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26/11 : पश्चिम से ही हमेशा हमला हुआ है भारत पर


पश्चिम से ही हमेशा हमला हुआ है भारत परअगर आप इतिहास उठा कर देखें तो पायेंगे कि भारत भूमि पर केवल एक बार को छोड़ कर ((जब चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण किया था)  हमेशा  पश्चिमी सीमा से हमला होता रहा है। केवल 1962 में ही उत्तर की ओर से चीन द्वारा हमला किया गया था। 

सिकन्दर, मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, तामूर लंग, बाबर, अकबर, नादिरशाह, अहमदशाह अब्दाली, याह्या खां, अजमल आमिर कसाब आदि हमलावर सब भारत पर पश्चिमी दिशा से ही आये थे। 

जब भी भारत की  पश्चिमी सीमा कमजोर हुई तो भारत पर हमला हुआ है। आजादी के बाद से भी पश्चिमी सीमा पर तीन बार पाकिस्तान की ओर से हमला किया गया है। 

इसलिये इतिहास से सबक लेते हुये देश को पश्चिम की ओर विशेष ध्यान  रखना चाहिये। विश्व के आतंकवाद की केन्द्र भी भारत के पश्चिम में ही स्थित है और इधर ही दुनिया का सबसे ताकतवर देश अपनी सेना लेकर बैठा हुआ है। 

दरअसल पश्चिम की ओर भारत में सपाट मैदान हैं जहां सेना तीव्र गति से चल पाती हैं, इसके अलावा ये इलाका उपजाऊ भी है इस कारण यहां समृद्धि है और इसीलिये विदेशी आक्रमणकारी हमेशा लूटने के लिये लालायित रहते रहे हैं। 

अब इसमें जेहाद और धार्मिक तथा राजनीतिक विद्वेष  भी मिल गया है। मेरे विचार में भारत को अपने आप को सुरक्षित करने के लिये पश्चिमी सीमा को सुदृण होना बहुत आवश्यक है।

Manisha गुरुवार, 26 नवंबर 2009

अंग्रेजी और हिंदी के अखबार और पत्रिकायों में बहुत विरोधाभास हैं


अंग्रेजी और हिंदी के अखबार और पत्रिकायों  बहुत विरोधाभास हैं एनडीटीवी के पत्रकार एवं हिंदी के अच्छे चिठ्ठाकार श्री रवीश कुमार जी ने अपने चिठ्ठे कस्बा  में यह प्रश्न उठाया था कि हिंदी-अंग्रेजी के अख़बारों का किसान अलग क्यों होता है?  

दरअसल ये बहुत ही बुनियादी सवाल है और ये वास्तव में हिंदी और अंग्रेजी भाषा के द्वारा सोचने और समझने का भी अन्तर है और साथ ही संस्कृतियों का भी अंतर हैं। 

मैं हिंदी और अंग्रेजी की तमाम पत्रिकायें (खास कर महिलाओं की) एवं समाचार पत्र पढ़ती हूं और कई विषयों पर देखा है कि अंग्रेजी के अखबार और पत्रिकायों की सोच बिलकुल अलग है।

  • अंगेजी की पत्रिकाये हमेशा इस तरह के लेख छापती हैं – हाउ टू प्लीज योर मैन, नो हिज सेक्सी प्लेसेज, फिफ्टी वेज टू सेटिस्फाई हिम इत्यादि। इनमें योर मैन की बात की जाती है यानी ये बताया जाता है कि किसी से भी आप संबंध बना सकती हो। यहां कभी भी हसबैण्ड शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। पूरा ध्यान पति-पत्नी पर न होकर मैन-वूमेन पर होता है।
  • अंगेजी के सारे अखबार मिलकर भी अकेले दैनिक जागरण से कम बिकते हैं (ताजा सर्वेक्षण 2009 के अनुसार) लेकिन फिर भी हिंदी समाचार पत्रों को भाषाई या वर्नाकुलर लिखते हैं और अपने आप को नेशनल (राष्ट्रीय) समाचार पत्र कहते हैं।
  • पश्चिम की हर बुराई जैसे कि प्रास्टीट्यूशन, लिव-इन-रिलेशनशिप, लेस्बियन और गे सेक्स इत्यदि के समर्थन में लेखों की अंग्रेजी पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में बहुतायत रहती है और उसके पक्ष में माहौल बनाते रहते हैं।
  • शराब के किसी बन्दीकरण के विरोध में भी अंग्रेजी पत्रकारिता सबसे आगे है।
  • अब अंग्रेजी ही इनका जीवन-यापन का साधन है इसलिये ये अंग्रेजी को बढ़ावा देने के लिये हमेशा हल्ला करते रहते हैं। अंग्रेजी इनके अनुसार अंतर्राष्ट्राय भाषा है जिसके बिना भारत का विकास नहीं हो सकता।
  • हिंदी के पत्र-पत्रिका वाले पता नहीं किस हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं कि वो खुद ही हिंदी वालों को अंग्रेजी वालों के समतर समझते हैं। हिंदी के अखबारों और पत्रिकायों में वैज्ञानिक व अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर बहुत ही कम छपता है। उनके अनुसार हिंदी के पाठकों का स्तर कम है।
  • स्वतंत्र किस्म के लेख हिंदी पत्रिकायों और समाचार पत्रों मे कम ही आते है, अधिकांश समाचार ऐजेंसी से लिया हुआ होता है।
  • हिंदी के समाचार पत्र स्थानीय समाचारों को बहुत ही अच्छा कवर करते हैं।

Manisha बुधवार, 25 नवंबर 2009

नकली नोट का पता आखिर कैसे लग सकता है?


अगर आप बैंक जायें तो आप देखेंगे कि जगह जगह इस बात के पोस्टर लगे रहते हैं कि आप अपने नोट के नकलीपन को कैसे पहचान सकते हैं। 

इसके अलावा सरकार समय समय पर विज्ञापन इस संदर्भ में देती रहती है। इसी तरह का एक विज्ञापन मैंने नीचे दिया है। 

Manisha मंगलवार, 24 नवंबर 2009

प्रसिद्ध अंगेरेजी ब्लॉगर अमित अग्रवाल नें सबसे मशहूर भारतीय ब्लोगों की सूची के हिंदी भाग में अब इस चिठ्ठे को भी शामिल कर लिया है। इसी समय मेरे इस हिंदीबात चिठ्ठे के 400 से के ऊपर फीड ग्राहक भी हो गये हैं।

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Manisha

हैडली और राणा के नाम से देश को डराया जा रहा है

पिछले एक महीने से जब से अमेरिका की गप्तचर संस्था एफबीआई (FBI) ने डेविड हैडली और तहावुर्रहमान हुसैन राणा को गिरफ्तार किया है, देश के अखबारों में रोजाना उन से संबंधित समाचार छप रहे हैं। 

जो समाचार छाप रहे है वो मेरे विचार में देश पर कोई अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ रहे हैं। इन सभी समाचारों से बिना बम फोड़े ही देश को डराया जा रहा है। सोचने वाली बात ये है कि खुफिया जानकारी आखिर पत्रकारों को कौन और क्यों दे रहा है जिसे वो बिना जांचे छाप रहे हैं। 

कभी छपता है कि हेडली देश में कई जगह घूमा, कभी छपता है कि वो कई फिल्मी लोगों के संपर्क में था। कभी छपता है कि वो 26/11 से ठीक पहले भारत में था, अन्य स्थानों पर होने वाले हमलों से पहले वहां था। 

आज उसके द्वारा अपने एक दोस्त को भेजी गई ईमेल के जरिये आतंकवादियों के साहसिक होने की बात छापी गई हैं। यानी अब आतंकवाद के बारे में भी तारीफ की बातें छापी जा रही हैं। 

ये वही देश है जहां आतंकवाद से लडने के लिये जीरो टोलरेंस की बाते कीं जाती हैं, वहां पर इन लोगो की खबरें कैसे छप रही हैं? मेरे विचार में ये सब अपने आप ही नहीं हो रहा है बल्कि एसा लगता है कि देश को डराया जा रहा है कि देखों तुम लोग कुछ नहीं कर सकते। 

देश की पुलिस को कार्यवाही करनी चाहिये न कि जनता को डराने की खबरें छपवानी चाहिये।

Manisha सोमवार, 23 नवंबर 2009

किसके पीछे किसका हाथ है?


रोजाना समाचार पत्रों में अनेक समाचार छपते रहते हैं और अनेक प्रकार की प्रतिक्रियायें मिलती रहती हैं जिनमें बताया जाता है कि फलां-फलां बात के पीछे फलां का हाथ है। 

एक बानगी में यहां देना चाहती हूं। भारत कहता है कि आतंकवाद में पाकिस्तान का हाथ है। पाकिस्तान में लगातार हो रहे बम विस्फोटों मे पाकिस्तान के नागरिकों और सरकार के अनुसार अमेरिका, इस्राइल और भारत मिल कर पाकिस्तान को और इस्लाम को बर्बाद करना चाहते हैं। 

पाकिस्तान के अनुसार तालीबान के पीछे भारत का हाथ है। तालीबान पाकिस्तान के परमाणु बमों को हथियाना चाहता है, जिसको बनवाने के पीछे चीन का हाथ था। 

चीन सोचता है कि तिब्बत की गड़बड़ियों के पीछे दलाई लामा का हाथ है और दलाई लामा के पीछे भारत का हाथ है और इसी लिये दलाई लामा ने अरुणाचल प्रदेश का दौरा भी किया था। भारत का सोचना है कि अरुणाचल प्रदेश को चीन  हथियाना चाहता है। 

इस्राईल के अनुसार उसके यहां की समस्याओं के लिये पश्चिमी एशिया के देश जिम्म्दार हैं। हमास और अल फतह के अनुसार हिंसा के लिये इस्राइल जिम्मेदार है। इस्राइल के अनुसार इरान उसके उपर हमला कर सकता है। 

अमेरिका के अनुसार ईरान के पास परमाणु बम हैं। 

भारत में कुछ लोग मानते थे (हैं) कि हेमंत करकरे कि मृत्यु के पीछे हिंदूवादी संघटनों का हाथ है।

भारत में मंहगाई के लिये लोग कांग्रेस सरकार को दोषी मानते हैं।  प्र

काश करात के अनुसार मंहगाई के लिये अमेरिका, पश्चिमी देश और पूंजीवादी व्यवस्था जिम्मेदार है। 

मुलायम सिंह के अनुसार चुनावों में उनकी हार कल्याण सिंह और राहुल गांधी के कारण है। 

राज ठाकरे के अनुसार मराठियों की दुर्दशा के लिये हिंदी जिम्मेदार है। 

सेक्यूलरों के अनुसार भारत में मुस्लिमों की समस्त समस्याओं के पीछ नरेंद्र मोदी का हाथ है। 

70 के दशक में भारत में हर घटना के पीछे सीआईए का हाथ होता था। आजकल भारत में हर घटना के पीछे आईएसआई का हाथ होता है।

इस प्रकार हम लोग रोजाना षणयंत्रकारी नई नई थ्योरी पाते रहते हैं जिनसे ये हमारा पूरा मनोरंजन होता है और ये भी पता चलता है  किसके पीछे किसका हाथ है। 

आप भी अंदाजा लगाईये कि किसके पीछे कौन है?

Manisha गुरुवार, 19 नवंबर 2009

अब क्या होगा कोड़ा का? (पुराने अनुभवों के आधार पर)

झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के द्वारा अरबों रुपये की अवैध कमाई औरMadhu-Kora भ्रष्टाचार के समाचारों के बाद हर कोई सोच रहा है कि अब कोड़ा का क्या होगा? 

वैसे मधु कोड़ा को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है और वो अपने आप को राजनैतिक साजिश में फंसाने की बात करने लगे हैं और अपने को फंसाने वालों को देख लेने की बात भी करने लगे हैं। 

इसके अलावा चाईबासा में हंकार रैली करने वाले हैं। यानी कुल मिला कर हम लोगों ने जैसा भ्रष्टाचार के पूराने मामलों में देखा है वैसा ही कुछ इस बार भी होने जा रहा है। 

आइये देखें कि क्या हो सकता है -

  • अभी शायाद इस बात का इंतजार हो रहा है कि कोई काबिल वकील जमानत के लिये मामला तैयार कर ले  और मधु कोड़ा हजारों समर्थकों की भीड़ जुटा ले उसके बाद ही शायद गिरफ्तार किया जायेगा।
  • आगामी विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से जीत कर आयेगा और फिर कहा जायेगा कि जनता की अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दे दिया है।
  • ये कि दो-चार विधायक और चुनके आ गये तो सरकार में आने वाली पार्टी सहयोग लेने के बदले में केस को लटका देगी।
  • अगर कुछ नहीं हुआ तो भी केस तो बहुत लंबा चलेगा ही, बाद की बाद में देखी जायेगी।

यानी कि कुल मिलाकर जनता तो यही समझती है कि किसी का कुछ नहीं होगा क्योंकि इसस् पहले के घोटालों में भी किसी को कभी कोई सजा नहीं हुई है।

भारत में भ्रष्टाचार भी मंहगाई की तरह है जिससे सब परेशान है लेकिन कुछ होता नहीं है।

Manisha मंगलवार, 17 नवंबर 2009

ये लोग लड़ने मरने के लिये ही पैदा हुये हैं


आज फिर पाकिस्तान के पेशावर में एक बम विस्फोट हुआ है जिसमें अभी तक कीfata_map जानकारी के अनुसार 8 लोग मारे गये हैं, ये हमला पाकिस्तान की खुफिया संस्था आईएसआई के क्षेत्रीय कार्यालय पर हुआ है। 

पिछले 2-3 महीने से कोई दिन ऐसा नहीं जा रहा, जब पाकिस्तान में रोज कुछ न कुछ ऐसी घटनायें न घट रही हो। 

दरअसल पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत और पास के कबीलाई इलाकों (फाटा) के पख्तून लोगों का काम ही लड़ना मरना है। ये पख्तून या पठान जाति बहादुर और लड़ाकू है। 

ये लोग हजारों सालों से इसी तरह से लड़ते आये हैं। इन लोगों ने सिकंदर से लड़ाई लड़ी, बाबर, अकबर, जहांगीर, शाहजहां से लड़े, अंग्रेजों से लड़े, महाराज रणजीत सिंह के जमाने में लड़े पर कुछ काबू में रहे, सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान में लड़े और अब पाकिस्तान की सेना और सरकार से लड़ रहे हैं। 

दरअसल पुराने भारत के इस इलाके से भारत की शुरुआत थी और आर्यों ने बहुत ही रणनीतिक तौर पर इस दुर्गम इलाके में ऐसी जातियों को बसाया था जो कि लड़ने में माहिर थीं और जिनके लिये लड़ांई जीवन जीने का एक तरीका है। पुराने जमान् में ये लोग शठ कहलाते थे और इन लोगों की इतनी बदनामी थी कि एक कहावत थी कि शठ को शठ की भाषा में जबाव  देना चाहिये।

जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था तब इन लोगों ने सिकंदर की सेना के साथ बहुत ही बहादुरी से लड़ा था और इनका इतना आतंक था कि सिकंदर की सेना जो कि एक तिहाई रह गई थी, ने भारत में आगे जाने से इंकार कर दिया था। 

सिकंदर के जाने के बाद चाणक्य ने इनको  छापामार लड़ाई के लिये प्रशिक्षण दिया जो कि ये लोग अभी तक प्रयोग करते हैं। छापामार लड़ाई की तैयारी से ही सेल्युकस के बाद भारत में यवन शासन खत्म हो गया।  

इस पूरे इलाके की संरचना भी इस प्रकार की है कि दुश्मन वहां फंस जाता है इस कारण अक्सर लंबी लड़ाई चलती है। अंग्रेजों को इन्होंने 1897 मे औरक्जई में बुरी तरह हराया था। इसके बाद अंग्रेज इस इलाके में कभी शांति से नहीं रह सके और इल के कबीले वाले इलाकों को अंग्रेजों ने विशेष अधिकार से केवल राजनीतिक एजेन्ट रख कर आजाद ही रखा था। 

अंग्रेजों की ये व्यवस्था पाकिस्तान ने भी अभी तक जारी रखी हुई है जिसकी वजह से ये लोग अभी भी पुराने कबीलों वाले सिस्टम से रह रहे हैं और आज भी केवल लड़ना-भिड़ना जारी रखे हुये हैं। अंग्रेजों का ये लोग सिर काट लेते थे जिससे अंग्रेजों में इनका बहुत खौफ था।  

इनको नये जमाने के हिसाब से पढ़ना-लिखना और कुछ काम सिखाया नहीं गया है। इसलिये ये लोग अभी भी पुराने जमाने के कबाले वाले तरीकों से रह रहे हैं और कबीले का सरदार जिसे मलिक या बाबा कहते हैं का कहना मानकर चलता है और अपने कबीले के लिये छोटी मोटी बातों पर भी लड़ते मरते रहते हैं।

Manisha शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

सही मौके को गंवाते लोग


आजकल झारखंड के भूतपूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा द्वारा 4000 करोड़ रुपये से ज्यादा के भ्रष्टाचार का मामला चर्चा में है। पता नहीं कभी आरोप सही भी सावित होंगे या नहीं, या फिर पुराने मामलों की तरह इसमें भी कुछ नहीं होगा और जनता सब जानकर भी कुछ नहीं कर पायेगी।

Manisha गुरुवार, 12 नवंबर 2009

हमें तो भूतों से शिकायत है


जी.के.अवधिया जी ने अपने ब्लॉग धान के देश में भूतो के उपर पूरा शोध पत्र पेश किया है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर तो भूतों पर कोई विश्वास नहीं है लेकिन जितना भी भतों के बारे में जानकारी है वो सब राजकुमार कोहली, रामसे बंधुओं और रामगोपाल वर्मा और कुछ हॉलीवुड के फिल्मकारों के कारण ही है। 

Manisha सोमवार, 9 नवंबर 2009

सवाल ये है कि आप क्या कर लेंगे?

अमेरिका की एफबीआई ने बीते दिनों पाकिस्तान मूल के अमरीकी डेविड हेडली और पाकिस्तान में जन्मे कनाडाई नागरिक टी. हुसैन राणा को आतंकी साजिश के सिलसिले में गिरफ्तार किया था। दोनों लश्कर के इशारे पर भारत और डेनमार्क में हमलों की साजिश रच रहे थे। 

इस सिलसिले में भारत के गृहमंत्री चिदम्बरम जी ने कहा कि इसमें पाकिस्तान का हाथ साफ है। इससे पहले पिछले साल जुलाई और इस साल अक्टूबर में काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर भी हमले किये गये थे जिन में भारत ने पाकिस्तान और उसकी आईएसआई व तालीबान का नाम लिया था और सबूत पेश किये थे। 

मुंबई में 26/11 के भीषण हमले में भी भारत ने पाकिस्तान का नाम लिया था। मेरा सवाल भारत सरकार से ये है कि जब इन सबके पीछे आईसएसआई और पाकिस्तान है ये बात सब जानते हैं लेकिन आप ने ये सब जानने के बाद क्या किया ये कोई नहीं जानता। 

आप तो  पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देते हैं, कभी पाकिस्तान को आतंकवाद का शिकार बताते हैं, कभी शर्म अल शेख में उससे समझौता कर लेते हैं, कभी उसको वार्ता के लिये आमन्त्रण देते हैं। तो फिर किसी भी घटना होने पर केवल पाकिस्तान का नाम लेने से क्या होगा? 

कुछ कर के भी तो दिखाइये। आईएसआई और पाकिस्तान बार-बार घटनाये करते जाते हैं और आप बस उनका नाम ले लेते हैं। मैं कहती हूं कि आईएसआई का हाथ है तो आप उसका क्या कर लोगे?

Manisha शनिवार, 7 नवंबर 2009

जाना हुआ अपोलो हॉस्पिटल में


पिछले दिनों हमारे एक परिचित दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में सीने में दर्द के कारण भर्ती थे और सबसे अच्छी बात मुझे जो लगी जिसका वजह से मैं ये पोस्ट लिख रही हूं कि वहां पर हर बोर्ड पर अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में जरुर लिखा हुआ है और इसका ध्यान हर जगह रखा गया है। 

अधिकांश प्राइवोट संस्थानों में केवल अंग्रेजी में ही सब कुछ लिखा मिलता है लेकिन अपोलो अस्पताल शायद अपवाद है मुझे ये देख बहुत ही अच्छा लगा और इसके लिये मैं अपोलो अस्पताल की प्रशंसा करना चाहुंगी। अपोलो हॉस्पिटल

उनका इलाज ह्रदय रोग विभाग में चल रहा था, तो हम लोग उनको देखने और मिलने के लिये वहां पर गये थे। अपोलो अस्पताल के बारे में हमने पहले काफी सुन रखा था जिस में से अधिकांश नकारात्मक था। 

ये अस्पताल काफी मंहगा है और पांच सितारा स्तर की सुविधायें हैं। बहरहाल हम जब वहां पहुंचे तो पता चला कि पार्किंग वैसे तो काफी बड़ी है लेकिन पूरी भरी हुई थी और प्रति आगमन 25 रूपये का शुल्क लगता है। 

खैर किसी तरह जगह मिली और गाड़ी खड़ी करके हम लोग अपोलो अस्पताल के अन्दर गये।  अस्पताल के अन्दर की लॉबी काफी अच्छी बनी हुई है और वहां पर लोगो के बैठने के लिये बहुत सारी कुर्सियां लगी हुई हैं। यहीं पर लोगो के खाने पीने के लिये काफी हॉउस व अन्य दुकाने भी हैं। 
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मैने देखा कि अफगनिस्तान के लोगों के लिये अपोलो में एक विशेष काउंटर खोला हुआ है और इस अस्पताल में बहुत सारे विदेशी लोग इलाज कराने आते हैं खास कर अफगानी और इराकी लोग। हम ने बहुत सारे विदेशियों को वहां देखा।  

अपने परिचित से मिलने के समय मैंने देखा कि वहां पर मेडिकल से संबंधित काफी सुविधायें हैं बहुत सारे उपकरण हैं हालांकि इलाज काफी मंहगा है। लेकिन इसके बावजूद अपोलो अस्पताल में काफी भीड़ दिखी। 

इससे ये पता चलता है कि लोगो को अच्छा इलाज चाहिये भले ही वो मंहगा हो।  लेकिन आम आदमी क्या करे? क्या उसके लिये बिना सुविधाओं के सरकारी अस्पताल ही बने हैं?

Manisha सोमवार, 2 नवंबर 2009

फियेट का मल्टीजेट इंजन देश का इंजन बन गया है


पिछले दिनों हमारे एक जानकार को नई कार खरीदनी थी उन्होंने कारों के बारे में थोड़ी जानकारी इकठ्ठीMultijet-Fiat-Engine करनी शुरु की और इस मामले में हम लोगों से भी सलाह मांगी। 

हमारे परिचित को डीजल इंजन की कार खरीदनी थी। उनके हम से संपर्क करने के बाद हमने भी कारों से संबंधित वेबसाइट और ब्लॉगों को खंगालना शुरु किया। 

कई दिनों के बाद हम को कुछ समझ में आया कि कार खरीदने के लिये क्या क्या जानना चाहिये। लेकिन एक विशेष बात ये समझ में आई की इटली की फियेट कार कंपनी का  बनाया हुआ 1.3 लीटर की मल्टीजेट डीजल इंजन (1.3 Multijet) इतना अच्छा है कि उसको कई कारो में इस्तेमाल किया जा रहा है। 

कई कार ब्लॉगो पर इस डीजल इंजन को राष्ट्रीय इंजन लिखा जा रहा है। 

आप भी देखिये कि ये मल्टीजेट इंजन फियेट की पालियो, लीनिया, ग्रांदे पुंटो, मारुति सुजुकी की स्विफ्ट, स्विफ्ट डिजायर, रिट्ज वा टाटा की इंडिका विस्टा व इंडिगो मांजा के कई विकल्पों में इस्तेमाल किया जा रहा है। 
तो क्या वाकई ये हमारे देस का सबसे पसंदीदा इंजन है?   कारों की बिक्री के आंकड़े तो इसी की पुष्टि करते दिख रहे हैं। वैस हमारे परिचित ने टाटा की इंडिका विस्टा खरीद ली है।

Manisha शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

कुछ भी तो नहीं बदला मध्य युग से अब तक


मध्य युगीन लड़ाकू लोगकल शाम पश्चिम बंगाल में नक्सली समर्थक पुलिस संत्रास प्रतिरोध समिति [पीसीपीए] के माओवादियों ने दुस्साहसिक कार्रवाई करते हुए भुवनेश्वर-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस को अगवा कर लिया और ट्रेन के चालक और सह चालक का अपहरण कर लिया हालांकि बाद में चालक-सह चालक को रिहा करा लिया गया। 

यह सब देख कर मुझे लगा कि आज के सभ्य समाज में और मध्य युग में क्या कहीं कुछ बदला है? जैसे मध्य युग में होता था वैसै ही आज के युग में भी कोई भी हथियार उठाकर बड़े इलाके पर कब्जा कर लेता है और सरकारों और जनता पर अपना राज चलाने लगता है। 

प्रभाकरण, वीरप्पन, सलाउद्दीन, हकीमुद्दीन महसूद, बैतुल्लाह मेहसूद, मंगल बाग, हकीमुद्दीन हक्कानी, किशनजी, छत्रधर महतो, मुल्ला उमर जैसे कितने ही आजकल के जमाने में भी हथियार देशों के बड़े इलाकों पर अपना राज चलाते रहते हैं।  

पहले जमाने में राजा लोग इस तरह के हथियार उठाने वाले से मुकाबला भी करते थे, लेकिन आज के जमाने में लोकतंत्र में सरकार किसी की अपनी नहीं होती है इसलिये मुकाबला ढंग से नहीं करते बल्कि कई बार उन्हीं से मिल जाते है। 

कई बार तो संबंधित देशों की सरकारें ही इनको खडा करती हैं बाद में अपने लिये मुसीबत बढ़ा लेती हैं। अब यही कहा जा सकता है आजकल के जमाने में कुछ नहीं  बदला है बल्कि आज भी कोई अगर अपना गिरोह बना ले तो वो सत्ता पर कब्जा कर सकता है।

एक तरफ तो ऐसे हथियारों के बल पर राज्य पर कब्जा करने वाले लोग हैं वहीं दूसरी ओर आज के जमाने में आम जनता भी उसी दिमागी तौर पर मध्य युगीन हालात में रह रही है। 

आज ही के समाचार पत्रों मे छपा है कि दिल्ली में अक परिवार ने अपनी ही लड़की को समान गोत्र में शादी करने के कारण बलात्कार करवा कर हत्या कर दी। 

इस तरह के समाचार रह रह कर सामने आते रहते हैं। इसलिये मुझे आश्चर्य लगता है कि कुछ भी तो नहीं बदला मध्य युग से अब तक।

Manisha बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

लोकतंत्र नीचे तक नहीं पहुंचा है


हम लोग यह बात  दुनिया को गर्व से बताते हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और हमारे यहां लोकतंत्र लोकतंत्र की परम्परायें रही हैं। 

लेकिन दुसरी ओर मैं देखती हूं कि वास्तव में सच्चे लोकतंत्र के तो कोई लक्षण ही नहीं हैं। 

सच्चा लोकतंत्र वो होता है जहां पर कोई अदना सा भी अपनी बात कह सके, अपनी बात के लिये लोगो का समर्थन ले सकें। 

लेकिन व्यवहार में क्या हो रहा है? अभी हाल ही में तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद कहा गया कि मुख्यमंत्री का चुनाव कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी करेंगी। 

अब नवनिर्वाचित विधायकों को तो काम ही नहीं रहा अपने और प्रदेश के लिये कोई नेता वो चुनने से वंचित हो गये, इसी तरह बीजेपी ने राजस्थान में वसुंधरा राजे से कहा कि वो पद छोड़ दे भले ही वहां के भाजपा के विधायक चाह रहे कि वो उस पद पर रहें। 

उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार और बसपा के सारे निर्णय खुद ही लेना चाहती हैं, किसी अन्य को कोई निर्णय लेने की आजादी नहीं है। यहां तक की मंत्री भी अपने विभाग के सिसी आदमी का ट्रांसफर तक नही कर सकता। 

दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के लिये तैयारी को लेकर निगरानी का मामला उठा तो सीधे प्रधानमंत्री को दखल देनी पड़ी। 

नीचे कोई सही तरीके से निर्णय लेने के लिये नहीं है। यानी सारे निर्णय उपर के लोग ही लेंगे, नीचे कोई जिम्मेदार नहीं है। 

क्या ऐसे ही लोकतंत्र चालाया जाता है? 

हमारे घरों में भी कुछ ऐसा ही हाल है। भले ही बच्चे वयस्क हो जायें, लेकिन घर के अधिकांश मामलों में घर के बुजुर्ग ही अंतिम फैसला करना चाहते हैं। 

आखिरकार निर्णय लेने की क्षमता नीचे तक तो पहुंचनी ही चाहिये न। 

क्या केवल समय पर चुनाव करा देना ही लोकतंत्र है या अपने व्यवहार में लोकतांत्रिक बनना भी जरुरी है?

Manisha सोमवार, 26 अक्तूबर 2009