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आईपीएल के चाहने वाले दीवाने होते है क्या?


दिल्ली में आजकल एफएम रेडियो पर और टीवी पर भी विभिन्न चैनलों पर आईपीएल-3 (IPL-3) के लिये टिकटों की बिक्री के लिये विज्ञापन बज रहे हैं, और दिखाये जा रहे हैं। 

इन विज्ञापने को देख सुन कर तो ऐसा लगता है मानो आईपीएल देखने वालों को होश ही नहीं है कहां पर क्या बात करनी है? 

Manisha गुरुवार, 4 मार्च 2010

इन सेवाओं के प्रयोक्ताओं के नाम कब जाहिर होंगे?


हाल ही में दिल्ली में एक और कालगर्ल गैकेट का पर्दाफाश हुआ है जिसे एक बाबा शिवेन्द्र उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी उर्फ इच्छाधारी बाबा चला रहा था। इसके गिरोह में तमाम अच्छे घरों की लड़कियां शामिल थीं। 

जैसे ही बाबा के पकड़े जाने की खबर आई वैसे ही मीडिया ने चटखारे लेकर खबर को दिखाना शुरु कर दिया। बताया जाने लगा कि बाबा का कारोबार पूरे भारत में फैला था, कि कालगर्ल के इस धंधें में कई पढ़ी-लिखी लड़कियां और महिलायें शामिल था, कि कैसे बाबा ने अपने आश्रम में व्यवस्थायें कर रखीं थीं, कि बाबा का कारोबार 2000 करोड़ रुपयो का है, इत्यादि इत्यादि। 

कुछ टीवी चैनलों ने बाबा की कोई डायरी भी दिखा दी जिसमें लेनदेन और सेवा लेने वालों के नाम लिखे थे। अपराधियों के नाम सार्वजनिक किये जाने चाहिये

लेकिन इन नामो को कभी नहीं बताया जाता है। मीडिया भी इन नामों को छुपा जाता है। 

पुलिस जब भी किसी इस तरह के रैकेट को पकड़ती है तो उसके सरगना और पकड़े जाने वाली लड़कियों और औरतों के नाम तो बता दिये जाते हैं लेकिन कभी भी उनका नाम सामने नहीं आता जिन्होंने कॉलगर्लों की सेवायें ली थीं। 

बाबा का 2000 करोड़ का कारोबार बताया जा रहा है, जाहिर सी बात ये सब पैसा काला धान है जिसे कमाने वालों ने ही बाबा को दिया है उनकी सेवा के बदले में। 

यदि उन लोगों के नाम भी सार्वजनिक कर दिये  जायें जिन्होंने बाबा या अन्य किसी के द्वारा सेक्स के लिये लड़कियां मंगायी थी तो सब का पता चलेगा और सार्वजनिक बदनामी के डर से इस तरह के धंधे में लगे लोग कुछ कम भी होंगे और सरकार को बता चलेगा कि कौन लोग अपना काला धन कहां प्रयोग कर रहे हैं। 

दरअसल कालगर्ल संस्कृति के प्रयोक्ता अधिकांश बड़े सरकारी अधिकारी, नेता व समाज के बड़े-बड़े लोग हैं और इसीलिये हमेशा लड़कियों के नाम ही बाहर आते है लेकिन कभी उन पुरुषों के नाम बाहर नहीं आ पाते जो लोग ऐसे काम को प्रयोग कर उसे बढ़ावा दे रहे हैं। 

मेरे विचार में देश में जगह जगह पकड़ जा रहै सेक्स रैकेटों को चलाने वालों के अलावा उनके ग्राहकों को भी पकड़ कर उनके नाम सार्वजनिक किये जाने चाहिये।

Manisha बुधवार, 3 मार्च 2010

हमारे नान-स्टेट एक्टर क्यो नहीं बोलते हैं?


जब मुंबई पर 26/11 पर पाकिस्तानी हमला किया गया था तब वहां के राष्ट्रपति जरदारी ने कहा था कि ये नान-स्टेट एक्टर द्वारा किया गया काम है और इसमें पाकिस्तानी सरकार का कोई हाथ नहीं है। 

Manisha शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

ई-गवर्नेंस से किसे फायदा हो रहा है?


आज से राजस्थान की राजधानी जयपुर में 13 वां राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस (ई-शासन) का सम्मेलन हो रहा है  जिसमें देश के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री, उनके विभाग, राज्य सरकारें एवं अन्य लोग भाग ले रहे हैं। 

देश में ई-गवर्नेंस  को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर एवं महत्वाकांक्षी रुप में पेश किया जाता है। ऐसा बताया जाता है कि सूचना प्रौद्योगिकी  की ई-गवर्नेंस  प्रणालियों से देश को और देश की जनता को बहुत फायदा पहुंच रह है या पहुंचने वाला है। 

लेकिन मेरे विचार में ऐसा नहीं है। ई-गवर्नेंस   से कुछ फायदा तो हो रहा है लेकिन ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है। इस बारे में मेरे विचार कुछ इस प्रकार हैं -
  • सिस्टम वही का वही - ई-गवर्नेंस  प्रणालियां तो बन गई हैं लेकिन उनसे प्रशासनिक अव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। मिसाल के लिये अगर जन्म-मृत्यु के प्रमाण पत्र को लेने में अगर पहले 5 दिन लगते तो कंप्युटरीकरण के बाद भी इतने ही दिन लगते हैं यानी कि काम अभी भी उसी गति से हो रहा भले ही कंप्यूटर के ऊपर भारी खर्चा हो गया है। इसी तरह से आयकर के कंप्यूटरीकरण के बावजूद लोगों को आयकर का रिफंड लेने के लिये उतने ही धक्के खाने पड़ रहे हैं जितने की पहले। या फिर आय कर का रिटर्न भरना आज भी उतना ही जटिल है जितना पहले था। यानी ई-गवर्नेंस   का फायदा आम आदमी को नहीं पहुंचा है।
  • मंहगा - ई-गवर्नेंस  के नाम पर लोगो को मिलने वाली सुविधायें मंहगी कर दी गई हैं मसलन रेलवे के टिकट पर कंप्यूटर के नाम पर सरचार्ज लगता है। या फिर उदाहरण के तौर पर दिल्ली में कंप्यूटर और स्मार्ट कार्ड वाले वाहन रजिस्ट्रेशन और वाहन लाइसेंस  की फीस बढ़ा दी गई है यानी लोगों को फायदा तो कुछ नहीं हुआ पर आर्थिक नुकसान जरुर हो गया।
  • हिंदी और क्षेत्रीय भाषायों को नुकसान – अधिकांश कंप्यूटरीकरण व ई-गवर्नेंस  एप्लीकेशंस अंग्रेजी भाषा में हैं आम जनता की भाषा में नहीं। जैसे तैसे देश में राजभाषा के काम को बढ़ाया जा रहा था लेकिन ई-गवर्नेंस  के बाद उस पर पानी फिर गया है। जरूरत आम आदमी की भाषा में ई-गवर्नेंस प्रणालियों की है।
  • बाबुओं को फायदा - ई-गवर्नेंस के नाम पर करोड़ों रुपये की योजनाये बना कर खरीदारी की जा रही है जिसमें जाहिर सी बात है कि क्या उद्देश्य रहता है।
  • भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं - ई-गवर्नेंस से कहीं भी किसी भी सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लग सकी है यानी सब कुछ वैसै ही चल रहा है।


ई-गवर्नेंस कई जगह पर सफलता पूर्वक भी चल रहा जैसे कि रेल व हवाई यात्रा में रिजर्वेशन में। अधिकांश ई-गवर्नेंस वहां तो सफल है जहां पर पैसे का लेन देने है, वाकई इससे आसानी हो गई है।

लेकिन जब तक ई-गवर्नेंस  से आम जनता को परेशान करने वाली व्यवस्था नहीं बदलती तब तक ये सिर्फ एक ढोल पीटने जैसी बात रहेगी।

Manisha बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

आखिर भारत का संयम खत्म हो ही गया


कुछ दिन पहले पाकिस्तान में अमेरिका के रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स ने यह कहा था कि कि भारत का संयम खत्म हो सकता है। इसका सभी समाचार माध्यमों ने यह अर्थ निकाला था कि भारत पाकिस्तान की तरफ से किसी भी प्रकार के आतंकी हमले के लिये जैसे को तैसा की तर्ज पर कार्यवाही करेगा। 

Manisha सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

लोगों की भाषा क्षमता कम हो रही है


आजकल हम रोज देखते हैं कि विभिन्न कार्यक्रमों में लोग जो भाषा बोलते हैं वो इतनी हल्की होती है कि समझ में नहीं आता कि भाषाओं के मामले में समृद्ध भारत को क्या होता जा रहा है?  शिक्षा के तमाम अवसरों के बावजूद पढ़-लिखे लोग भी अनपढ़ों के बराबर ही लगते हैं। 

टीवी के विभिन्न चर्चा वाले कार्यक्रमों को देखिये, विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं को देखिये, नेताओं द्वारा दिये जाने वाले बयानो को देखिये, फिल्मों के संवादों को देखिये, संसद में होने वाली बहसों को देखिये आपको स्वयं समझ में आ जायेगा कि किस प्रकार की भाषा का प्रयोग होने लगा है।

Manisha रविवार, 7 फ़रवरी 2010

कांग्रेस की किस्मत इस समय अच्छी है।

ज्योतिषी की बातें बताने वाले ब्लॉगर साथी लोग या फिर अन्य ज्योतिषियों द्वारा शायद न बताया गया हो लेकिन मुझे लगता है कि अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी की किस्मत इस समय बहुत ही अच्छी चल रही है। 

महंगाई इस समय देश में चरम पर है आप ही देखिये कि इस समय मायावती पर मूर्तियां और पार्क बनाने का आरोप है जिसे फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने रोक रखा है और वो केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित रह गई हैं, नितीश कुमार की जद (यू) में भी झगड़ा चल रहा है, समाजवादी पार्टी में अमर सिंह ने मोर्चा खोला हुआ है, भाजपा में गिरावट है, हिंदुवादी शिवसेना, आरएसएस और भाजपा महाराष्ट्र में झगड़ रहे हैं, वामपंथी कमजोर हो चुके हैं और वहां भी आपसी मतभेद उभर आये हैं। 

ऐसे कमजोर विपक्ष के समय में अगर सत्तारुढ़ पार्टी की किस्मत अच्छी नहीं कही जायेगी तो क्या कहा जायेगा? 

Manisha सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

शराब पीकर दुर्घटना करने में भी बराबरी?


हम सब महिलाओं को उनके अधिकार और बराबरी के लिये संघर्ष करते रहते हैं। भारत में औरतों को अपना हक लेने के लिये कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। हमें पुरुषों के समान अधिकार और सम्मान मिलना ही चाहिये। 

लेकिन कुछ बराबरी इस तरह की है कि औरतों को न ही मिले तो ठीक है। 

Manisha

क्यों भारत के नक्शे गलत छपते हैं?


पिछले एक या दोIndia-Wrong-Map सालों से ये देखने में आ रहा है कि भारत के राजनैतिक  नक्शे को गलत तरीके से विभिन्न स्तरों पर दिखाया जाता है। कई बार इस को लेकर हल्ला मचता है और कई बार अनदेखा हो जाता है। 

पहले जब हम छोटे थे तब भी समाचार पत्रों में इस बारे में कुछ छपता था कि फलां-फलां जगह भारत का गलत नक्शा छापा गया है तब भारत सरकार की प्रतिक्रिया की खबर भी छपती थी। 

अब तो पता ही नहीं चलता कि भारत सरकार को गलत नक्शा छपने की चिन्ता है भी या नहीं। 

तो आखिर क्या कारण है कि पिछले कुछ समय से भारत के नक्शे गलत छपने या वेबसाइटों पर लगने की खबर आ रही हैं। शायद ये कारण हो सकते हैं -

  • मीडिया कवरेज ज्यादा -  शायद अब इस तरह की घटनायें छुप नहीं पाती हैं और मीडिया माध्यमों में अच्छा कवरेज मिलता है जिससे हमें लगता है कि इस तरह की घटनायें बढ़ गई है
  • कर्मचारियों की लापरवाही -  कई बार कर्मचारियों खासकर सरकारी कर्मचारियों द्वारा अपने खुद के कम सामान्य ज्ञान या फिर लापरवाही की वजह से ऐसा होता है कि गलत नक्शा छप जाता है या फिर वेबसाइट पर लग जाता है। अपना काम बचाने के लिये ये लोग शायद विभिन्न वेबसाइटों से भारत का गलत नक्शा डाउनलोड कर के लगा देते हैं।
  • जानबूझ करये शायद सबसे बड़ा कारण है। भारत को जानबूझकर नीचा दिखाने के लिये विभिन्न देशों के प्रकाशक और वेबसाइटें भारत का गलत, भ्रामक और विवादास्पद नक्शा प्रदर्शित करते हैं। ऐसा इसलिये भी किया जाता है ताकि भारत की प्रतिक्रिया जानी जा सके। यदि भारत की जनता और सरकार कड़ा विरोध नहीं जतायेगी तो ये लोग धीरे-धीरे सभी जगह इसी तरह से भारत के गलत नक्शे लगाकर भारत को नुकसान पहुंचायेंगे।

दरअसल रणनातिक तौर पर दुश्मन देश इस तरह की घटनायें कर के भारत की प्रतिक्रिया को देखना चाहते हैं। इस तरह की घटनायें केवल कमजोर देशों के खिलाफ ही होती हैं। 

चीन के नक्शे को तोड़-मरोड़ कर प्रदर्शित करने की किसी प्रकाशक और वेबसाइट द्वारा हिम्मत नही होती है।

भारत सरकार की प्रतिक्रिया अक्सर कमजोर सी होती है अब समय है कि भारत सरकार को भी चीन की तरह से जोरदार ढंग से विरोध करना चाहिये।

Manisha गुरुवार, 28 जनवरी 2010

हो गई कोस्मेटिक देशभक्ति पूरी

आज देश को गणतंत्र बने हुये 60 वर्ष पूरे हो गये और इस अवसर पर जहां मन प्रफुल्लित और हर्षित है वहीं ये देख कर दुख होता है कि अधिकांश लोगो की देशभक्ति केवल दिखाने भर के लिये है। 

आज 61वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर हमारी सोसाईटी में भी लोगो ने झंड़ारोहण, राष्ट्रीय गान का गायन एवं कई अन्य कार्यक्रम आयोजित किये थे। 

लेकिन मैने देखा कि सोसाईटी की दो बिल्डिंगों को लोग अलग-अलग जगह पर अपना अपना ये सब कार्यक्रम कर रहे थे यानी कि गंणतंत्र दिवस के अवसर पर भी लोग एक न रह सके और अपनी-अपनी देशभक्ति अलग से प्रदर्शित की।

दूसरी बात ये कि गाने गाये जा रहे थे कि देश के लिये ये कर देंगे वो कर देंगे लेकिन अधिकांश लोग वो है जो किसी न किसी प्रकार से देश को नुकसान पहुंचाने वाले लोग हैं। 

कोई अपने ऑफिस में भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, किसी के बारे में सब को पता है कि वो बिना रिश्वत के कोई काम नहीं करता है, कोई बिल्डर है जो कि घटिया सामान लगाकर ज्यादा कमाता है, कोई दुकानदार है जो कि घटिया और मंहगा सामान बेचने कि फिराक में रहता है। 

कहने का मतलब ये हे कि ये सब लोग दिल से तो शायद देशभक्त हैं और अपनी देशभक्ति 26 जनवरी और 15 अगस्त को इसी तरह प्रदर्शित भी करते है लेकिन जो बाते देश को नुकसान पहुंचा रही हैं उनको छोड़ते नही हैं तो क्या ये न माना जाये कि ऐसी देशभक्ति दिखावटी (कोस्मेटिक) है।

दिल से देशभक्त बनिये और देश के लिये ऐसे काम करिये कि देश का और देश के लोगों को लाभ हो। आप सब को 61वें गणतंत्र दिवस की ढेर सारी बधाई और शुभकामना कि ऐसे ही हमारा प्यारा भारत  देश हमेशा गणतंत्र दिवस मनाता रहे।

Manisha मंगलवार, 26 जनवरी 2010

एक झटके में मिट गई अमन की आशा !


भारत और पाकिस्तान के संबंधों में मुंबई के 26/11 हमलों को बाद जो Aman-Ki-Ashaगिरावट और बातचीत में जो गतिरोध आया है उस को लेकर फिर से भारत में शांतिवादी सक्रिय हो रहे हैं। 

इसी सिससिले में भारत में टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार पाकिस्तान के जंग नाम के अखबार के साथ मिल कर  अमन की आशा नाम से भारत और पाकिस्तान की दोस्ती के लिये अभियान चला रहा है। 

इसी तरह से कुछ पुराने शांतिवादी और बुद्धिजीवियों ने टीवी के अपने कार्यक्रमों में इस तरह के विषयों को लेकर ट्रेक-टू डिप्लोमेसी शुरु कर दी है।  

हालांकि भारत की जनता और सरकार अभी तो इस प्रकार की किसी अमन की आशा की उम्मीद न रखते हुये इससे दुर ही बने हुये हैं। 

अमन की आशा  का यह कार्यक्रम अभी पूरा भी नहीं हुआ है कि आईपीएल-3 में क्रिकेट खिलाड़ियों के नीलामी कार्यक्रम में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को किसी भी टीम द्वारा न लिये जाने से एक ही  झटके में अमन की आशा मिट गई है। 

अब पाकिस्तान में तरह-तरह की भारत विरोधी आवाजें सुनाई दे रही हैं और टाइम्स ऑफ इंडिया तथा जंग अखबार की अमन की आशा का प्रोग्राम बेकार की कवायद बन गया है।

इसी के साथ-साथ पाकिस्तान में अमेरिका के रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स ने यह कहकर अमन की आशा  को धक्का पहुंचाया है कि भारत का संयम खत्म हो सकता है यदि फिर से 26/11  की घटना दोहराई गई।  इससे भी भारत-पाक संबंधों में गिरावट और वाद-विवाद और गहरा सकता है। 

साथ-साथ ये भी पता चल रहा है कि अमेरिका दोनों देशों को डराकर दक्षिण एशिया के इस क्षेत्र में अपना रुतबा बढ़ी रहा है और भारत-पाक के आपसी संबंधों में चौधरी बन रहा है।

पर फिलहाल तो अमन की आशा मिट गई है। वैसे भी ऐसी आशा थी भी किसे?

Manisha गुरुवार, 21 जनवरी 2010

गूगल पूरा भारतीय हो रहा है – मकर-संक्रांति

ऐसे समय में जब भारतीय लोग पश्चिमी बातों के प्रभाव में अपनी भाषा, संस्कार और त्यौहरों से दूर होते जा रहे हैं, भारतीयों का अंतर्राष्ट्रीयकरण होता जा रहा है, अपनी दुकाने लेकर भारत आई विदेशी कंपनियां भारत में हिंदी में प्रचार करती हैं और भारतीय त्यौहारों के माध्यम से अपना माल बेचने की कोशिश करती दिखती हैं। 

इसी का एक उदाहरण है गूगल का मकर संक्रांति को याद रखना और ये भी याद रखना की भारत में कई जगह इस अपसर पर पतंगे उड़ाई जाती हैं। हालांकि पढ़े-लिखे भारती अब अपने बच्चों को पतंग, कंचे, गिल्ली-डंडा खेलने के लिये मना करते हैं। 

गूगल ने मकर-संक्रांति के अवसर पर अपने भारतीय होम-पेज पर ये पतंगबाजी का चित्र लगाया है जोकि हमें ही याद दिला रहा है कि उठो भारतीयों अपनी ही बातों, संस्कारों को मनाओ और मजे लूटो।

Makar Sankranti Kite Festival

इसी अवसर पर मेरे मोबाइल पर आया हुआ एक छोटा संदेश (SMS) :

मीठे गुड़ में मिल गया तिल
उड़ी पतंग और खिल गया दिल ।।
हर पल सुख और हर दिन शान्ति
आपके लिये शुभ मकर संक्रांति ।।

Manisha गुरुवार, 14 जनवरी 2010

कहां गई ग्लोबल वार्मिंग?


दिल्ली और उसके आसपास जबर्दस्त ठंड पड़ रही है। सर्दी में न कुछ काम करने का मन करता है और न ही सामान्य जीवन जिया जा रहा है। 

बच्चों के स्कुल बंद कर दिये गये हैं। गलन वाली ठंडी हवा चल रही है। उत्तर भारत के हर पहाड़ी स्थान पर इस बार बर्फबारी हुई है। 

इसके साथ-साथ दुनिया के अधिकांश हिस्सों में भी जबर्दस्त ठंड पड़ रही है। कई जगह तो कई वर्षों के रिकार्ड टूट गये हैं। 

चीन, कोरिया, रुस, जर्मनी, इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा हर जगह बर्फ गिर रही है। 

भारत में भी पिछले 2-3 सालों में तो कोई खास ठंड नही पड़ी थी, लेकिन इस बार वापस अपने वास्तविक रुप में आ गई है। 

ऐसे में मैं सोच रही हूं कि धरती पर लोग जो ग्लोबल वार्मिंग को लेकर हल्ला कर रहे थे और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाकर अपनी अपनी बात मनवा रहे थे उनको कहीं प्रकृति यानी भगवान ने तो जबाव नहीं दिया कि चिन्ता न करो प्रकृति अपने आप तुम्हारा ध्यान रखेगी। 

कोई बतायेगा कि कहां गई ग्लोबल वार्मिंग और उसका असर?

Manisha मंगलवार, 12 जनवरी 2010

भारतीय होटल व्यवसाय या इंडस्ट्री पर्यटन सीजन में दाम बढ़ा देते हैं


पिछले साल के अंत और इस साल की शुरुआत के लिये हम लोग कुछ पर्यटन स्थलों पर परिवार के साथ घूमने भारतीय होटल इंडस्ट्री के लिये गये थे जहां पर नये साल का हमने स्वागत किया और अभी हम लोग छुट्टियां मना कर लौटे हैं। 

इन छुट्टियों के दौरान घूमते वक्त हमने देखा कि क्रिसमस के आसपास लगातार छुट्टियों की वजह से काफी भीड़ थी और ऐसा लग रहा था कि अधिकांश लोग घूमने निकले हुये हैं। 

खैर जिस बात ने मुझ सबसे ज्यादा हैरान और परेशान किया किया कि अधिकांध होटलों और गेस्ट हाउसों में कमरे उपलब्ध नहीं थे और उपलब्ध कमरों को काफी ज्यादा दाम बढ़ा कर उठाया जा रहा था, वो भी अहसान जता कर।

हमने देखा कि कई परिवारों का घूमने का बजट इस वजह से बिगड़ गया और लोग अपना कार्यक्रम अधूरा छोड़ कर चले गये। कई होटल वालों को हमने पर्यटकों से बेरुखी से व्यवहार करते भी देखा। 

लोगों का कहना था कि पहले के वर्षों में साल के इसी समय इस तरह से कभी भी होटलों में कमरो की उपलब्धता की समस्या कभी नहीं रही फिर पता नहीं इस बार क्यों ऐसा है? 


खैर होटल वालों द्वारा इस प्रकार सरेआम पर्यटकों को लूटने से मैंने ये सोचा कि अगर ये लोग सीजन के नाम पर इस तरह बहुत ज्याद दाम बढ़ा सकते हैं तो फिर अन्य लोगों द्वारा भी इन होटल वालों से इसी सीजन के दौरान अलग तरह के दाम लेने चाहिये मसलन बिजली विभाग, जलकर, सीवर, आय कर, बिक्री कर इत्यादि को भी सीजन के रेट बढ़ा कर इस तरह से इनसे वसूलना चाहिये अन्यथा पहले से ही सरकार को पक्का कराना चाहिये कि सीजन में क्या रेट लिये जायेंगे और बाद में क्या रेट लिये जायेंगे। वर्ना पर्यटक इसी प्रकार लुटते रहेंगे।

Manisha गुरुवार, 7 जनवरी 2010

लगता है कि मेरा अंग्रेजी का सरकारी नौकरी को बताने वाला ब्लॉग कम से कम भारत में तो नंबर एक ब्लॉग बन गया है।  रोजाना पेज व्यू भी काफी ज्यादा है और अब तो फीड सब्सक्राइबर (फीड ग्राहक) की संख्या भी एक लाख के ऊपर हो गई है।

Sarkari-Naukri

Manisha बुधवार, 6 जनवरी 2010