेगा, अन्य दो-तीन विद्यालयों का फार्म भी नहीं भरा। लेकिन हमारी सोच के उस दिन बड़ी झटका लगा जबकि उस विद्यालय की सफल बच्चों की सूची में हमारे बच्चे का नाम गायब था।  

यानी कि अब हमें अन्य स्कूलों में जाकर फार्म भरने हैं और जिनका हमने फार्म नहीं भरा, वहां पर प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अब अगर हमने सकारात्मक होने के बजाय थोड़ा नकारात्मक होकर सोचा होता तो हम हर किसी स्कूल के लिये फार्म भरते न। तो मेरे विचारो में अब परिवर्तन आ गया है और मुझे लगता है कि
  • नकारात्मक होकर व्यक्ति अपनी क्षमताओं का सही आंकलन कर पाता है।
  • नकारात्मक होकर हम अति भरोसा (ओवर-कोन्फिडेंस) में न रह कर वास्तविक धरातल पर रखता है।
  • आपके अप्रत्याशित परिणामों के लिये तैयार रखता है।
  • अन्य विकल्पों के लिये तैयार रखता है।

Manisha मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009
मौसम विभाग से मौसम मजाक कर रहा है

लगता है मौसम और मौसम विभाग में छत्तीस का आंकड़ा है। मौसम विभाग कुछ भविष्यवाणी करता है और मौसम कुछ और गुल खिलाता है। पहले अप्रैल के महीने में मौसम विभाग  ने कहा कि इस बार देश में अच्छी बारिश होगी तो मौसम ने मानसून को ही देश से गायब कर दिया। इधर मौसम विभाग  ने मानसून की समाप्ति की घोषणा की तैयारी की तो अब ऐसी बारिश हो रही है कि भयंकर बाढ़ आ गई है। कर्नाटक, आंध्र और उड़ीसा की बारिश के बारे में मौसम विभाग कोई भविष्यवाणी नहीं कर पाया और जबर्दस्त बारिश ने इन प्रदेशों में बाढ़ कर दी। इधर दिल्ली के आस-पास भी बारिश का मौसम है। क्या मौसम विभाग कुछ बता पायेगा कि क्या होने वाला है।

अब अपनी खिसियाहट मिटाने के लिये हम ये क्यों न कहें कि मौसम विभाग से मौसम मजाक कर रहा है?

Manisha सोमवार, 5 अक्तूबर 2009
चिठ्ठाजगत के लिये नुकसान है ब्लॉगवाणी का बंद होना

ब्लॉगवाणीएक तो वैसे ही हिंदी के ब्लॉग पाठकों की संख्या की कमी से जूझ रहे हैं, वहीं दुसरी ओर हिंदी के चिठ्ठों के संकलन नारद तो पहले से ही गायब और अब ब्लॉगवाणी का बंद होना वास्तव में हिंदी चिठ्ठों के लिये बहुत नकसानदेह रहेगा। जहां जरुरत इनकी संख्या को बढ़ाने की वहीं पर ये बंद हो रहे हैं। हालांकि ब्ल़गवाणी नें अपने वर्तमान रुप को बंद करने की कोई ठोस वजह नहीं बताई, जो बताई है वो किसी वेबसाईट के बंद होने के लिये को पर्याप्त कारण नहीं है। आखिर लोग तो वेबसाइटों की कमियों का फायदा उठाते हैं, उसके लिये कोई वेबसाइट थोड़े ही बन्द की जाती हैं?
वाले एग्रीगेटर बंद होते जा रहे हैं। सबसे पुराना चिठ्ठा एग्रीगेटर

मेरे विचार में ब्लॉगवाणी जैसे और संकलक खुलने चाहिये और उनको इन का व्यवसायिक दोहन भी करना चाहिये,  बिना कमाई करे चल पाने मुश्किल हैं। फ्री सेवा करने की रोमानी दुनिया से बाहर निकल कर वास्तविक दुनिया के हिसाब से इन्हें चलाने की आवश्यकता है। आखिर अंग्रेजी के ब्लॉग एग्रीगेयटर भी तो ऐसा कर ही रहे हैं। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता  तब तक हिंदी ब्लॉगजगत को खासा नुकसान है।

पुनश्च :  पाठकों की मांग पर ब्लोगवाणी वापस शुरु हो गया है। बहुत ही अच्छी खबर है।

Manisha मंगलवार, 29 सितंबर 2009
ये पाकिस्तानी अखबार का चित्र है

गौर से देखिये ये भारत के किसी अखबार में छपने वाले विज्ञापन का चित्र नहीं, बल्कि पाकिस्तान के कराची शहर से छपने वाले डॉन (Dawn)  अखबार का चित्र है। कराची में अब भारतीय हिंदी फिल्में रिलीज होने लगी है। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि पाकिस्तान का कोई व्यक्ति हिंदी फिल्मों के अधिकार खरीद लेता है और तकनीकी तौर पर हिंदी फिल्म पाकिस्तानी फिल्म बन जाती है और इस तरह वो पाकिस्तान के सिनेमा हॉलों में जारी हो जाती है। वैसे आधिकारिक तौर पर हिन्दी फिल्मों और भारतीय टीवी चैनलों पर रोक है। पाकिस्तान में ये माना जाता है कि हिंदी फिल्मों के वहां रिलीज होने से पाकिस्तानी फिल्म उद्योग को नुकसान होगा और भारत विरोध तो बड़ा कारण है ही।

वैसे मेरे विचार में इस रोक से इसमें पाकिस्तान के फिल्म उद्योग को नुकसान है। हिंदी फिल्मों के लिये पाकिस्तान एक छोटी जगह है लेकिन उनके लिये भारत का बाजार बहुत बड़ा है। ऐसे में अगर कोई अच्छी पाकिस्तानी फिल्म भारत में रिलीज होकर अगर हिट हो गई तो सोचिये कि वो कितनी कमाई करके ले जायेगा। फिर भी मैं दोनों तरफ की फिल्में दोनों तरफ रिलीज होनी चाहिये के पक्ष में हूं।

फिलहाल ये देखिये कि हिंदी फिल्में भारत के साथ-साथ पाकिस्तान में भी एक साथ रिलीज है रही हैं।

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Manisha शनिवार, 26 सितंबर 2009
ब्लॉग एक्शन दिवस पर भाग लीजिये

BlogActionDayहालांकि ब्लाग एक्शन दिवस अमेरिका में हो रहा है लेकिन दुनिया भर के ब्लागरों और चिठ्ठाकारो के लिये खुला है।  इसमें आप अपने चिठ्ठे को पंजीकृत करा कर ब्लाग एक्शन दिवस-2009 (Blog Action Day 2009) के लिये सहयोग कर सकते हैं। इसमें दरअसल करना ये है कि 15 अक्टूबर को दुनिया भर के ब्लॉगर एक साथ एक ही समय अपने ब्लॉगों पर महत्वपूर्ण विषयों पर लिखेंगे। मुझे लगता है कि हम हिंदी चिठ्ठाकारों को भी इसमें भाग लेना चाहिये। मैने अपना रजिस्ट्रेशन करवा लिया है आप एक्शन दिवस 2009 की साईट पर विजिट करके पंजीकरण करि लीजिये और इस में भाग लीजिये।

Manisha शुक्रवार, 25 सितंबर 2009
भारत में छोटी कारों के बाजार में घमासान

कल फोर्ड नें अपनी नई छोटी हैचबैक कार फिगो (Figo)  को पेश किया है जोकि अगले साल के शुरु सेFord-Figo भारत में बिक्री के लिये अपलब्ध होगी। अभी तक फोर्ड की भारत में कोई हैचबैक गाड़ी नहीं थी। दनिया भर में छाई मंदी के बीच कार कंपनियों को भारत और चीन ही एक बड़े बाजार के रुप में नजर आ रहे हैं। मंदी के दौर में भी भारत में छोटी गाड़ियों के बिक्री के आंकड़ो के अनुसार कारों के बिकने में बढ़ोतरी जारी है। सभी बड़ी कार कंपनियां छोटी गाड़ियों के या तो नये संस्करण जारी कर रही हैं या नये मॉडल उतार रही हैं। पिछले एक साल के अन्दर मारुति-सुजुकी ने रिट्ज (Ritz), एस्टिलो (Estilo), हुंडई (Hyundai)  नें आई20 (i20), टाटा मोटर्स ने इंडिका विस्टा (India Vista) तथा नैनो (Nano), फियेट ने ग्रांडे पुंटो (Fiat - Grande Punto), फोरड की फिगो इत्यादि लांच की गई हैं।

इसके अलावा पहले से ही बाजार में सुजुकी की मारुति-800, आल्टो, वैFiat-Puntoगन-आर, स्विफ्ट, जनरल मोटर्स की स्पार्क, यु-वा (U-VA), हुंडई की आई10 (i10), सैन्ट्रो, टाटा की इंडिका, फियेट की पालियो इत्यादि उपलब्ध हैं। वोक्स-वैगन जनवरी-2010 नें पोलो गाड़ी लांच कर ने वाली है। इन सब में अधिकांश गाड़ियों को कई – कई मॉडल हैं और अधाकांश के पैट्रोल व डीजल दोनों संस्करण हैं। कईयों के गैस व सीएनजी संस्करण भी उपलब्ध हैं।

भारत में बिकने वाली 70% गाड़ियां छोटी गाड़ी (हैचबेक) होती हैं, ऐसे में सभी कंपनियां इस बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती हैं। भारत का मध्यम-वर्ग बहुत बड़ा है और उसके पास खर्च करने लायक पैसा भी है। अब कार ग्राहकों के पास अच्छे विकल्प हो गये हैं, साथ ही परेशानी भी बढ़ गई है कि किसे खरीदें और किसे नहीं?

हमारे पास फिलहाल तो 10 साल पुरानी मारुती-800 है जिससे अच्छा काम चल रहा है। जब खरीदनी होगी तब कर अन्य छोटी गाड़ियां भी बाजार में आ चुकी होंगी। मुश्किल रहेगा कि कौन सी कार खरीदी जाये?

Manisha गुरुवार, 24 सितंबर 2009
बचिये इन तांत्रिकों से

baba-Bangali आजकल रह-रह कर इस तरह की खबरें आती रहती हैं कि किसी तांत्रिक के कहने से किसी ने किसी की बलि दे दी इत्यादि। कुछ समय पहले इस तरह की खबरें आईं थीं कि पड़ोसी के बच्चे की बलि दे दी या फिर पुत्र की कामना में पनी ही पुत्री की बलि दे दी। इस तरह के से समाचार सचमुच बहुत ही दुखद होते हैं और समझ में नहीं आता है कि लोग, वो भी पढ़े-लिखे लोग कैसे इन तांत्रिकों की बातों में आ जाते हैं। कितने ही परिवार इन तांत्रिकों के चक्कर में आकर बर्बाद हो लेकिन फिर भी  आजकल देश में खूब तांत्रिकों का धंधा खूब चल रहा है और कई सारे बंगाली तांत्रिक प्रगट हो गये हैं।


दिल्ली में अक्सर डीटीसी की बसों में तांत्रिकों के विज्ञापन वितरित किये जातें हैं और समाचार पत्रों में भी विज्ञापन दिये जाते हैं। इन बंगाली तांत्रिकों में से अधिकांश मुस्लिम तांत्रिक हैं। ये लोग अपने आपको माता का भक्त बताते हैं हर प्रकार का समस्या ये छुटकारा दिलाने का झांसा देते हैं। लोगों को इनसे सावधान रहने की आवश्यकता है। इतनी बड़ी संख्या में अचानक बंगाली तांत्रिकों के देश में दिखने से मुझे तो संदेह है कि हो सकता है कि ये सब योजनाबद्ध तरीके से देश में लाये गये हों और पड़ोसी देश के जासूस हों। 

Manisha मंगलवार, 22 सितंबर 2009
नक्सलियों के विरुद्ध प्रचार की शुरुआत

इधर नक्सलियों के खिलाफ बनी संयुक्त सशस्त्र बल कोबरा (COBRA - Commando Battalion for Resolute Action) और छत्तीसगढ़ पुलिस के द्वारा लगभग 30 नक्सलियों के मारे जाने की अच्छी खबर आई ही थी कि इधर भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा नक्सलियों के खिलाफ जनता में प्रचार करने के लिये विज्ञापन सभी अखबारों में देने शुरु कर दिये हैं। आज के सभी समाचार पत्रों में इस तरह के विज्ञापन जारी किये गये हैं। हालांकि यह अच्छी बात है  लेकिन अभी नक्सलियों के हमदर्द और मानवाधिकार संगठनों के लोग आते ही होंगे ये बताने के लिये कि ये मुठभेड़ फर्जी थी और उस को लेकर माडिया में माहौल बनाया जायेगा। सरकारें इन के दबाबों में आ जाती हैं तो ये देखने की बात रहेगी कि सरकार खाली इस तरह से प्रचार ही करेगी या फिर सरकार में सचमुच नक्सलियों से लड़ने की इच्छा है?
AntiNaxalAdvt

Manisha रविवार, 20 सितंबर 2009
एक उपाधि का नाम है ओसामा बिन लादेन

हम लोग बचपन में वेताल (फैन्टम) की कहानियां कामिक्स  में पढ़ा करते थे जिसमें  बताया जाता था कि  पिछले 400 सालों से वेताल का अस्तित्व है और जंगल के लोग उसको अपना रक्षक मानते थे, लेकिन वास्तविकता में वेताल एक मुखौटा और उपाधी थी जिसमें परम्परागत तौर अगली पीढ़ी वेताल बनती रहती था। मेरे विचार में अल-कायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन भी किसी तरह की एक उपाधि लगता है। असल में  अपनी मौत की चर्चाओं के बीच दुनिया का सबसे कुख्यात आतंकवादी और अल कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन एक बार फिर प्रकट हुआ है। रविवार को लादेन का नया वीडियो टेप सामने आया है, जिसमें उसकी तस्वीर इस्तेमाल की गई है। अल कायदा की मीडिया इकाई की ओर से जारी इस टेप को अमेरिकी जनता के नाम संबोधन करार दिया गया है। अल कायदा की मीडिया इकाई का दावा है कि इसमें सुनाई देने वाली आवाज लादेन की है। लादेन ने टेप में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की नीतियों को जमकर कोसा है। लादेन ने ओबामा को शक्ततहीन बताते हुए कहा है कि वह अफगान युद्ध को रोक पाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए। अमेरिका की साइट इंटेलीजेंस ग्रुप ने लादेन की इस टेप का अनुवाद जारी किया है।

दरअसल इस तरह के टेप और बयान वेताल की परंपरा का ही एक रुप लगता है। पाकिस्तान कहता है ओसामा बिन लादेन मर गया है, अमेरिका कहता है कि वो जिन्दा है और पाकिस्तान में छुपा हुआ है, अल कायदा उसके टेप जारी करके दुनिया को डराता रहता है।

भले ही ओसामा बिन लादेन मर गया हो, लेकिन उसको जिन्दा रखने की खबर बनाये रखने में सबका फायदा है।  अमेरिका को ओसामा बिन लादेन के जिन्दा होने की कबर के सहारे अपने आतंकवाद विरोधी अभियान को चलाये रखने का बहाना मिल जाता है, पाकिस्तान को अमेरिका से डालर और हथियार बटोरने का मौका मिल जाता है, अल कायदा को अपने आतंक के साम्राज्य को फैलाने में मदद मिल जाती है, तालीबान ओसामा बिन लादेन से प्रेरणा लेता है, यानी ओसामा बिन लादेन के बने रहने में सबका फायदा है। इसलिये मुझे लगता है कि ओसामा बिन लादेन  के मरने की आने वाले 20-25 सालों में भी कोई खबर आने वाली नहीं है और उसके नाम को उपाधि की तरह इस्तेमाल करके कुछ मिथक तैयार करके उसके नाम का फायदा लिया जाता रहेगा।  उसी की तरह के मुखौटे बना कर नये टेप जारी होते रहेंगे, अमेरिका उन्हें प्रमाणित करता रहेगा। वेताल की तरह ओसामा बिन लादेन भी अमर चरित्र रहेगा।

अंतिम पंक्ति :  ओसामा बिन लादेन 2 मई 2011 को पाकिस्तान को एबेटोबाबाद में मारा  गया

Manisha मंगलवार, 15 सितंबर 2009
क्या कोई राष्ट्रपिता के लिये भी तर्पण करता है?

क्या कोई राष्ट्रपिता के लिये भी तर्पण करता है?आजकल हिन्दुओं के घर में श्राद्ध पक्ष चल रहा है और घर में श्राद्ध तर्पण होते देख वैसे ही मन में आया कि क्या कोई राष्ट्रपिता (महात्मा गांधी) और स्वतंत्रता संगाम में गुमनाम मरे लाखों क्रांतिकारियों और आन्दोलन कारियों के लिये भी तर्पण करता होगा?  क्या लोगों को अपने घरों में श्राद्ध कर्म करते समय इनके लिये भी तर्पण कराना चाहिये?

Manisha
हब्बल ने भेजी आकाशगंगा की तस्वीरें

नासा (NASA) ने हाल ही में वापस ठीक की गई अंतरिक्षीय दूरबीन हब्बल (Hubble)  द्वारा भेजी गई नई तस्वीरें जारी की हैं। इन तस्वीरों में हब्बल नें कुछ आकाशगंगाओं (Galaxies) को देखा है और उनकी फोटो खींची हैं।

ये देखिये तितली के आकार की आकाशगंगा
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दर की दो आकाशगंगायें मे तारों का जन्म हो रहा है
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आकाशगंगा के अनगिनत झिलमिलाते तारे
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तारों का आपस में विलय या टकराना
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एक आकाशगंगा का विहंगम दृश्य
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सभी चित्र नासा की हब्बल फोटो गैलरी से, आप पूरे चित्र वहां पर देख सकते हैं

Manisha शुक्रवार, 11 सितंबर 2009
ब्लॉग चलता है जज्बे और लगन से

हाल ही में कुछ सरकारी वेबसाइटों पर किसी विशेष जानकारी पाने के लिये जाना हुआ, लेकिन ये पाया कि वहां ब्लॉग   पर वांछित जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसा कई बार हुआ है कि सरकारी विभाग अखबारों में तो विज्ञापन छपवा देते हैं लेकिन उसी विभाग की वेबसाइट पर उस विषय के बारे में कुछ नहीं मिलता। अगर मिलता भी है तो 7-8-10 दिन बाद जाकर। ऐसा इसलिये होता है क्यों कि सरकारी विभागों में जनता को जानकारी देने का या विभागीय वेबसाइट को अपडेट करने का कोई जज्बा नहीं होता है, उनके लिये ये काम एक बोझा होती है जिसे उन्हें ढोना पड़ता है।

यही बात ब्लॉग पर लागू होती है। कोई भी ब्लॉग तब चलता है जब उसको चलाने के पीछे जज्बा होता है। दुनिया की सभी बडी बेबसाइट और ब्लॉगों के पीछे ऐसे लोग हैं जिनको उसको चलाने का जज्बा है, जिसको चलाने में उन्हें आनन्द आता है। कितने ही ब्लॉग लोग दूसरों की देखा-देखी या फिर ब्लॉग से पैसा कमाया जा सकता है ये सोच कर अपना भी ब्लॉग शुरू कर देते हैं। कुछ दिनों तक तो मामला चल जाता है फिर समझ में नही आता कि क्या करें? ब्लॉग तो आप किसी ऐसे विषय पर होना चाहिये जिसकी आपको जानकारी हो, जिसको लेकर आप उत्साहित हों, जिसकी जानकारी को आप दुनिया को बांटना चाहते हों। अगर आप बिना इन सब कारणों के ब्लॉग चलायेंगे तो फिर एक समय ऐसा आयेगा जब को समझ नहीं आयेगा कि अब क्या करें? कुछ लोग इधर इधर की साईट एवं ब्लॉगों से सामग्री चलाकर ब्लॉग चलाना चाहते हैं पर वो पढ़ने वालों को समझ में आने लगता है कि आपका माल दूसरों का है। जब आप में किसी बात ता जज्बा होगा तो आप का ब्लॉग खूद ब खुद ताजा जानकारियों से भरा रहेगा और पाठकों का भी भरोसा बना रहेगा। अत: ब्लॉग ऐसे चलाये कि आप अपनी बात रख सकें, अपने विषय की बात कर सकें, जज्बे से लिखिये फिर देखिये कैसे आपका ब्लॉग हिट होता है।

Manisha बुधवार, 9 सितंबर 2009
ब्लॉगिंग में आने वाली रुकावटें

ब्लॉगिग से संबंधित अपनी पिछली पोस्ट में मैने बताया था कि कैसे ब्लॉगिंग से परेशानियां और खतरे
हैं। आज मैं बताना चाहती हूं कि ब्लॉगिंग में कैसा-कैसी रुकावटें आती हैं।

  • कोई विषय न मिलना (Blogger’ block) :  कभी कभी ऐसा होता है कि आप चिठ्ठाकारी करते करते उब जाते हैं और आप को कोई नया विषय ही नहीं सूझता जिस पर आप लिख सकें। यह ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी समस्या है जिसको लेकर बहुत कुछ लिखा गया है।
  • आपके विषय पर किसी और का लिखा जाना :  यह तब होता है जब आप किसी विषय पर लिखने की सोच रहे होते है पता चलता है कि किसी अन्य चिठ्ठाकार ने उसी विषय पर बहुत ही अच्छा लिख मारा है तो आप का सारा उत्साह काफूर हो जाता है।
  • ऑफिस में लोगो द्वारा निगाह रखना  :  जो लोग अपने ऑफिस से छिप कर ब्लाग लिखते हैं उनको ये परेशानी रहती है किसा को पता न चल जाय या फिर कोई देख न ले या फिर किसी दिन कुछ अच्छा लिखने का मन है, विषय भी तैयार है पर उसी दिन ऑफिस में काम ज्यादा आ गया या फिर कोई आप से ऑफिस में मिलने आ गया या बॉस ने बुला लिया तो गई उस दिन की ब्लॉगिंग!
  • बिजली का जाना :  आप ब्लॉगिंग के लिये तैयार हैं, धांसू सा विषय भी सोच लिया लेकिन जैसे ही कंप्यूटर ऑन किया कि बिजली चली गई। दिल्ली, मंबई की बात अलग है, बाकी देश में कोई गारंटी नहीं है कि कब बिजली आयेगी। ऐसे में लैपटॉप से थोड़ा बहुत काम चल सकता है लेकिन पूरा नहीं।
  • इंटरनेट कनेक्शन डाउन होना : आप ने सब कुछ कर लिया। विषय चुन लिया, उस पर मैटर टाईप भा कर लिया कर लिया, और जैसे ही पोस्ट करने बैठे कि पता चला इंटरनेट कनेक्शन डाउन हो गया। अब भुनभुनाते रहिये। ये समस्या सबसे ज्यादा बीएसएनएल (BSNL)  के साथ आती है।
  • रिश्तेदारों का आना :  जैसे ही आप ब्लॉगिंग के लिये अपने आप को तैयार करते है कि पता चलता है पड़ोस के लोग या रिश्तेदार आपसे मिलने के लिये चले आये हैं और आपका पूरा समय सामाजिकता निभाने में ही चला जाता है।
  • बच्चों का लढियाना :  किसी किसी दिन बच्चे भी आपको दिन भर घेरे रहते हैं और आप ब्लॉगिंग नहीं कर पाते हैं। जिनके बच्चे छोटे हैं उनके साथ तो और भी ज्यादा परेशानी है।
  • कमाई न होना  :  ऐसा हिन्दी व अन्य भाषाओं के चिठ्ठाकारों के साथ ज्यादा होता है। अपने ब्लॉग से किसी भी प्रकार की कोई कमाई न होने से भी चिठ्ठाकार का उत्साह खत्म  हो जाता है और वो ब्लॉगिंग छोड़ देता है।
  • टिप्पणी न मिलना :  ये समस्या हिन्दी ब्लॉगिंग में कुछ ज्यादा है , यहां अगर किसी ब्लॉगर को प्रशंसा वाली टिप्पणियां न मिले तो उसको लगता है कि उसके लेखन किसी ने देखा ही नहीं और वो ब्लॉगिंग के प्रति निराश हो जाता है।
ब्लॉगिंग में और भी तमाम तरह का परेशानियां आती रहती हैं। लेकिन उत्साही चिठ्ठाकार फिर भी ब्लॉगिंग करते रहते हैं।

Manisha मंगलवार, 1 सितंबर 2009
सबको पप्पू बना रहा है पाकिस्तान

आज के समाचार पत्रों में न्यूयार्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के हवाले से ये खबर प्रकाशित की गई है कि पाकिस्तान ने अमेर्का को धोखे में रखकर अमेरिका से मिली हारपून मिसाइलों को अवैध तरीके से विकसित कर लिया है, हालांकि पाकिस्तान ने इस बात का खंडन किया है। लेकिन सबको पता है कि पाकिस्तान अमेरिका के आतंकवात विरोधी अभियान की आड़ में अमेरिका से खूब आर्थिक और हथियारों की मदद ले रहा है। अमेरिका की मजबूरी है कि उसे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की मदद चाहिये ही, और इसी बात को पाकिस्तान खूब समझता है। पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका से मिल रही सैन्य मदद का गलत इस्तेमाल कर अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है।  दिखाने के लिये पाकिस्तान अपने ही बनाये हुये तालीबान से लड़ रहा है और ऐसे दिखा रहा है कि तालीबान को कितना नुकसान हो चुका है। दरअसल पाकिस्तान को पता है कि एक न एक दिन अमेरिका अफगानिस्तान से जायेगा ही और तब तालीबान ही पाकिस्तान का भरोसे का साथी बनेगा और उसी के वेश में उस के सैनिक और तालीबानी अफगानिस्तान पर कब्जा कर लेंगे।  कुल मिलाकर आतंकवाद की लड़ाई में पाकिस्तान फायदे में नजर आ रह है और अमेरिका और भारत सहित सबको पप्पू बना कर अपना हित साध रहा है।

Manisha सोमवार, 31 अगस्त 2009
मोदी का नाम पतित पावन है

भारत की राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता में नरेन्द्र मोदी का नाम मोक्षदायिनी गंगा मां की तरह ही पतित पावन है। मोदी का नाम लेकर अच्छे-अच्छे रातों रात धर्मनिरपेक्ष हो जाते हैं। मोदी का नाम लेकर कल के कई सांप्रदायिक नेता रातों धर्मनिरपेक्ष साबित होकर धर्मनिरपेक्ष पार्टियों में शामिल हो जाते हैं। हाल ही में भाजपा से निकाले गये जसवंत सिंह ने अपनी बात रखने के लिये ही ये बताया कि वो बाजपेयी जी के साथ उस ससय थे जब बाजपेयी नरेन्द्र मोदी को गुजरात में हटाना चाहते थे। अरुण शौरी ने अपनी बात कहने के दौरान मोदी का नाम लिया और अब ये दोनो धर्मनिरपेक्षता मीडिया के प्रिय हो गये हैं। इससे पहले बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार भी लोकसभा चुनावों के दैरान चुनीवी मंच मोदी के साथ साझा करने को तैयार नही थे। बाद में भले ही मिल लिये। यानी कि नरेन्द्र मोदी  को गरियाते ही सब धर्मनिरपेक्ष बन जाते हैं। जसवंत सिंह लगातार मोदी का नाम लेकर कुछ-कुछ बयान दे रहे हैं और उन्हें इसका इनाम भी मिल रहा है। धर्मनिरपेक्षता की झंडेदार समाजवाजी पार्टी ने जसवंत सिंह को धर्मनिरपेक्ष मानकर पार्टी में शामिल होने को कहा है। सुधीन्द्र कुलकर्णी नें धर्मनिरपेक्ष तृणमूल कांग्रेस पकड़ ली है। इसलिये देश में धर्मनिरपेक्षता को साबित करने के लिये जिन्ना की तारीफ करने से ज्यादा अच्छा है मोदी का नाम लेकर कुछ भी बयान देना, आप रातों-रात धर्मनिरपेक्ष होकर छा जायेंगे। ऐसे में ये क्यों न कहा जाय कि मोदी का नाम पतित पावन है।

Manisha बुधवार, 26 अगस्त 2009
शुक्र मनाइये कि आप दिल्ली में नहीं रहते

कल शाम दिल्ली और आस-पास के इलाके में हुई 74 मिलीमीटर बारिश ने दिल्ली वालों jam-in-delhi को रुला दिया। जन मानस बारिश का बेसब्री से इंतजार करता है। कवियों नें और साहित्यकारों ने बारिश को लेकर अनेक रूमानी और मनोहर बाते लिखीं हैं. लेकिन कल शाम को हमने जो झेला वो इन सब से अलग था। कल शाम को हम लोग 5.30 बजे से लेकर रात 11 बजे तक जबर्दस्त जाम में फंसे रहे। एक जगह तो हम लोग साढ़े तीन घंटे तक फंसे रहे और एक इंच भी नहीं खिसके। इसी से आप अंदाज लगा सकते हैं किस कदर जाम था। आम तौर पर बारिश होने पर दिल्ली का सड़कों पर जाम लग जाता है और वाहन रेंगते हुये चलते हैं लेकिन कल तो सारे वाहन वहीं के वहीं फंस गये थे। दिल्ली और आसपास के इलाकों में रहने वालों को ये सब बाते रोज ही झेलनी पड़ती है। संसद के सत्र के दौरान राजनैतिक पार्टियों द्वारा किये जाने वाली रैलियों और धरनों से भी अक्सर जाम लगता है। गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस के अवसरों पर भी यही होता है। जो लोग छोटे और मंझोले शहरों में रहते हैं उन्हें शुक्र मनाना चाहिये कि वो दिल्ली में नहीं रहते और कम परेशानी में जिन्दगी बिताते हैं।

Manisha शनिवार, 22 अगस्त 2009
भारत के 20 वीं सदी के 10 महान नेता

भारत के 20 वीं सदी के 10 महान नेताओं की सूची



मैंने  अपनी समझ से पिछली बीसवीं सदी (20 वीं सदी) के 10 महान भारतीय नेताओं की एक सूची बनाई है जिनकी वजह से पिछली सदी में भारत के लागों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। कुछ नाम पर आप भी सहमत होंगे और कुछ पर आप असहमत। 10 महान नेताओं की यह सूची मैंने इन नेताओं के द्वारा भारत पर पड़ने वाले विभिन्न प्रकार के राजनैतिक, भौगोलिक व सामाजिक प्रभाव के आधार पर तैयार की है :
    1. महात्मा गांधी – 20 सदी के भारत के सबसे बडे नेता और भारत के राष्ट्रपिता। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के महान नायक
    2. जवाहरलाल नेहरु - स्वतंत्रता आन्दोलन के नेता और स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री
    3. सरदार वल्लभ भाई पटेल – लौह पुरूष जिन्होंने भारत में रियासतों का विलय करवाया । किसानों के लिये आन्दोलन किया।
    4. सूभाष चंद्र बोस - स्वतंत्रता आन्दोलन के सबसे ज्यादा सम्मानित नेता। आजाद हिंद फौज की गठन।
    5. बाल गंगाधर तिलक – बाल-पाल-लाल की तिकड़ी के महान नेता जिन्होंने गणेश जी की पूजा का महाराष्ट्र में आरम्भ किया
    6. लाला लाजपत राय – पंजाब के प्रसिद्ध नेता। अंग्रेजी की लाठी खाईं । पंजाब नैशनल बैंक की स्थापना की।
    7. भगत सिंह – महान क्रांतिकारी। हंसते-हंसते 31 मार्च 1931 को फांसी की सजा पाई और शहीदे-आजम कहलाये। इनकी शहादत का व्यापक असर पड़ा
    8. खान अब्दुल गफ्फार खां – पख्तून जैसी लड़ाकू जाति में भी गांधीवाद का प्रचार कर अहिंसा के रास्ते पर चलाया। महान गांधीवादी मुस्लिम नेता।
    9. मुहम्मद अली जिन्ना – पहले हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक और बाद में मुस्लिम सांप्रदायिकता के प्रतीक। भारत के विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण के लिये जिम्मेदार।
    10. इंदिरा गांधी – स्वतंत्र भारत की इकलौती महिला शक्तिशाली प्रधानमंत्री
20वीं बीसवीं सदी का भारत


20 वीं शताब्दी में भारत में अनेक महान नेता दिये हैं जिनको 10 की संख्या में समेटना मुश्किल है लेकिन फिर भी एक प्रयास किया जा सकता है।

Manisha गुरुवार, 20 अगस्त 2009
केवल किताब लिखने पर सजा?

भाजपा ने जसवंत सिहं को भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया है लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा क्यों किया गया है। यदि जिन्ना को लेकर किताब लिखने पर ही उJasvant-singhनको निकाला गया है तो ये निंदनीय है। आखिर लोकतंत्र में कोई अपनी बात कैसे नहीं लिख सकता और क्या कोई अपनी निजी बात नहीं रख सकता? आखिर जिन्ना के उपर किताब लिखने से भाजपा का क्या नुकसान हो रहा था? भाजपा जसवंत सिहं द्वारा लिखित किताब से अपने आप को दूर कर ही चुकी थी फिर बात अपने आप खत्म हो जाती, केवल किताब लिखने पर किसी को राजनैतिक पार्टी से निकालना तो बिलकुल गलत है।

 

जसवंत सिंह से मुझे अब हमदर्दी है हालांकि मैं तो उनकी आलोचक ही हूं। मैं तो जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा को लेकर कुछ लिखना चाहती थी कि कैसे इन लोगो ने भाजपा को कुछ देने के बजाय उसका नुकसान ही हमेशा किया है। अपने बूते पर ये लोग कोई भी चुनाव नहीं जीत सकते, किसी को जिताना तो दूर की बात है। ये लोग हमेशा पार्टी को ब्लैकमेल ही करते रहते हैं। हमेशा रूठे ही रहते हैं। जसवंत सिहं ने कंधार में जाकर अपने उपर, भाजपा के ऊपर और भारत के ऊपर ऐसा कलंक लगाया है वो कभी मिट नहीं सकता। इसी तरह यशवंत सिन्हा ने अपने वित्तमंत्री काल के दौरान लोगो को टैक्सों और ब्याज दरों मे कमी से रुलाया था। लेकिन केवल किताब लिखने पर इस तरह भाजपा से जसवंत सिंह का निष्कासन मेरे मन में उन के प्रति सहानुभूति जगा रहा है।

Manisha बुधवार, 19 अगस्त 2009
ब्लॉगवाणी में ये कैसे संभव होता है?

हिंदी चिठ्टों के एग्रीगेटर ब्लॉगवाणी का कल का एक चित्र देखिये कि बिना किसी पेज देखे ही पसंद संख्या 1 दिखा रहा है। आखिर ये कैसे संभव है?

HowitHappendinBlogvani

Manisha बुधवार, 12 अगस्त 2009
ब्लॉगिंग से परेशानियां और खतरे

Dangers-in-Blogging पिछले जून महीने में मुझे ब्लॉगिंग की दुनिया में 3 साल पूरे हो गये हैं। इस दौरान कई प्रकार के खट्टे मीठे अनुभव हुये हैं, जिनको मैं श्रंखलाबद्ध तरीके से प्रस्तुत करूंगी। जहां ब्लागिंग करने से कई फायदे हैं वहीं कुछ खतरे भी हैं। अगर कोई कभी-कभार अपने ब्लॉग में कुछ लिखता है तब तो ठीक है लेकिन अगर कोई प्रोफेशनल ब्लॉगर है और कई घंटे दिन के इंटरनेट पर गुजारता है तो कई ऐसी बाते हैं जिनका सामना चिठ्ठाकार को करना पड़ता है और कई प्रकार के ऐसे खतरे और परेशानियं आती हैं -
  1. इंटरनेट एडिक्शन – ये नये जमाने की बीमारी है जोकि अधिकांश ब्लॉगर को होती है, इसमें ब्लॉगर अपना अधिकांश समय इंटरनेट पर बिताता है। कभी मेल चेक करता है, कभी गूगल एडसेंस देखता है कभी अन्य ब्लॉग पढ़ता है और कभी टिप्पणियां करता है यानी अधिकांश समय इसी में चला जाता है।
  2. सामाजिकता से नाता टूटना – जब दिन भर कम्प्यूटर की आभासी दुनिया में रहेंगे तो आस-पास की वास्तविक दुनिया से नाता कम होने लगता है। एक प्रोफेशनल ब्लॉगर का सामाजिक मिलना-जुलना कम हो जाता है।
  3. वजन बढ़ना – कई घंटे बैठे रहने के कारण वजन बढ़ने लगता है। ऐसा मेरे साथ भी हुआ है।
  4. बीमारियां – कई नामी ब्लॉगर इस बारे में पहले ही संकेत कर चुके हैं कि वजन बढ़ने से उच्च रक्तचाप और हार्ट अटैक की शिकायत कई अच्छे प्रसिद्ध प्रोफेशनल ब्लॉगरों को हो चुकी है और सभी नें इससे बचने की सलाह दी है। स्पोंडिलाईटिस, कमर के दर्द की परेशानी भी आम समस्या है।
  5. अदालती और कानूनी झंझट – हिंदी ब्लागिंग मे तो यह अभी नहीं हुआ है लेकिन अन्य भाषाओं के चिठ्ठों मे ये हो चुका है। हालांकि हिंदी में भी पंगेबाज जी के साथ अदालती कार्यवाही की धमकी दी गई थी जिसके बाद उन्होंने अपना चिठ्ठा बंद कर दिया था। अत: इस प्रकार की परेशानियां भी आ सकती हैं।
  6. लेख चोरी होना - इसके अलावा चिठ्ठों के लेखों को चुराकर अपने ब्लॉ ग पर लगाने की परेशानी तो लगभग हर ब्लॉगर को झेलनी पड़ती है जिससे मानसिक रिप से परेशान होना पड़ता है।
यह आवश्यक है कि सभी चिठ्ठाकार लोग व्यायाम को अत्यंत ही महत्वपूर्ण समझें और ब्लागिंग से होने वाली परेशानियो और खतरों से अपने आप को बचायें।

Manisha मंगलवार, 11 अगस्त 2009
इंटरनेट पर क्रेडिट कार्ड को पासवर्ड चाहिये

भारतीय रिजर्व बैक के आदेश के अनुसार कल से इंटरनेट पर क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करते समय पासवर्ड चाहिये होग जो कि कार्ड नंबर, कार्ड का आखिरी तारीख और सावीसी2 (CVC2) के अलावा होगा। ये एक अच्छा कदम है जिससे इंटरनेट पर चोरी के क्रेडिट कार्ड का प्रयोग करने पर रोक लगेगी। लोकिन इसके साथ-साथ दुकानों में क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल में भी कोई ऐसा ही पासवर्ड का प्रयोग अनिवार्य करना चाहिये क्योंकि क्रेडिट कार्ड का अधिकांश अनधिकृत प्रयोग दुकानों में जैसे कि ज्वेलरी या मोबाईल की दुकानों में ज्यादा होता है। वैसे भी ये समझ में न आने वाली बात है कि अपना पैसा एटीएम से निकालने के लिये हमें पिन का इस्तेमाल करना पड़ता है लेकिन अगर कोई हमारा क्रेडिट कार्ड चुरा ले तो वो बिना किसी पिन नंबर के लाखों रुपये की खरीदारी कर सकता है और बिल हमारे नाम पर।
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Manisha शुक्रवार, 31 जुलाई 2009
स्टार प्लस का ट्रंप कार्ड – सच का सामना

Sach-Ka-Samna सच का सामना रियलिटी शो के रुप में स्टार प्लस के हाथ एक बड़ा ट्रंप कार्ड लग गया है। पिछले कुछ समय से स्टार प्लस की पहले नंबर की पोजीशन को केवल आठ महाने पुराने मनोरंजन चैनल कलर ने  छीन लिया था और तभी से स्टार प्लस वापस अपनी इस स्थ्ति को हथियाने के लिये बेताब था। इस समय सच का सामना ने एक प्रकार का मौका स्टार प्लस को दे दिया है।  सच का सामना शायद इतना प्रसिद्ध होते लेकिन उस से विवादों के जुड़ जाने से बहुत फायदा मिला है। मुझे तो लगता हे कि पहले स्थान को पाने के लिये ही स्टार प्लस जानबूझ कर विवादों को हवा दे रहा है ताकि लोग जिज्ञासावश सच का सामना को देखें और स्टार प्लस को अच्छी टीआरपी मिल सके।

Manisha सोमवार, 27 जुलाई 2009
परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत भारतीय नौसेना में शामिल

अपने ही देश में ही बनी पहली परमाणु संपन्न पनडुब्बी 'आईएनएस अरिहंत' भारतीय नौसेना में शामिल हो गई है। भारत अब स्वनिर्मित परमाणु संपन्न पनडुब्बी वाले गिने चुने देशों की कतार में शामिल हो गया।

अरिहंत पनडुब्बी 'सागरिका' [के 15] प्रक्षेपास्त्र से लैस होगी, जिसकी मारक क्षमता 700 किलोमीटर है। अरिहंत का मुख्य हथियार इसकी मारक क्षमता है। यह समुद्र में आधे किलोमीटर की गहराई या उससे अधिक में रहकर समुद्र के भीतर से मिसाइल दागने में सक्षम है। छह हजार टन की पनडुब्बी में 85 मैगावाट क्षमता का परमाणु रिएक्टर है और इसकी सतह पर गति 12 से 15 नोट्स तथा पानी में गति 24 नोट्स तक जा सकती है। इस पनडुब्बी में 95 लोग सवार होंगे तथा यह तारपीडो और 12 बैलेस्टिक मिसाइलों समेत अन्य मिसाइलों से लैस होगी।

यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने के लिए कार्यक्रम से जुड़े हरेक व्यक्ति को बधाई और इसके कुशल चालन के लिये शुभकामना ।

Manisha रविवार, 26 जुलाई 2009
कारगिल लड़ाई के 10 वर्ष : हमें चाहिये मुशर्रफ जैसे लीडर

आज पाकिस्तान द्वारा भारत पर थोपे गये कारगिल की लड़ाई की 10वीं वर्षगांठ है। अमर शहीद सैनिकों और उनके अफसरों की बहादुरी और कुशलता और शहादत को भल कौन भारतीय भुला सकता है? कैप्टन सौरभ कालिया, कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन विजय थापर, कर्नल वांगचुक, मेजर बलवंत सिंह, हवलदार योगेंद्र सिंह यादव, तोपखाने के कई कई वीर सपूतों ने अपनी जान देकर भारत का मान रखा। बिलकुल सीधी चढ़ाई चढ़ते हुये दुश्मन का मुकाबला विरले वीर, साहसी और जीवट के पक्के सैनिक ही कर सकते हैं। और इस तरह की लड़ाई को जीतना वास्तव में एक अनोखी गौरव गाथा है। कारगिल में वीरता की इतनी कहानियां लिख गईं हैं जो सदियों तक कही जाती रहेंगी। General Musharrafलेकिन सैनिकों के इस वीरता पूर्वक कारनामे को नमन करने के वावजूद उस समय के खलनायक मुशर्रफ को एक दूसरी ही वजह से याद कर रही हूं। पहली वजह से तो वो पिटने लायक है  और भर्त्सना के लायक है। लेकिन दूसरी वजह है उसका चाणक्य की नीतियो पर चलते हुये जबर्दस्त रणनीतिकार होना। आखिर ये उसी के दिमाग की उपज थी कि भारत की सोती हुई सेना को पता ही नहीं चला कि उनकी खाली की हुई चौकियों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों (छद्म सैनिक) ने कब्जा कर लिया और जो लड़ाई हुई उसमें भारत के वीर जवाव तो हताहत हुये ही, भारत की रक्षा तैयारियों का भी जायजा लिया गया, कश्मीर समस्या पर दुनिया का ध्यान भी खींच लिया और साथ ही पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को भी फंसा दिया। यानी की एक तीर से कई शिकार। मुशर्रफ और वहां की सेना चाणक्य की नीतियों पर चल कर गुप्त और छद्म गतिविधियां करके अपने दुश्मन (भारत) तो हमेशा परेशान करते रहते हैं और भारत को कभी चैन से नहीं बैठने देते हैं। क्या हमें ऐसा नेता नहीं चाहिये जो इस तरह से अपने दुश्मनों के परेशान करता रहे? क्या हमें ऐसे लीडर नहीं चाहिये जो रणनीतिक तौर पर दूर की सोंचे और कार्यवाही करें। अभी हाल ही में चीन के एक प्रंत में दंगा हो गया तो वहां के राष्ट्रपति ने तुरंत चेतावनी दे दी कि कोई दखलंदाजी न करे वर्ना अच्छा नहीं होग, तो क्या हमें ऐसे नेता नहीं चाहिये जो दुनिया में आंखों में आंखे डाल कर अपनी बात कह सकें? यहां तो हलत ये है कि इन्ही मुशर्रफ साहब को एक नेता ने अपने यहां बिना बात के न्यौत लिया और एक नेता ने लिखित में मान लिया कि भारत बलूचिस्तान में गड़बड़ियों मे शामिल है। आखिरी बार इस तरह की कुछ खूबियों वाला लीडर इंदिरा गांधी के रूप में जरुर मिला था। वैसे भारत को प्रभावशाली नेता काफी लंबे समय से नहीं मिले हैं। याद कीजिये कृष्ण, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त, अशोक, शेरशाह सूरी, अकबर जैसे कितने नाम हैं भारत में जो गिने जा सकते हैं। हम भारतीय सब प्रकार से सक्षम हैं, सबसे अच्छे हैं बस अच्छे नेतृत्व से वंचित हैं।

आज भी कारगिल की दसवीं वर्षगांठ पर नेता गायब हैं।

Manisha
भारत आतंकवाद फैला रहा है

भारत की जनता चाहे कितना भी पाकिस्तान को नापसंद करे, कितनी ही कड़ी कार्यवाही पाकिस्तान के खिलाफ चाहे, पाकिस्तान चाहे कितना ही भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाता रहे, भारत के हर पार्टी के नेता (पार्टी विद डिफरेंस के भी!), मीडिया का एक सशक्त वर्ग तथा कुछ बुद्धीजीवियों को  पाकिस्तान से विशेष प्रेम है। अब इसका नया उदाहरण है भारत द्वारा बकायदा लिखित समझौते में ये स्वीकरना की भारत पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हो रही गड़बड़ियों के लिये जिम्मेदार है। भारत के नेता हमेशा नोबेल शांति पुरस्कार पाने के लिये कुछ न कुछ उपाय करते रहते हैं और समझौते की मेज पर भारत के हितो को दांव पर लगाते रहते हैं। 60 साल से भारत पाकिस्तान से परेशान है। 25 साल से भारत पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद झेल रहा है, सबको पता है लेकिन पाकिस्तान ने कभी नहीं स्वीकारा कि वो ऐसा कर रहा है, लेकिन हमारे महान देश ने लिखित में मान लिया कि भारत पाकिस्तान के बलूचिस्तान नें आतंकवाद फैला रहा है। बस अब तैयार रहिये वहां पर कुछ भी घटना होने पर पाकिस्तान सीधे-सीधे भारत का नाम लेगा और हम दुनिया में आतंकवाद फैलाने वाले माने जायेंगे।
भारत आतंकवाद

Manisha शुक्रवार, 24 जुलाई 2009
हमारे – उनके विश्वास और अंधविश्वास

21 जुलाई को चांद पर मानव के कदम रखने के 40 साल पूरे होने जा रहे हैं। दुनिया भर में इस अद्भुत घटना को याद किया जा रह है। चांद पर पहुंच कर धरता के लोगों मे अपनी मनवीय श्रेश्ठता का परिचय दिया था लेकिन कई लोगों को ये विश्वास कभी नहीं हुआ कि इंसान चांद पर पहुंच गया है। अमेरिका के ही कई लोग ऐसे थे जो इस बात पर विश्वास नहीं करते थे। कई लोगो ने ये प्रमाणित करने के लिये किताबें लिख डाली कि कोई चांद पर नहीं गया था बल्कि वहां की फोटो नकली हैं। घूम-फिर कर कई ईमेल मेरे पास भी आये हैं जिसमें ये दिखाया गया है कि कैसे अमेरिका का झंड़ लहरा रहा है जबकि चांद पर तो हवा नहीं है, या फिर की की यात्रियों की परछांई गलत दिशा में आ रही है इत्यादि। अपने देश में भा कई लोग है जिन्हें इस बात पर कभी विश्वास नहीं हुआ। मेरी दादीजी कहती थी किम चांद पर कोई नहीं गया, वहां इंसान जायेगा को प्रलय आ जायेगी। लेकिन मुझे विश्वास है कि इंसान चांद पर गया था।

विश्वास
इसी तरह की कई बाते दुनिया भर के लोगों में चलती रहती हैं। मुस्लिम जगत के अधिकांश लोग  आज तक 9/11 की घटना को अमेरिकी की साजिश मानते हैं। पाकिसेतान के लोग 26/11  की घटना को भारत और अमेरिका तथा इस्राइल द्वारा प्रायोजुत मानते हैं। भारत के लोग पाकिस्तान के किसी भी आश्वासन कर विश्वास नहीं कते हैं।

हमारे देश में भी कई इसी प्रकार की बातें हैं। कई लोग ताजमहल को विष्णु मंदिर मान कर प्रमाण जुचाते रहते हैं। कुतुब मीनार में भी कई लोग ऐसे ही प्रमाण खोजते है। पहले भारत में कोई भी घटना घटने पर लोग केवल बीबीसी से प्रसारित खबरों पर ही विश्वास करते थे। भारत के अधिकांश लोग आज भी किसी घटना में मारे गये लोगों की सरकार द्वारा बताई गई संख्या पर विश्वास  नहीं करते हैं और उसस् बढ़-चढ़ कर आने वाली संख्या की अफवाहों पर विश्वास करते हैं।  कई लोगो को ज्योतिष पर पूरा विश्वास है कई लोग उसका मजाक बनाते हैं। लोगों को नेताओं के भ्रष्ट होने का पूरा भरोसा है जबकि सारे नेता ऐसे नहीं होते हैं।

कहने के मतलब हे कि कुछ लोग हमेशा ऐसे रहेंगे जो कि किसी बात पर विश्वास पर भरोसा न करके अपनी ही दुनिया में रह कर कुछ बातों को मानते रहते हैं। 

लगे हाथों में ये भी बता दूं कि मुझे भगवान के होने  और भूतों  के न होने पर पूरा विश्वास है।

अपने विश्वासों को भी आप यहां बताईये।

Manisha सोमवार, 20 जुलाई 2009
बलजीत के लिये दुआ कीजिये

हम सब के लिये भारतीय हॉकी टीम के बेहतरीन गोलकीपर बलजीत सिहं के लिये ये दुआ करने का समय है। बलजीत को अभ्यास के दौरान आंख में गेंद लग गई थी जिससे उन्हें दाहिनी आंख में गंभीर चोट लग गई है और उनके दोबारा खेलने की संभावना कम है। बेहतरीन गोलकीपर बलजीत सिहं को खोना हमारी हॉकी और देश के लिये काफी बड़ा झटका रहेगा लिहाजा हम लोगों की दुआ से भगवान उनको वापस खेलने लायक बनायें, ऐसी हम सब को भगवान से प्रार्थना करनी चाहिये।

Manisha
आखिर किस बात की खुशी है इन्हें?

न्यायालय द्वारा सबूतों के अभाव में उज्जैन के प्रोफेसर सबरवाल के हत्यारों को छोड़ने के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा देखिये किस प्रकार से प्रसन्नता व्यक्त की जा रही है। आखिर किस बात की खुशी है इन्हें? क्या अपने गुरु के मारे जाने की (अभी गुरु पूर्णिमा को गुजरे कुछ ही दिन हुये हैं) या उनके हत्यारों के छूट जाने की? क्या ये हमारी हिंदु संस्कृति है? हिदूवादियों के गिरावट का इससे कोई निकृष्ट उदाहरण हो सकता है क्या?
New-Low-In-Hindu-Politics

Manisha मंगलवार, 14 जुलाई 2009
अब तो कुछ करो पत्रकारों

आज छत्तीसगढ़ के जिला राजनांदगांव के मदनवाड़ा इलाके मे नक्सलियों ने पुलिस पार्टी पर हमला करके  30 पुलिस वालों को मार डाला है और अभी प्राप्त समाचार के अनुसार एक और हमला करके 8 और पुलिस वालों को मार डाला है। इसमें एक एसपी भी हैं। हर 15-20 दिन में इस प्रकार का समाचार मिलता है जिमसें हमें देश के पुलिस वालों की जान बड़ी संख्या में नक्सलियों द्वारा लिये जाने के समाचार प्राप्त होते रहते है।  नक्सली पुलिस वालों को शहीद किये जा रहे हैं और हमारा दिल्ली का राष्ट्रीय माडिया नक्सलियों  तालीबान और गे – समलैंगिकों के समाचारो को अहमियत दे रहा है। अरे पत्रकारों तालीबान ने भी इतने पुलिस वालो की हत्या नहीं की होगी जितनी नक्सलियों ने की है। आखिर कब इन पुलिस वालों के उपर कार्यक्रम बनाओगे और अपनी जिम्मेदारी निभाओगे? छोड़ों तालीबान और समलैगिकों को। लगातार खबरें दिखा कर सरकार पर दबाव डालो कि वो कुछ करे। क्या नक्सलवाद की समस्या समलैगिको की समस्या सै ज्यादा बड़ी है? अब तो कुछ करो पत्रकारों!!!!

बहरहाल शहीद पुलिस वालों को मेरा सलाम और उनसे निवेदन की वो खुद ही कुछ करें यहां की सरकार और मीडिया आपकी चिन्ता करने वाले नहीं है।

Manisha सोमवार, 13 जुलाई 2009
शराब अमृत पीकर मरते लोग

Sharab Wineआज गुजरात के अहमदाबाद में जहरीली शराब पीकर जान गंवाने वालों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। प्रशासन ने  अब तक 86 लोगों की मौत की पुष्टि कर दी है। लेकिन, यह आंकड़ा 100 के पार पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। इससे पहले कुछ दिन पूर्व में ये किस्सा दिल्ली में हुआ था। मैं तो बचपन से अखबारों में इस तरह के समाचार रह रह कर पढ़ती आ रही हूं। हर बार यही होता है कुछ लोग शराब पीकर मर जाते हैं, हल्ला मचता है, कुछ गिरफ्तारियां होती हैं, कोई जांच आयोग बैठता है, मामला ठंडा पड़ जाता है और फिर किसी अन्य राज्य में इस तरह की घटना की खबर आ जाती है। दर्सल इस तरह की घटनायें सरकारों द्वारा नहीं रोकी जा सकती हैं ल रोकी जा रही हैं। सरकारें, नेता और अधिकारी तो अवैध शराब के खेल में शामिल हैं। इसको केवल समाज ही रोक सकता है, लोग खुद रोक सकते हैं। शराब सरकारों के लिये सोने की खान है। लोग शराब पीते है, सरकारें राजस्व कमाती हैं। इसलिय शराब ज्यादा बिके इसके लिये प्रयास किये जाते हैं। शराब का महिमांडन किया जा रहा है। शराब पार्टियों मे अनिवार्य है ऐसा माहौल बन चुका है। अब शराब न पीने वाले अल्पसंख्यक हो चुके हैं। शराब न पीने वालों का मजाक उड़ाया जाता है। शराब अमृत मान ली गई जिसको पीना अनिवार्य है। शराब की खराबियों को बताने वाला कोई नहीं है। शराब हर प्रकार के माहौल के लिये हैं। कोई भी घटना हो इसके पीछे शराब है, लेकिन ये बात न बताकर घटना के बारे मं बात की जाती है। ऐसे लोग अगर खुद ही संयम रख कर शराब से बचें तो ठीक वर्ना इस शराब रुपी अमृत से बचना मुश्किल है और लोगों के इसी तरह अलग-अलग राज्यों से मरने की खबरें आती रहेंगी। आज शराब अमृत मानी जाती है, जिसे सब पीना चाहते हैं।

Manisha गुरुवार, 9 जुलाई 2009