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Door Step Banking


डोरस्टेप बैंकिंग क्या है? डोरस्टेप बैंकिंग में आप का बैेक आप के घर पर आकर आपको आपके द्वार पर ही बहुत सारी बैंकिंग सुविधायें प्रदान करता है। 


डोरस्टेप बैंकिंग क्या है?


देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 9 सितंबर, 2020 को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (Public Sector Banks - PSB) द्वारा डोरस्टेप बैंकिंग सेवाओं का शुभारंभ किया है। इस सेवा का उद्देश्य ग्राहकों को उनके डोरस्टेप (द्वार) पर बैंकिंग सेवाओं की सुविधा प्रदान करना है।

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी करके यह कहा है कि EASE (Enhanced Access and Service Excellence) रिफॉर्म्स के एक हिस्से के तौर पर, कॉल सेंटर, वेब पोर्टल या मोबाइल ऐप के सार्वभौमिक टच पॉइंट्स के माध्यम से ग्राहकों को उनके दरवाजे पर बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने के लिए इन डोरस्टेप बैंकिंग सेवाओं की परिकल्पना की गई है।

भारत के लगभग 100 शहरों में घर घर बैंकिंग की इस सुविधा के लिये डोरस्टेप बैंकिंग ऐजेन्ट आपको वित्तीय और गैर-वित्तीय सेवायें प्रदान करेंगे।

अगर आप निजी क्षेत्र के बैंकों के भी ग्राहक हैं तो आप जानते होंगे कि ये बैंक पहले से भी घर-घर बैंकिंग की सुविधायें दे रहे हैं। सरकारी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देर से ही सही पर अब नींद से जागे हैं तो हमें इसका स्वागत करना चाहिये।

देखने वाली बात सिर्फ ये ही होगी कि कितनी अच्छी और कब तक ये लोग ग्राहक को डोरस्टेप बैंकिंग की सेवाओं का लाभ दे पाते हैं। हम लोग सरकारी क्षेत्र के बैंकों के कर्मचारियों के रवैये से परिचित तो हैं ही।

अच्छा होता यदि इस योजना का नामकरण हिंदी में किया जाता। खैर, भारत में अंग्रेजी में सोचने वालो नौकरशाहों से इतनी उम्मीद रखना ही बेमानी है।


डोरस्टेप बैंकिंग सेवा कौन देगा?


भारत के सभी 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के गठबंधन और इसके साथ ही साथ भारत सरकार के डाक विभाग के इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक द्वारा ये डोरस्टेप बैंकिंग की शुरुआत की गई है। इन बैंकों के नाम ये हैं -
  • बैंक ऑफ बड़ौदा
  • बैंक ऑफ इंडिया
  • बैंक ऑफ महाराष्ट्र
  • केनरा बैंक
  • सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया
  • इंडियन बैंक
  • इंडियन ओवरसीज बैंक
  • पंजाब नेशनल बैंक
  • पंजाब और सिंध बैंक
  • भारतीय स्टेट बैंक
  • यूको बैंक
  • यूनियन बैंक
  • इसके अलावा - इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक


डोरस्टेप बैंकिंग से क्या सुविधायें मिलती हैं?


डोरस्टेप बैंकिंग में आप का बैंक आप के घर पर आकर आपको ये सारी सुविधायें अभी प्रदान कर रहे हैं। इस योजना के माध्यम से भारत के 100 शहरों में बैंकों के अधिकृत एजेन्ट आपको वित्तीय और गैर वित्तीय सेवायें देंगे। अक्दूबर 2020 माह से आपसे नकद रूपये लेकर बैंक में जमा करना या फिर बैंक से लाकर नकद देने की सुविधा भी शुरू कर दी गई है।

अभी दी जाने वाली गैर वित्तीय बैंकिंग सुविधायें ये हैं -
  • वर्तमान में ग्राहकों के लिए केवल जो सुविधायें उपलब्‍ध कराई गई हैं उनमें
    • नेगोशिएबल इंस्‍ट्रूमेंट्स (चेक/ डिमांड ड्राफ्ट/ पे ऑर्डर आदि) को उठाना
    • नई चेक बुक के लिए पर्ची हासिल करना
    • 15जी/ 15एच फॉर्म को उठाना
    • आईटी/ जीएसटी चालान को उठाना
    • स्‍टैंडिंग इंस्‍ट्रक्‍शन के लिए अनुरोध
    • खाता विवरण के लिए अनुरोध
    • गैर-व्यक्तिगत चेक बुक की डिलिवरी
    • डिमांड ड्राफ्ट, पे ऑर्डर, टर्म डिपॉजिट रसीद, पावती आदि की डिलिवरी
    • जारी किए गए टीडीएस/ फॉर्म 16 सर्टिफिकेट की डिलिवरी
    • प्री-पेड इंस्ट्रूमेंट/ गिफ्ट कार्ड की डिलिवरी आदि शामिल हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के ग्राहक मामूली शुल्‍क पर इन सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं।

इन सेवाओं से सभी ग्राहकों, विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगों को लाभ होगा। उन्हें इन सेवाओं का लाभ उठाने में काफी आसानी होगी।


डोरस्टेप बैंकिंग के लिये कहां संपर्क करें?


यूं तो आमतौर पर डोरस्टेप बैंकिंग की सेवाओं का लाभ उठाने के लिये पर आपको अपने सरकारी बैंक की शाखा में ही संपर्क करना चाहिये।

पर डोरस्टेप बैंकिंग की और अधिक जानकारी के लिये आपको डोरस्टेप बैंकिंग की अधिकृत वेबसाइट पर जाना चाहिये, जहां पर आपको सब प्रकार की जानकारी मिलेगी और सहायता भी मिलेगी। इस वेबसाइट पर आपको सब प्रकार के प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं और आपके क्षेत्र में कौन कौन से डोरस्टेप बैंकिंग सेवा प्रदाता हैं ये भी मिलेगा।

तो देर किस बात की है? सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की इस नई पहल का स्वागत करिये और डोरस्टेप बैंकिंग की सेवा का लाभ भी उठाईये।

Manisha रविवार, 20 सितंबर 2020

बाढ़ आपदा प्रबंधन पर कैसे ध्यान दें और क्या करें? 


आजकल भारत में मानसून की बारिश का मौसम है। भारत के मौसम विभाग ने अप्रैल माह में ही बताया था कि भारत में इस बार अच्छी बारिश होगी। ऐसे में स्वाभाविक है कि इस समय वर्षा होगी कहीं कम और कहीं ज्यादा।

जहां ज्यादा बारिश होगी वहां बाढ़ का भी खतरा रहेगा। इस बाढ़ को लेकर हम हर साल समाचार पत्रों में और टीवी पर देखते रहते हैं। ये बाढ़ लोगों की जान और माल को भारी नुकसान पहुंचाती है। ऐसी खबरों को हर साल देख कर मन में ख्याल आता है कि शायद बाढ़ प्रबंधन पर कोई भी ध्यान नहीं दे रहा है। तो हमें बाढ़ आपदा प्रबंधन पर कैसे ध्यान देना चाहिये और क्या करें?

Flood Management
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बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र


इस समय भारत में बिहार, असम, अरुणाचल प्रदेश एवं उत्तर-पूर्व के कई क्षेत्रों में बिहार की बयावह स्थिति है। इसी बाढ़ के बीच मानसून की वजह से और रोजाना होने वाली और बारिश भी प्रशासन के सामने चुनौती बनी हुई है। भारी बारिश से देश के कई अन्य इलाकों भी में हाल खराब है।

मुंबई, दिल्ली, गुजरात, राजस्थान के कई इलाकों में भी बारिश होने से पानी भरने से कई जगहों पर बाढ़ आई हुई है।

ऐसे में मौसम विभाग द्वारा काफी इलाकों में भारी से भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। इससे हालात और खराब होने की संभावना है।

वर्तमान में भारत के कई क्षेत्रों के बारे में लगभग पहले से ही पता होता है कि बरसात के मौसम में थोड़ी सी ठीक बारिश होने पर बाढ़ आ सकती है। अब तो हालत ये हो गई है बाढ़ आपदा प्रबंधन न होने की वजह से बड़े बड़े शहरो जैसे कि चेन्नई, मुंबई, अहमदाबाद, श्रीनगर कहीं भी अचानक बाढ़ आ जाती है और जान माल का भारी नुकसान होता है।

भारत में प्रमुख बाढ़ क्षेत्रों में गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना और बिहार में नेपाल से लगता हुआ क्षेत्र जिसमें कोसी नदी का डूब क्षेत्र शामिल है। देश में नदियों के बहाव से आने वाली कुल बाढ़ का करीब 60 प्रतिशत इसी क्षेत्र में आती है।

देश के बाढ़ की सर्वाधिक आशंका वाले क्षेत्रों में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के हिमालयी नदियों के थाले में आने वाले क्षेत्र शामिल हैं। जम्मू कश्मीर, पंजाब के कुछ हिस्से, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश को कवर करने वाले कुछ उत्तर-पश्चिमी नदी थालों में भी बाढ़ की आशंका रहती है। झेलम, सतलुज, व्यास, रावी और चेनाब मुख्य नदियां हैं जो इस क्षेत्र में बाढ़ का कारण बनती हैं।

मध्य प्रदेश, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र मध्यवर्ती एवं प्राय:द्वीपीय नदी थालों के अंतर्गत आते हैं, जहां नर्मदा, ताप्ती, चम्बल और महानदी जैसी नदियां बाढ़ लेकर आती हैं। गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार और कावेरी में भी भारी बाढ़ आने से विस्तृत भूभाग जलमग्न हो जाते हैं और बाढ़ की समस्या आमतौर पर गंभीर होती है।
राष्ट्रीय बाढ़ आयोग द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार देश में करीब चार करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी है, जिसमें बाढ़ की आशंका रहती है। औसतन हर वर्ष करीब 80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वार्षिक बाढ़ आती है, जिससे करीब 37 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित होता है।

एक अनुमान के अनुसार, देश में 60 प्रतिशत से अधिक नुकसान नदियों में आने वाली बाढ़ के कारण होता है। 40 प्रतिशत क्षति भारी वर्षा और तूफानों के कारण होती है। हिमालयी नदियां देश में होने वाले कुल नुकसान में करीब 60 प्रतिशत योगदान करती हैं।

प्रायद्वीपीय नदी थालों में अधिकतर क्षति चक्रवातों के कारण और हिमालयी नदियों में करीब 66 प्रतिशत नुकसान बाढ़ से और 34 प्रतिशत भारी वर्षा के कारण होता है। राज्यवार अध्ययन से पता चलता है कि देश में बाढ़ से करीब 27 प्रतिशत क्षति बिहार में, 33 प्रतिशत उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड मेें तथा 15 प्रतिशत पंजाब और हरियाणा में होती है।

भारत में अधिकतर बाढ़ भारी वर्षा या पर्वतीय और नदी धारा क्षेत्रों में बादल फटने के कारण आती है। एक दिन में करीब 15 सेंटीमीटर वर्षा होने पर नदियां उफनने लगती हैं। यह धारणा पश्चिमी घाटों के पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्रों, असम और उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और भारत के गंगा के मैदानों को प्रभावित करती है।

क्या बाढ़ का कारण बारिश है?


भारत में आने वाली विभिन्न आपदाओं में बाढ़ सर्वाधिक सामान्य है और इसके संकट बार बार आते रहते हैं। परंपरागत दृष्टि से यह कहा जाता है कि बाढ़ आने के लिए भारी वर्षा जिम्मेदार है।

यह बात भारत के संदर्भ में विशेष रूप से लागू होती है जहां कृषि क्षेत्र के लिए मानसून अनिवार्य है। यह सार्वभौमिक सत्य है कि बाढ़ भारी वर्षा के कारण आती है, जबकि समूचे वर्षा जल को धारण करने की प्राकृतिक जलमार्गों की क्षमता से अधिक जल गिरता है।

परंतु, कुछ अन्य तथ्य भी हैं, जो यह सुझाव देते हैं कि बाढ़ हमेशा भारी वर्षा से ही नहीं आती है। हाल ही में यह नई और गंभीर आयाम वाली धारणा सामने आई है कि बाढ़ में मानव का भी योगदान है, जो मानव निर्मित आपदा में परिणत होता है।

इस तरह बाढ़ के दो पहलू हैं - प्राकृतिक और मानव निर्मित। मानव निर्मित घटक अत्यंत खतरनाक है जो प्राकृतिक घटकों के साथ मिल कर प्राकृतिक आपदा को अधिक घातक आयाम प्रदान करता है।

बाढ़ का कारण बनने वाले अप्राकृतिक घटकों में धरती का तापमान बढऩा, पर्यावरणीय ह्रास, नगरीय और खेती संबंधी उपयुक्त योजना का अभाव, उपलब्ध जमीन के प्रत्येक इंच पर अमीर होने का लालच, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में, जो वर्षा ऋतु के दौरान जल निकासी का मार्ग प्रदान करते हैं, आदि प्रमुख हैं।

अन्य अप्राकृतिक घटकों में तूफान या उष्णकटिबंधीय चक्रवात, सुनामी या सामान्य नदी स्तरों से ऊंची लहरें उठना शामिल हैं, जिनके कारण मुख्य रूप से तटवर्ती क्षेत्रों में भारी मात्रा में पानी जमा हो जाता है और व्यापक क्षेत्र डूब जाते हैं।

बांधों को क्षति पहुंचाने वाले भूकंप, खुश्क मौसम के दौरान भी, निम्नवर्ती धारा क्षेत्र में बाढ़ का कारण बन सकते हैं। लेकिन यह कोई नियमित घटना नहीं है और कभी-कभार ऐसा हो जाता है।

इधर हाल में मौसम वैज्ञानिकों को मानसून की पद्धति में अनियमितता का आभास हुआ है, जिसे देखते हुए यह आपदा घटक और भी चिंताजनक हो गया है।

वर्षा का मौसम तीन से चार महीने की अल्पावधि में अधिक संकेंद्रित रहता है, जिससे इन महीनों में नदियों में विनाशकारी बाढ़ आती है। कई बार देखा गया है कि पूरे महीने की बारिश उस क्षेत्र में 1-2-3 दिन में ही लगातार गिर जाती है, इससे क्षेत्र विशेष का बारिश का औसत तो बना रहता है लेकिन खूब सारी बारिश एक साथ होने से वहां पर बाढ़ आपदा का खतरा बन जाता है।

एक नया आयाम और भी है, जो पिछले कुछ वर्षों से दिखाई दे रहा है, कि बेमौसम की बरसातें होती हैं और यहां तक कि मॉनसून की जो परंपरागत अवधि है, उसमें भी बदलाव दिखाई देता

बाढ़ में योगदान करने वाले अन्य घटकों में नदी तल में वृद्धि, जो गाद और रेत जमने के कारण होती है, शामिल हैं, क्योंकि बरसों तक नदियों की सफाई के लिए कोई अभियान नहीं चलाया जाता है।

हिमालयी नदियां अपने साथ भारी सामग्री लेकर चलती हैं, जिसमें गाद और रेत की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो अंतत: निचले जलग्रहण क्षेत्रों में जमा हो जाती है। नतीजतन नदियों की जलवहन क्षमता कम हो जाती है और निकटवर्ती क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है।

कई बार लोग नदियों के किनारे के क्षेत्रों में घर और अन्य निर्माण कर लेते हैं इससे भी नदी को बारिश के पानी को निकालने के लिये अधिक जगह नहीं मिल पाती है। नदियों में जल के मुक्त प्रवाह में तटबंधों, नहरों और रेलवे संबंधी परियोजनाओं के निर्माण के कारण भी रुकावट पैदा होती है।

2013 की उत्तराखण्ड की विनाशकारी बाढ़ इसी कारण से थी। इसका एक और गंभीर उदाहरण झेलम नदी है, जिसके किनारों पर श्रीनगर और अन्य कस्बेे स्थित हैं। दीर्घावधि वर्षा से नदी में आने वाले आकस्मिक और भारी जलप्रवाह को झेलम नियंत्रित नहीं रख पाती है, क्योंकि पिछले 5 दशकों से नदी क्षेत्र में एकत्र गाद और रेत की सफाई के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं।

बाढ़ के अन्य कारण


बाढ़ का एक बहुत बड़ा कारण नदी तल में वृद्धि, जो गाद और रेत जमना है, शामिल है, क्योंकि बरसों तक नदियों की सफाई के लिए कोई अभियान नहीं चलाया जाता है। हिमालयी नदियां अपने साथ भारी सामग्री लेकर चलती हैं, जिसमें गाद और रेत की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो अंतत: निचले जलग्रहण क्षेत्रों में जमा हो जाती है।

नतीजतन नदियों की जलवहन क्षमता कम हो जाती है और निकटवर्ती क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है। नदियों में जल के मुक्त प्रवाह में तटबंधों, नहरों और रेलवे संबंधी परियोजनाओं के निर्माण के कारण भी रुकावट पैदा होती है। पिछले कई दशकों से नदी क्षेत्रो में एकत्र गाद और रेत की सफाई के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं।

वनों की कटाई का प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, जिससे वैश्विक तापमान में इजाफा हो रहा है। पर्वतीय ढलानों पर वनों के काटने से मैदानों की ओर नदियों के प्रवाह में रुकावट आती है, जिससे उनकी जलवहन क्षमता पर असर पड़ता है, जिससे पानी तेजी से नीचे की तरफ आता है।

वनों के ह्रास के कारण भूमि कटाव की समस्या भी पैदा होती है क्योंकि वृक्ष पर्वतों की सतह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और तेजी से नीचे आने वाले वर्षा जल के लिए प्राकृतिक बाधाएं पैदा करते हैं। नतीजतन नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है, जिससे बाढ़ आती है।

शहरी क्षेत्रों में बाढ़ का मूल कारण यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में अंधाधुंध पलायन हो रहा है, जिससे आवास और वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए भूमि पर दबाव बढ़ता है। जमीन, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों जो नदियों और उनकी सहायक नदियों के बाढ़ के पानी की परंपरागत निकासी का स्रोत होते हैं, पर अतिक्रमण रोकने में नगर प्राधिकारियों और यहां तक कि सरकारों की विफलता और अधिकतर मामलों में जटिलता से शहरों में अभूतपूर्व बाढ़ आती है।

देश के अधिकांश बड़े शहरों को जलभराव के खतरे का सामना करना पड़ रहा है। इसके कारणों में कुप्रशासन, आयोजना का अभाव, भूमि के अतिक्रमण संबंधी भ्रष्टाचार और अंधाधुंध अनधिकृत निर्माण शामिल है।

चेन्नई और श्रीनगर में पिछले दिनों आई अभूतपूर्व बाढ़ इसी तरह की बर्बरता का उदाहरण है। इससे पहले मुम्बई में भी इन्हीं कारणों से बाढ़ आई थी। आवास और आर्थिक कारणों के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण के नाम पर अनियोजित वाणिज्यीकरण से शहरों में प्राकृतिक आपदाओं को सहने की क्षमता कम होती जा रही है।

वर्तमान बाढ़ आपदा प्रबंधन


वर्तमान में कटाव नियंत्रण सहित बाढ़ प्रबंधन का विषय राज्‍यों के क्षेत्राधिकार में आता है। बाढ़ प्रबंधन एवं कटाव-रोधी योजनाएँ राज्‍य सरकारों द्वारा प्राथमिकता के अनुसार अपने संसाधनों द्वारा नियोजित, अन्‍वेषित एवं कार्यान्वित की जाती हैं। इसके लिये केंद्र सरकार राज्‍यों को तकनीकी मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

पिछले कई बर्षों से देखने में आया है कि बाढ़ के पैटर्न में निश्चित रूप से परिवर्तन हुआ है, जो वर्षा की बदलती पद्धति से सम्बद्ध है। दशकों पहले मानसून मॉडल की तुलना में परिवर्तन स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है।

प्रौद्योगिकी उन्नयन के चलते मौसम विशेषज्ञ या जिन्हें हम लोकप्रिय रूप में वैदरमैन कहते हैं, वे आज मानसून या अन्य मौसम स्थितियों की भविष्यवाणी लगभग शत प्रतिशत यथार्थ रूप में कर देते हैं। भारत का मौसम विभाग अब लगभग सही भविष्यवाणी कर पा रहा है। इससे केंद्र और राज्य, दोनों ही सरकारों को निश्चित रूप से आपदा प्रबंधन कार्रवाइयों को अंजाम देने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है।

इससे न केवल असामान्य भारी वर्षा के कारण आने वाली बाढ़ से बल्कि बारिश की कमी के कारण पडऩे वाले सूखों से भी लोगों को निजात दिलाने की तैयारी जा सकती है।

परंतु, वैज्ञानिक साधनों से वर्षा पद्धतियों पर नियंत्रण करना या ऐसा कोई डिजाइन तैयार करना संभव नहीं है। अत: बाढ़ प्रबंधन के लिए परिवर्तित वर्षा पद्धतियों के अनुरूप बहु-आयामी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है।

वनों के ह्रास को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। अनेक हिमालयी राज्यों में पिछले दशकों के दौरान वनों का राष्ट्रीयकरण किया गया है ताकि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगाई जा सके।

सभी स्तरों पर पौधे लगाने या वनरोपण के व्यापक अभियान चलाना भी सही दिशा में एक कदम है। बाढ़ नियंत्रण के संदर्भ में इन उपायों का अपेक्षित लाभ तभी मिल सकता है जबकि वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर सतत और दीर्घावधि योजना के अनुसार ये प्रयास जारी रखे जाएं।

अतिक्रमण रोकने में नगर प्राधिकारियों और यहां तक कि सरकारों की विफलता और अधिकतर मामलों में जटिलता से शहरों में अभूतपूर्व बाढ़ आती है। देश के अधिकांश बड़े शहरों को जलभराव के खतरे का सामना करना पड़ रहा है। इसके कारणों में कुप्रशासन, आयोजना का अभाव, भूमि के अतिक्रमण संबंधी भ्रष्टाचार और अंधाधुंध अनधिकृत निर्माण शामिल है।

चेन्नई और श्रीनगर में पिछले दिनों आई अभूतपूर्व बाढ़ इसी तरह की बर्बरता का उदाहरण है। इससे पहले मुम्बई में भी इन्हीं कारणों से बाढ़ आई थी। आवास और आर्थिक कारणों के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण के नाम पर अनियोजित वाणिज्यीकरण से शहरों में प्राकृतिक आपदाओं को सहने की क्षमता कम होती जा रही है।

यदि सम्बद्ध अधिकारियों ने निहित स्वार्थों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की होती और बाढ़ से होने वाली आकस्मिकताओं के लिए निवारक उपायों की पूरी तरह तैयारी की होती तो ऐसी आपदाओं को रोका जा सकता था।

ये निहित स्वार्थ नगर योजनाकारों, नौकरशाहों और यहां तक कि राजनीतिज्ञों की भी मिलीभगत होते हैं। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मकान की जरूरत या अन्य कारणों से आम नागरिक भी इसमें एक घटक बनते हैं।

तो ये ऊपर लिखे हुये जो भी वर्तमान बाढ़ आपदा प्रबंधन के उपाय किये जा रहे हैं वो अपर्याप्त हैं। सरकारें बाढ़ प्रबंधन को लेकर देर से जागती हैं और संबंधित जिलों को प्रशासनिक अधिकारियों के भरोसे छोड़ देती हैं। ज्यादा हालात खराब होने पर सरकारों के मुखियाओं द्वारा हैलीकॉप्टर से दौरा कर के कुछ बाढ़ सहायता राशि की घोषणा कर दी जाती हैं और उसके बाद धीरे धीरे सब भुला दिया जाता है और ये सिलसिला साल दर साल चलता रहता है।

जबकि होना तो ये चाहिये कि वर्तमान बाढ़ प्रबंधन जिस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है को केवल बाढ़ प्रबंधन के विशेषज्ञों के द्वारा ही किया जाना चाहिये।

बाढ़ आपदा प्रबंधन के लिये और क्या किया जा सकता है


बाढ़ नियंत्रण एक ऐसा विषय है, जिसके लिए कोई स्पष्ट विधायी दायरा तय नहीं किया जा सकता। एक विषय के रूप में यह देश की किसी भी विधायी सूची अर्थात् केंद्रीय, राज्य या समवर्ती सूची में शामिल नहीं है।

यह अलग विषय है कि जल निकासी और तटबंध संबंधी मुद्दों का उल्लेख राज्य सूची की द्वितीय सूची की प्रविष्टि संख्या 17 के रूप में किया गया है। इसका यह निहितार्थ है कि बाढ़ को रोकना और उसका मुकाबला करना मुख्य रूप से राज्य सरकारों का दायित्व है। कई राज्यों ने बाढ़ संबंधी मुद्दों से निपटने के प्रावधानों के साथ कानून बनाए हैं।

केंद्र सरकार मुख्य रूप से परामर्शी क्षमता में भूमिका अदा करती है अथवा राज्यों के राहत और पुनर्वास प्रयासों में पूरक मदद करती है।

एक विस्तृत टिप्पणी के अनुसार वर्तमान में बाढ़ प्रबंधन की देखरेख के लिए दो स्तरीय प्रणाली कायम है। राज्य के स्तर पर जल संसाधन विभाग, बाढ़ नियंत्रण बोर्ड और राज्य तकनीकी परामर्शी समितियां स्थापित की गई हैं।

केंद्रीय व्यवस्था के अंतर्गत संगठनों का एक नेटवर्क शामिल है और बाढ़ प्रबंधन के बारे में परामर्श देने के लिए समय समय पर विशेषज्ञ समितियों का गठन किया जाता है।

ये व्यवस्था कागजों मे तो अच्छे से काम कर रही है परंतु हमारे अनुसार बाढ़ आपदा प्रबंधन के लिये ये किया जाना चाहिये ---

  • अधिक समन्वय पर ध्यान देते हुए केंद्र, राज्य तंत्र को अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। यह व्यवस्था एक सतत और निरंतर प्रणाली के रूप में होनी चाहिए, न कि केवल आपदा के समय काम करने वाली प्रणाली। 
  • आधुनिक प्रौद्योगिकी के सहारे संकट प्रबंधन नेटवर्क हेतु ढांचे का निर्माण करना चाहिये। अब तो भारत के पास खुद के मौसम सेटेलाइट भी हैं। इसरो (ISRO) की सहायता से अंतरिक्ष से अच्छी गुणवत्ता की फोटो लेकर उनका विश्लेषण विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिये।
  • पर्यावरण के मोर्चे पर नई चुनौतियों और कुप्रशासन के मुद्दों को देखते हुए राज्यों के लिए यह कठिन है कि वे स्वयं बाढ़ प्रबंधन की योजना बनाएं। केंद्र और राज्य सरकारों को एक संयुक्त योजना के जरिए विभिन्न बाढ़ नियंत्रण उपायों को अंजाम देना  चाहिए। 
  • तटबंधों, बाढ़ रोकने वाली दीवारों, रिंग बांधों, बाढ़ नियंत्रण जलाशयों के निर्माण से बाढ़ के लिये व्यवस्था की जानी चाहिये ताकि नीचे जाने वाले पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षित सीमाओं के भीतर बाढ़ के जल की कुछ मात्रा को अस्थाई तौर पर एकत्र किया जा सके।
  • एक अन्य महत्वपूर्ण उपाय में नदी चैनलों और सतही नालों में सुधार और नदी किनारों पर भूमि कटाव रोकना शामिल है। इससे भले ही पूरी तरह बाढ़ रोकना संभव न हो, लेकिन बाढ़ के पानी को फैलने से रोकने में अवश्य मदद की जा सकती है।
  • उदाहरण के तौर पर मैं ये बताना चाहुंगी कि दुनिया के सभी बड़े देशों और शहरो को देखना चाहिये कि उन्होंने अपने यहां आने वाली बाढ़ आपदा का प्रबंधन कैसे किया। 
  • अगर आप बैंकाक, लंदन, मास्को, न्यूयार्क, शंघाई इत्यादि शहरों को देखेंगे तो पायेंगे कि वहां पर नदियों को गहरा कर कर के दोनों ओर के किनारों पर पक्का कर दिया गया है और साथ ही जमीन को नदी से निकाल कर वहां निर्माण कार्य किया गया है जिससे नदी में पाना बना रहता है और वो कटाव भी नहीं कर पाती है।
  • ऐसी गहरी करी गई नदियों में जल यातायात भी यात्रियों और सामान को ढोने के लिये किया जाता है। 
  • यही करने से काफी हद तक हम बाढ़ की समस्या से बच सकते हैं यानी कि नदियों कि सफाई कर के उनको गहरा करते रहना चाहिये।
  • वर्तमान में प्रचलित परिस्थितियों और नई चुनौतियों को देखते हुए यह जरूरी है कि बाढ़ प्रबंधन को एक पृथक विषय के रूप में देखना उचित होगा। यह जरूरी है कि बाढ़ नियंत्रण और प्रबंधन प्रणाली को सुदृढ़ बनाया जाए लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि इसे पर्यावरणीय ह्रास, वैश्विक तापमान और विभिन्न स्तरों पर कुप्रशासन के संदर्भ में भी देखा जाए।
  • बाढ़ प्रबंधन के प्रति किसी भी दृष्टिकोण में इन सभी महत्वपूर्ण घटकों को शामिल किया जाना चाहिए। बाढ़ प्रबंधन केवल पुराने सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभागों के माध्यम से नहीं किया जा सकता। 
  • शहरी बाढ़ का मुख्य कारण निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा भूमि का अतिक्रमण करना और बरसात के मौसम से पहले अग्रिम आयोजना का अभाव है। शहरों के निकट नालों और नालियों की सफाई को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में भी नदियो को गहरा करके बाढ़ आपदा का प्रबंधन किया जा सकता है। 
  • जैसा कि वर्तमान में जो वृक्षारोपण वगैरह का सरकारी कार्यक्रम चलता रहता है, उसको ठीस से देखने की जरूरत है। केवल वृक्षारोपण उद्देश्य न होकर पेड़ को बड़ा करने का उद्देश्य होना चाहिये।


अधिक ध्यान बाढ़ से संबंधित दीर्घावधि योजना पर केंद्रित किया जाना चाहिए ताकि निवारक और राहत पहलुओं को भी शामिल किया जा सके।

लोग कह सकते हैं कि ये तो बहुत मंहगा समाधान है, लेकिन अगर हम भारतीय अपने आप को दुनिया के विकसित देशों में देखते हैं तो हमें पक्के समाधान निकलने ही होंगे भले ही वो मंहगे हों।

मुझे यहां पर आपके विचारों और टिप्पणियों का स्वागत रहेगा ताकि हम लोग परंपरागत बाढ़ प्रबंधन की बजाए कुछ अलग उपाय करके बाढ़ आपद प्रबंधन की दिशा में विचार विमर्श कर सकें।

Manisha सोमवार, 27 जुलाई 2020

भारत के राज्यों के पर्यटन विभागों की टैगलाइनें


भारत के सभी राज्य और भारत सरकार सभी यह प्रयास कर रहे हैं उनके यहां पर्यटन का विकास हो जिससे लोगों को रोजगार मिले और आर्थिक तरक्की हो सके। इस दिशा में काम करते हुये भारत सरकार पर्यटन मंत्रालय एवं विभिन्न राज्यों के पर्यटन विभागों ने अपनी वेबसाइटों, विज्ञापनों इत्यादि में बहुत ही रोचक टैगलाइनें (Taglines) या नारे बनाकर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करके लुभाने की कोशिश की है।

ये नारे कहीं कहीं तो बहुत ही लोकप्रिय हो गये हैं जैसे कि गुजरात पर्यटन विभाग के ब्रांड अंबेसडर (Brand Ambassador) या उत्पाद दूत प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के द्वारा कहा गया नारा 'कुछ दिन तो गुजारो गुजरात में ' बहुत ही प्रसिद्ध हुआ। एक और उदाहरण राजस्थान की टैग लाइन 'पधारो म्हारे देस' का है जो कि लोगों की जुबान पर चढ़ गया है।
भारत के राज्यों के पर्यटन विभागों की टैगलाइनें और नारे Indian Tourism department Taglines


पर्यटन विभागों की टैगलाइन्स की सूची


हमने यहां पर भारत के राज्यों के पर्यटन विभागों की टैगलाइन्स की लिस्ट यानी की सूची बनाने की कोशिश की है। हमें उम्मीद थी कि शायद भारत के राज्यों ने पर्यटन नारे हिंदी भाषा या संस्कृत भाषा में बनाये होंगे पर हमारा अंदाजा गलत निकला। अधिकांश पर्यटन टैगलाइन अंग्रेजी भाषा में हैं।

एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि अधिकांश राज्यों की पर्यटन विभागों की वेबसाइटों के हिंदी संस्करण नहीं हैं। आप हिंदी मे उस राज्य की पर्यटन जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते।

खैर, यहां पर इनको यह सोच कर नजरअंदाज किया जा सकता है कि शायद भारत के राज्य विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करना चाहते होगें। देसी पर्यटक के लिये शायद इन्हें लगता होगा कि ये लोग इतना खर्चा नहीं करते हैं तो इनको लुभाने की आवश्यकता ही क्या है?


अधिकांश राज्यों के पर्यटन विभागों द्वारा उनकी सार्वजनिक क्षेत्र की पर्यटन कंपनियों राज्य पर्यटन विकास निगम (State Tourism Development Corporation) के माध्यम से पर्यटकों को होटल बुकिंग, टैक्सी बुकिंग, खरीददारी आदि की सुविधाये प्रदान की जा रही हैं। अगर हमें किसी राज्य के इन पर्यटन विकास निगमों के भी टेगलाइन मिले तो इसी यहां सूची में शामिल किया गया है। जिन राज्यों के पर्यटन विभागों की कोई टैगलाइन हमको नहीं मिली उसको यहां पर खाली छोड़ दिया गया है। जब कभी ये राज्य अपना कोई पर्यटन नारा बनायेंगे तो उसे यहां अद्यतन (Update) किया जायेगा।

तो लीजिये देखिये मई 2021 तक अद्यतन की गई भारत के राज्यों के पर्यटन विभागों की टैगलाइनों की लिस्ट -

  1. भारत सरकार पर्यटन मंत्रालय (Ministry of Tourism, GoI) - अतिथि देवो भव: (Incredible India! Atithi Devo Bhava)
  2. अंडमान एवं निकोबार (Andaman & Nicobar)  - Emerald. Blue. And You
  3. आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) - Everything Possible
    • Andhra Pradesh Tourism Development Corporation (APTDC) - The more you see it. The more you love it...
  4. अरूणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh)  - Gateway to Serenity
  5. आसाम (Assam) - Awesome Assam
  6. बिहार (Bihar) - Blissful Bihar
  7. चंडीगढ़ (Chandigarh) - The City Beautiful
  8. छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh)  - Full of Surprises
  9. दादरा - नागर हवेली और दमन एवं दीव  (Dadra Nagar Haveli and Daman & Diu)  - Small is Big
  10. गोवा (Goa)  - See More. Be More.
  11. गुजरात (Gujarat)  - कुछ दिन तो गुजारो गुजरात में
  12. हरियाणा (Haryana) - Come, holiday with us!
  13. हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh
  14. जम्मू और कश्मीर (Jammu and Kashmir) - See J&K in a new light
    • Jammu & Kashmir Tourism Development Corporation (JKTDC) - Proud to serve you
  15. लद्दाख (Ladakh
  16. झारखण्ड (Jharkhand)  - Nature's hidden jewel
  17. कर्नाटक (Karnataka Tourism) - One State. Many Worlds
  18. केरल (Kerala) - God's own Country
  19. लक्षद्वीप (Lakshadweep
  20. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh)  - The heart of Incredible India
  21. महाराष्ट्र (Maharashtra)  - Maharashtra Unlimited
  22. मणिपुर (Manipur
  23. मेघालय (Meghalaya)  - Check into Nature
  24. मिजोरम (Mizoram
  25. नागालैण्ड (Nagaland)  - Land of Festivals
  26. दिल्ली (Delhi
  27. ओडिशा (Odisha) - India's Best Kept Secret
  28. पुडुचेरी (Puducherry) - Peaceful Puducherry - Give time a break
  29. पंजाब (Punjab) - India begins here
  30. राजस्थान (Rajasthan) - पधारो म्हारे देस! The Incredible State of India
  31. सिक्किम (Sikkim) - Sikkim, where Nature smiles
  32. तमिलनाडु (Tamil Nadu) - Enchanting Tamil Nadu - Experience Yourself
  33. त्रिपुरा (Tripura)  - Tripura: Where Culture Meets Nature
  34. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) - यूपी नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा
  35. उत्तराखण्ड (Uttarakhand) - Simply Heaven
  36. पश्चिम बंगाल (West Bengal) - Experience Bengal - The Sweetest part of India

हिंदी भाषी राज्यों के पर्यटन नारे भी अंग्रेजी में हैं।

यहां नीचे 👇 कमेंट टिप्पणी कर के बताइये आपको किस राज्य का पर्यटन नारा सबसे अच्छा लगा।

Manisha शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

घिसी पिटी भारतीय नीतियां जिनसे भारत को घाटा हो रहा है


जब से भारत ने अंग्रेजों से स्वाधीनता प्राप्त करी है तब से ही हम भारत के लोग एक ऐसी काल्पनिक दुनिया की सोच में रहते हैं जहं पर सब कुछ अच्छा होता है और सारे देश और वहां के लोग सीधे और सच्चे होते हैं। इन्हीं ख्यालों में हमने कुछ नीतियां और जुमले बनाये हुये हैं और समय समय पर उनकी बात करते रहते हैं।


आजादी के बाद से दुनिया कहां से कहां पहुंच गई पर हम अभी भी इन्हीं नीतियों और जुमलों के जाल में फंसे हुये हैं। एक-आधा नीति को शायद हमने छोड़ा होगा या नई कोई नीति बनाई होगी वर्ना तो बस पुराने रिकार्ड की तरह हम हमेशा वही बातें दोहराते रहते हैं।


Outdated Indian Policies घिसी पिटी भारतीय नीतियां


घिसी पिटी नीतियां और जुमले


आइये आपको बताते हैं ऐसी ही कुछ घिसी पिटी नीतियां और जुमले जो भारत में चलती हैं -

  1. हम दुनिया के जिम्मेदार लोकतांत्रिक देश हैं - जब आप पिट गये और कोई कार्रवाई न करने का बहाना है
  2. वसुधैव कुटुंबकम - इस का फायदा उठा कर सब देशों के लोग अवैध तरीके से भारत में रह रहे हैं
  3. पंचशील और हिंदी-चीनी भाई भाई - ये बात तो 1962 में ही पिट गई
  4. गुट निरपेक्षता नीति - अब  ये तो बिलकुल ही समाप्त होने को आई लेकिन हम अभी भी इसका जिक्र करते रहते हैं
  5. गुजराल डॉक्टरिन - पाकिस्तान हमेशा फायदा उठाता है
  6. पहले परमाणु हथियारों का प्रयोग न करने की नीति - तो क्या जब हमारे ऊपर कोई परमाणु बम गिर जायेगा तब हम प्रयोग करेंगे तो हमें उससे पहले भयानक नुकसान तो हो चुका होगा
  7. भारत ने आज तक किसी देश पर हमला नहीं किया - ये बात हम बार बार बताते हैं पर इसको भारत के दुश्मन भारत की कमजोरी समझते हैं
  8. भारत सब को साथ लेकर चलना चाहता है - अरे भाई सबको कभी साथ नहीं लिया जा सकता, पहले अपना फायदा देखो
  9. भारत समस्या का समाधान बातचीत और शांति से चाहता है - बातचीत और शांति से तो आजतक अपनी बढ़त को गंवाया ही है, बेहतर है एक-दो बार अशांति से भी समस्या समाधान निकालें
  10. पाकिस्तान की जनता तो शाति चाहती है पर वहां के शासक नहीं - अरे भाई जनता तो यहां से ही गई है न, जो कि साथ नहीं रहना चाहती थी, शासक तो राजनीतिक लोग होते हैं वो लोगों की नब्ज पहचानते हैं, अगर जनता भारत के साथ शांति से रहना चाहेगी तो कोई भी शासन में हो वो वाेट लेने के लिये जनता की बात को ही मानेगा। असल ये है कि पाकिस्तानी जनता ही भारत विरोधी है
  11. दुनिया के लोकतांत्रिक देशों को एक साथ आना चाहिये - अगल अलग परिस्थितियों और भौगोलिक स्थिति के अनुसार सब देश निर्णय लेते हैं
  12. हम अहिंसा को मानने वाले देश हैं - यही तो सारी कमजोरी का कारण है
  13. आतमकवाद को कई धर्म नहीं है - बताइये? क्या सचमुच?
  14. हम विश्व आध्यात्मिक गुरू हैं - हो सकता है कभी रहे हों या वास्तव में हों पर दुनिया तभी मानेगी जब हम आर्थिक और सामरिक तौर पर भी सशक्त हों


और भी कई ऐसी नीतियां और जुमले जिन्हें हम ढो रहे हैं।

अच्छा हो यदि हम इन रुमानी बातों से निकल कर ठोस धरातल पर होने वाले घटनाकृम को देख कर नीतियां बनायें और भारत देश को सशक्त बनायें।

Manisha शुक्रवार, 19 जून 2020

एयरकंडीशनर का तापमान 24 डिग्री रखने पर हमारे अनुभव


भारत में इस समय गर्मियों का मौसम है। अधिकांश जगहों पर दिन का तापमान 45-47 डिग्री के करीब चल रहा है। करीब-करीब हर घर में एसी (Air Conditioner - AC) का इस्तेमाल हो रहा है। गर्मियों से बचने के लिए लोग एयर कंडीशनर का सहारा ले रहे हैं।

आखिर लोग करें भी क्या जब इतनी गर्मी पड़ रही है। सब से बड़ी मुसीबत तो ये है कि कोरोना वायरस के चलते भारत में लॉकडाउन लगा हुआ है और लोगों को घरों मे ही रहना है।

ऐसे में देश में बिजली की खपत भी तेजी से बढ़ रही है। हालांकि घर-ऑफिस में एसी का आदर्श तापमान कितना रखा जाए, इसकी जानकारी भी लोगों को कम ही होती है इसीलिए अब भारत सरकार ने इसको लेकर एक नियम बना कर एयर कंडीशनर (एसी) के लिए तापमान का सामान्य स्तर 24 डिग्री नियत कर दिया है

air-conditioner-24-degree-setting


सरकार के अनुसार अगर इससे देश भर में सालाना 20 अरब यूनिट सालाना बिजली की बचत होगी साथ ही लोगों के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

सरकार के आधिकारिक बयान के अनुसार, बिजली मंत्रालय के अधीन आने वाला ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) ने इस संदर्भ में एक अध्ययन कराया था और एयर कंडीशनर में तापमान 24 डिग्री सेल्सियस निर्धारित करने की सिफारिश की थी। इस दिशा में शुरुआत करते हुए हवाईअड्डा, होटल, शापिंग मॉल समेत सभी वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों और विनिर्माताओं को परामर्श जारी किया गया है।



विनिर्माताओं को एयर कंडीशन में 24 डिग्री सेल्सियस तापमान निर्धारित करने का सुझाव दिया गया। साथ ही उस पर लेबल लगाकर ग्राहकों को यह बताने को कहा गया है कि उनके पैसे की बचत और बेहतर स्वास्थ्य के नजरिए से कितना तापमान नियत करना बेहतर है. यह तापमान 24 से 26 डिग्री के दायरे में होगा।

इस अधिसूचना के द्वारा बीईई स्टार-लेबलिंग कार्यक्रम के दायरे में आने वाले सभी रूम एयर कंडीशनरों के लिए 24 डिग्री सेल्सियस डिफॉल्ट सेटिंग को अनिवार्य कर दिया गया है।

इस से कमरे के एयर कंडीशनरों (एसी) का डिफॉल्ट (अपने आप में तय) तापमान अब 24 डिग्री सेल्सियस होगा। इसका मतलब है कि कमरे का तापमान 24 डिग्री रखने के हिसाब से ही एसी चलेगा। हां, व्यक्ति जरूरत के हिसाब से इसे ऊपर नीचे कर सकता है। फिलहाल एसी का डिफाल्ट तापमान 18 डिग्री सेल्सियस है।

एयरकंडीशनर का तापमान 24 डिग्री करने का क्या फायदा होगा?


लेकिन असल सवाल है कि ऐसा करने से हासिल क्या होगा? क्या वाकई एसी के तापमान से बिजली की खपत निर्धारित होती है?

दरअसल ऊर्जा मंत्रालय का सुझाव था कि 'एसी पर 1 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ाने से 6% एनर्जी बचती है। न्यूनतम तापमान को 21 डिग्री के बजाय 24 डिग्री पर सेट करने से 18% एनर्जी बचेगी।'

भारत के ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक कमरे में तापमान कम पर रखने के लिए कम्प्रेसर ज़्यादा काम करेगा। 24 से 18 डिग्री पर सेट करने के पर एसी का तापमान कम करने से कंप्रेसर को ज्यादा लंबे समय तक काम करना पड़ता है। अगर एसी के तापमान को 25 डिग्री के बजाए 18 डिग्री पर कर दिया जाता है तो बिजली की खपत भी बढ़ जाती है।  एसी का तापमान 24 डिग्री पर रखने से बिजली की बचत भी होगी और आपकी सुविधा में भी कोई कमी नहीं आएगी।

किसी कमरे या जगह का तापमान 18 डिग्री करने के लिए एसी को लगातार काफी देर तक काम करते रहना पड़ता है। इससे एयर कंडीशनर की सेहत पर खराब असर के साथ बिजली की खपत भी ज्यादा होती है.

सबसे खास बात ये है कि इससे वहां मौजूद व्यक्ति के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है। दरअसल एसी कमरे में मौजूद नमी को सोखता है। इसलिए इसका नकारात्मक प्रभाव आपकी त्वचा पर पड़ता है। ऊपर से यह आपके शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने वाले प्राकृतिक तंत्र को प्रभावित करता है।

कई देशों में एयरकंडीशनर का तापमान 24 डिग्री करने के नियम पहले से लागू है


जापान और अमेरिका जैसे देशों ने एयर कंडीशनर के प्रदर्शन के लिए पहले ही इस तरह के नियम बना दिए हैं। जापान में एसी का डिफाल्ट तापमान 28 डिग्री सेल्सियस है। वहीं, अमेरिका में कुछ शहरों में एसी का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस से कम पर नहीं चलाने की सीमा तय है।

हार्वर्ड के मुताबिक 23.3 और 25.6 डिग्री सेल्सियस और लंदन स्कूल इकनॉमिक्स के मुताबिक तापमान 24 डिग्री होना चाहिए।


एयर कंडीशनर को लेकर हमारे अनुभव


एयर कंडीशनर (एसी) का प्रयोग हम भी कई सालों से कर रहे हैं। हमारे अनुभव कुछ हद तक सरकार के साथ हैं और कई मामलों में सरकार से उलट हैं।

सबसे पहले जब हम ने अपने घर पर एसी लगवाया था तब हम सबसे ऊपर के तल वाले घर पर रहते थे। यकीन मानिये 40-45 डिग्री के तापमान के समय छत इतनी गर्म हो जाती थी कि अधिकांश समय हमको अपना एयर कंडीशनर 18-20 डिग्री पर चलाना पड़ता था।

दूसरी बात ये देखी कि अलग-अलग कंपनियों के समान एयर कंडीशनर (जैसे कि 1.5 या 2.0 टन) भी समान ठंडक नहीं करते हैं जिससे अलग-अलग तापमान पर  एसी चलाने पड़ते हैं। एयर कंडीशनर की बनावट का भी असर होता है, कोई एसी 2 कोईल वाला होता है कोई 3 कोईल वाला। इससे भी एयर कंडीशनर की ठंड़ पर असर पड़ता है।

तो अगर किसी का घर एक मंजिल का है या फिर कोई किसी बिल्डिंग में इस तरह की छत वाली सबसे ऊपरी  मंजिल पर रहता है तो उसके लिये तो सरकार का इस तरह 24 डिग्री वाला एयर कंडीशनर ज्यादा काम नहीं आयेगा। सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिये।

तीसरी बात जो हमने देखी वो ये थी कि जबसे सरकार मे एसी में स्टार श्रेणी मूल्यांकन (* रेटिंग) किया है तो हमने भी एक कमरे के लिये एक 5 स्टार श्रेणी का एसा खरीद लिया। लेकिन हमने पाया कि इस तरह के एसी कम ठंडा करते हैं। शायद इनको बनाया ही बिजली बचाने के लिये है।

चौथी बात ये कि हमारे अनुभव में खिड़की वाले एयर कंडीशनर की तुलना में दीवार पर लगने वाले स्प्लिट एसी (Split AC) ज्यादा ठंडा करते हैं। भले ही दोनो की समान क्षमता हो (1.5 Ton or 2.0 Ton).

आखिरी बात ये कि बाद में हमने एक बहुमंजिली इमारत में अपना घर ले लिया और वहां हमारा घर बीच की  मंजिलों पर है। यहां पर एसी 25 डिग्री में भी काफी ठंडा कर देता है। ऐसी बहुमंजिली इमारतों में भारत सरकार का 24 डिग्री तापमान वाला एसी कामयाब रहेगा।

अत: सरकार को सब प्रकार के घरों को ध्यान में रखकर इस नियम को बनाना चाहिये था। वैसे कुल मिलाकर बिजली बचाने की बात तो ठीक है।

Manisha शुक्रवार, 29 मई 2020

आयकर विभाग ने भेजा आयकर विवरणी भरने का आग्रह 


आज सुबह जब अपनी ई-मेल खोली तो सुखद आश्चर्य हुआ ये देख कर कि भारत के आयकर विभाग ने सभी आयकर दाताओं से इस आग्रह की ई-मेल भेजी है कि हम सब आयकर दाता 31 दिसम्बर 2020 से पहले वित्तीय वर्ष 2019-20  आयकर विवरण (Income Tax Return) भर दें।

वैसे, आम तौर पर आयकर विवरण भरने की अन्तिम तिथि हर वर्ष की 31 जुलाई रहती है, पर इस वर्ष कोरोना महामारी की वजह से यह पहले 30 नवम्बर 2020 तक बढ़ाई गई थी जोकि बाद में सरकार ने लोगों की सुविधा के लिये 31 दिसम्बर 2020 तक बढ़ा दी है।

भारत का आयकर विभाग अब अग्र सक्रिय (Pro Active) हो गया है।

31 दिसम्बर 2020

Manisha मंगलवार, 23 जुलाई 2019

आरक्षण अभी और कई तरीकों से लागू होगा


जिस तरह से सरकार अपने खर्चे कम न करके जनता पर और बोझा डालने के लिये नये नये कर (टैक्स) लगाने के तरीके ढूंढ़ती रहता है उसी तरह से राजनैतिक पार्टियां और नेता लोग अपना वोट बैंक बनाने के लिये नये नये वर्गों को आरक्षण का रास्ता दिखाते रहते हैं। और इसी क्रम में संविधान में वर्णित आरक्षण को और कई तरीकों से लागू करने के तरीके ढूंढ कर लोगो को लुभाते रहते हैं। 

देश में जरुरत अच्छी काम करने वाली सरकारों की है क्यों कि अगर सरकारें अच्छा काम करें तो सभी वर्गों का भला होगा और कोई भी ये नहीं कहेगा कि मुझे मौका नहीं मिला। लेकिन अपनी नाकामियों को छिपाने और नये नये वोट बैंक बनाने के चक्कर में राजनैतिक दल आरक्षण के नये नये जुमले उछालते रहते हैं ताकि लोगों को ये लगे कि राजनैतिक दल उनका कितना भला चाहते हैं। 

ये दल गरीब, मुस्लिम, पिछड़े, एससी-एसटी, युवा कई तरह के आरक्षण की मांग करते रहते हैं लेकिन अपनी बनाई हुई सरकारों द्वारा कुछ भी ऐसा नहीं करते हैं जिससे की आरक्षण की नौबत ही न आये। 

मुझे महिला आरक्षण के पास होने की तो खुशी है लेकिन मुझे आने वाले समय की तस्वीर दिख रही है कि अभी आरक्षण की ये बात बहुत आगे तक जायेगी। देखिये कैसे अभी आरक्षण होगा -

  • महिलाओं के लिये लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण के बाद राज्यसभा में भी आरक्षण की मांग तो अभी से उठने लगी है।
  • महिलाओं के लिये लोकसभा और राज्यों की विधानसभायों में 33 प्रतिशत आरक्षण में से भी पिछड़े, दलित और मुस्लिमों को आरक्षण की मांग कई दल कर रहे हैं।
  • इसके बाद शिक्षा में महिलाओं के लिये आरक्षण की मांग उठेगी।
  • इसके बाद सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिये आरक्षण की मांग उठेगी।
  • मुस्लिमों के लिये रंगनाथ मिश्र आयोग ने आरक्षण देने की बात कही है और इस पर भाजपा को छोड़कर सभी दल तैयार हैं। देश की राजनीति को देखते हुये ये मांग सबसे पहले पूरी होगी।
  • अनूसुचित जति और जनजाति के आरक्षण में परिवर्तित मुस्लिमों और ईसाइयों को आरक्षण देने की मांग पिछले कुछ समय से हो रही है।
  • समय समय पर न्याय पालिका में आरक्षण देने की वकालत की जा रही है।
  • निजी संस्थानों (प्राइवोट सेक्टर) में आरक्षण के लिये काफी समय से प्रयास किये जा रहे हैं और सरकार इसके लिये प्रयत्नशील है।
  • हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट नें पंचायतों में युवा के नाम पर एक नये प्रकार का आरक्षण देने पर रोक लगाई है।
 
यानी सब प्रकार के आरक्षण के बाद युवा के लिये आरक्षण, बुजुर्गों के लिये आरक्षण इत्यादि की मांग उठाई जायेगी और अपने आप को इनका हितैषी बताया जायेगा।

आरक्षण  Reservation



आरक्षण से सभी लोग प्रभावित होते हैं। लेकिन जिस वर्ग को मिल जाता है वो आरक्षण के पक्ष में बाते करने
लगता है और इसको अपना हक बताने लगता है भले ही ये माना जाता हो कि आरक्षण कुछ समय के लिये देना है। 

दरअसल वास्तविकता में आरक्षण असली जरुरतमंद को नहीं मिल रहा है, इसका फायदा  वही लोग उठा रहे हैं जो कि पहले से ही आगे हैं। 

वास्तव में भारत में दो ही वर्ग हैं संपन्न एवम गरीब और पिछड़े, जिसमें संपन्न वर्ग गरीबों-पिछड़ों को आगे लाने के नाम पर अपने लोगों को फायदा पहूंचा रहे हैं। 

सोचने वाली बात है कि अगर देश में सरकारें अपना काम अच्छे से करें तो ये बात ही क्यों आये कि कुछ वर्ग पिछड़ गये हैं।


संपादन - 1


जैसी कि ऊपर आशंका व्यक्त की गई थी, हाल ही में कई प्रकार का आरक्षण लागू हुआ है और कई अन्य प्रकार के आरक्षण के लिये या तो लोग संघर्षरत हैं या फिर सरकारें ही प्रयास कर रहीं हैं। 

महाराष्ट्र में मराठों से लिये 18 प्रतिशत का आरक्षण सरकारी नौकरियों में किया गया है। भारत सरकार द्वारा सरकारी नौकरियों में बकायदा भारतीय संविधान में संशोधन करके सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में 10 प्रतिशत का आरक्षण आर्थिक तौर से कमजोर (Economically Weaker Section - EWS) वर्गों को दिया गया है। 

राजस्थान में गूर्जर जाति के लोगों के लिये 5 प्रतिशत का आरक्षण सरकारी नौकरियों में दिया जा रहा है।

New Reservation नया आरक्षण

आप देखते जाइये किसी न किसी प्रकार से पूरा 100 प्रतिशत किसी न किसी को आरक्षण दिया जायेगा। कुछ हिस्सा सब को मिलेगा  इसलिये कोई विरोध नहीं करेगा।

Manisha गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019